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जप चर्चा दिनांक १६.०१.२०२१ हरे कृष्ण! आज इस जप कांफ्रेंस में ७३४ स्थानों से प्रतिभागी सम्मिलित हैं। जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥1॥ कृपा करि’ सबे मेलि’ करह करुणा। अधम पतितजने ना करिह घृणा॥2॥ ए तिन संसार-माझे तुया पद सार। भाविया देखिनु मने-गति नाहि आर॥3॥ से पद पाबार आशे खेद उठे मने। वयाकुल हृदय सदा करिय क्रन्दने॥4॥ कि रूपे पाइब किछु ना पाइ सन्धान। प्रभु लोकनाथ-पद नाहिक स्मरण॥5॥ तुमि त’ दयाल प्रभु! चाह एकबार। नरोत्तम-हृदयेर घुचाओ अन्धकार॥6॥ ( वैष्णव भजन) अर्थ (1) श्रीचैतन्य महाप्रभु की जय हो, श्री नित्यानन्दप्रभु की जय हो। श्री अद्वैतआचार्य की जय हो और श्रीगौरचंद्र के समस्त भक्तों की जय हो। (2) कृपा करके सब मिलकर मुझपर करुणा कीजिए। मुझ जैसे अधम-पतित जीव से घृणा मत कीजिए। (3) मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि तीनों लोकों में आपके चरणकमलों के अतिरिक्त और कोई आश्रय स्थान नहीं है। (4) उन श्रीचरणों की प्राप्ति के लिए मेरा मन अति दुःखी होता है और वयाकुल होकर मेरा हृदय भर जाता है। अतः मैं सदैव रोता रहता हूँ। (5) उन श्रीचरणों को कैसे प्राप्त करूँ इसका भी ज्ञान मुझे नहीं है और न ही मेरे गुरुदेव श्रील लोकनाथ गोस्वामी के चरणकमलों का मैं स्मरण कर पाता हूँ। (6) हे प्रभु! आप सर्वाधिक दयालु हैं। अतः अपनी कृपादृष्टि से एकबार मेरी ओर देखिये एवं इस नरोत्तम के हृदय का अज्ञान-अंधकार दूर कीजिए। आप इस भजन को गा नहीं रहे हो? आप जप कर रहे हो। हरि! हरि! हम विषय अथवा थीम को बदल रहे हैं। पहले जप हो रहा था, अब जपा टॉक होगा। आज श्रील जीव गोस्वामी का तिरोभाव तिथि महोत्सव है। श्रील जीव गोस्वामी तिरोभाव तिथि महोत्सव की जय! आज षड् गोस्वामियों में से विशेषतया जीव गोस्वामी का करेंगे। वे भी प्रात: स्मरणीय हैं। जैसा कि हम कहते रहते हैं कि जीव गोस्वामी प्रातः स्मरणीय हैं। वैसे हमें अपनी प्रातः काल कुछ विशेष स्मरण अथवा विशेष व्यक्तियों के स्मरण के लिए रिजर्व रखनी चाहिए। प्रात: काल का समय ब्रह्म की प्राप्ति के लिए बड़ा विशेष अथवा अनुकूल समय होता है। ऐसे मुहूर्त अथवा प्रातः काल में कृष्ण का स्मरण और कृष्ण के भक्तों का स्मरण व संतों का स्मरण समर्तव्य अथवा स्मरणीय है। स्मरण करने योग्य जो भी विषय है, उसी का स्मरण प्रातः काल में होना चाहिए। मैंने प्रातः स्मरणीय कहा तत्पश्चात उस पर चर्चा भी हो रही है। श्रील जीव गोस्वामी तिथि प्रातः स्मरणीय है। यह कहना होगा कि वह प्रातः ही क्यों अपितु सदैव स्मरणीय हैं। जीव गोस्वामी प्रात:काल, मध्यान्ह, सायः काल सब समय ही स्मरण करने योग्य है। श्रील जीव गोस्वामी जिनका आज तिरोभाव तिथि महोत्सव है, जिसे आज पूरा गौड़ीय वैष्णव जगत मना रहा है। गौरांग महाप्रभु की ही अनुकंपा से हम भी अब गौड़ीय वैष्णव बन रहे हैं। हरि! हरि! वैष्णवों में भी गौड़ीय वैष्णव श्रेष्ठ वैष्णव कहलाते हैं। हरि! हरि! यह चैतन्य महाप्रभु की अनुकंपा हैं , जो उन्होंने हमें भाग्यवान बनाया है और हम गौड़ीय वैष्णव बन रहे हैं। उन्होंने हमें गौड़ीय वैष्णव बनाने के लिए कई सारी योजनाएं बना कर रखी हैं। जिसके अंतर्गत षड् गोस्वामी वृन्दों की टीम अर्थात पूरा समूह भी है। उनका उद्देश्य एवं प्रयास अथवा कार्यकलाप संसार के अधिक से अधिक जीवों को गौड़ीय वैष्णव बनाना ही था। नाना-शास्त्र-विचारणैक-निपुणौ सद्-धर्म संस्थापकौ लोकानां हित-कारिणौ त्रि-भुवने मान्यौ शरण्याकरौ राधा-कृष्ण-पदारविंद-भजनानंदेन मत्तालिकौ वंदे रूप-सनातनौ रघु-युगौ श्री-जीव-गोपालकौ।।२।। ( श्री श्री षड् गोस्वामी अष्टक) अनुवाद:- मै, श्रीरुप सनातन आदी उन छः गोस्वामियो की वंदना करता हूँ , जो अनेक शास्त्रो के गूढ तात्पर्य विचार करने मे परमनिपुण थे, भक्तीरुप परंधर्म के संस्थापक थे, जनमात्र के परमहितैषि थे, तीनो लोकों में माननीय थे, श्रृंगारवत्सल थे,एवं श्रीराधाकृष्ण के पदारविंद के भजनरुप आनंद से मतमधूप के समान थे। ऐसा वचन एवं ऐसा अष्टक भी है। हरि!हरि! श्रीनिवास आचार्य बड़े महान् गौड़ीय वैष्णव आचार्य रहे। उन्होंने गोस्वामी अष्टक् की रचना की। उसमें एक अष्टक लिखा जिसे हमनें अभी अभी कहा। जिसमें उन्होंने उल्लेख किया है कि वंदे रूप-सनातनौ रघु-युगौ श्री-जीव-गोपालकौ।। वे वंदना करते हैं, वे स्वयं वंदना करते करते व उसके संबंध में लिखते लिखते हमें भी वंदना करनी सिखा रहे हैं कि 'वंदना करनी है तो किसकी वंदना करो? षड् गोस्वामी वृन्दों की वंदना करो।' वन्दे रूप अर्थात रूप गोस्वामी की वंदना करो, सनातन गोस्वामी की वंदना करो,श्री-जीव-गोपालकौ अर्थात श्री जीव गोस्वामी की वंदना करो। गोपाल भट्ट गोस्वामी की वंदना करो। रघु-युगौ अर्थात रघु दो थे एक रघुनाथ भट्ट गोस्वामी और दूसरे रघुनाथ दास गोस्वामी। श्री निवास आचार्य हमें इनकी वंदना करने के लिए इस अष्टक में प्रेरित कर रहे है। यह षड् गोस्वामी वृन्द अलग अलग स्थानों के थे। इसमें से गोपाल भट्ट गोस्वामी दक्षिण भारत श्री रंगम के थे। रघुनाथ भट्ट गोस्वामी वाराणसी उत्तर प्रदेश से थे। रघुनाथ दास गोस्वामी, सप्तग्राम बंगाल के थे। शेष बचे हुए तीन गोस्वामी रूप,सनातन और जीव गोस्वामी रामकेलि के थे। यह अलग अलग स्थानों में प्रकट हुए अथवा जन्में थे।।अंततोगत्वा श्री चैतन्य महाप्रभु की योजनानुसार ये सारे गोस्वामी वृन्दावन पहुंच जाते हैं। इन षड् गोस्वामियों की टीम ( समूह) प्रसिद्ध है। इन्हें षड् गोस्वामी वृन्द भी कहते हैं। हरि! हरि! चैतन्य महाप्रभु के परिकर मायापुर में रहें। तत्पश्चात जगन्नाथ पुरी में रहे, अंततोगत्वा वृंदावन में रहे। इन तीनों स्थानों के अलग अलग पार्षद और परिकर रहे। इन सभी में षड् गोस्वामी वृन्दों का एक विशेष और ऊंचा स्थान है। षड् गोस्वामी वृन्दों की जय! उनमें जीव गोस्वामी का कुछ विशेष स्थान है। इनका जन्म रामकेलि में हुआ था। श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु जब स्वयं रामकेलि गए थे,उस समय उन्होंने साकर मलिक और दबीर ख़ास जो राजा हुसैन शाह के प्रधानमंत्री अथवा अर्थमंत्री थे, दीक्षित किया। उनको रूप गोस्वामी औऱ सनातन गोस्वामी नाम भी दिए। हरे कृष्ण! कुछ इंटरनेट इशू चल रहा है।क्या आप मुझे सुन पा रहे हो? सुन रहे हो? आप चैट में लिख सकते हो यदि चैट खुला है। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।। सुन रहे हो? नित्यानंद सुन रहे हो। तीन भाइयों रूप, सनातन और अनुपम में से अनुपम का देहांत हो गया था। अनुपम के पुत्र जीव गोस्वामी थे अर्थात रूप गोस्वामी व सनातन गोस्वामी, जीव गोस्वामी के अंकल (चाचा) थे। जब जीव गोस्वामी के पिताश्री अनुपम नहीं रहे।.... उस समय जीव गोस्वामी अपने चाचा रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी को जॉइन करना चाहते थे। जीव गोस्वामी का बचपन से ही रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी से स्नेह और लगाव था। ......... जीव गोस्वामी ने बहाना बना कर घर को छोड़ा और सीधे मायापुर पहुंच गए। मायापुर पहुंच कर वह सीधे श्रीवास ठाकुर के घर पर पहुंचे, जहाँ उन दिनों नित्यानंद प्रभु निवास किया करते थे। जीव गोस्वामी ने वहाँ पहुंचकर नित्यानंद प्रभु के चरणों में समपर्ण और प्रणाम किया। हरि! हरि! नित्यानंद प्रभु ने जीव गोस्वामी को अपना संग दिया। उन्होंने जीव गोस्वामी को सारा नवद्वीप दिखाया। नित्यानंद प्रभु स्वयं ही उनके मार्गदर्शक बने। वैसे भी नित्यानंद प्रभु आदि गुरु हैं। गाइडेन्स देना अथवा मार्गदर्शन करना यह भी आदि गुरु का कार्य है और नित्यानंद प्रभु वह कार्य कर रहे थे। वे जीव गोस्वामी को प्रेरित कर रहे थे अथवा उनका मार्गदर्शन दे रहे थे। उन्होंने उनको नवद्वीप में यात्रा भी करवाई। हरि! हरि! वे उनका अलग-अलग भक्तों से परिचय भी करवा रहे थे। वे उनको योगपीठ अर्थात निमाई के निवास स्थान पर भी ले कर गए। जीव गोस्वामी के मायापुर पहुंचने से पहले ही निमाई का संन्यास हो चुका था। निमाई संन्यास ले कर जगन्नाथपुरी भी पहुंचे गए थे। चैतन्य महाप्रभु ने 6 वर्षों तक परिभ्रमण किया था और उनकी मध्य लीला भी समाप्त हो चुकी थी। चैतन्य महाप्रभु ने नित्यानन्द प्रभु को अपनी इच्छा व्यक्त की, तुम बंगाल में प्रचार करो। मेरे साथ सब समय क्यों रहना चाहते हो। जाओ! प्रति घरे गृहे करो आमार आज्ञाय प्रकाश ( चैतन्य भागवत १३.८-९) चैतन्य महाप्रभु ने नित्यानंद प्रभु को जगन्नाथपुरी से बंगाल में भेजा था। इसलिए अब नित्यानंद प्रभु बंगाल अथवा मायापुर में थे। वे जीव गोस्वामी को योगपीठ ले गए। शची माता से उनका परिचय करवाया। वे वहां भोजन भी किया करते थे। शची माता, नित्यानंद प्रभु और जीव गोस्वामी को भोजन खिलाती थी और विष्णु प्रिया रसोई बनाती थी अर्थात विष्णु प्रिया के हाथ का बना हुआ भोजन नित्यानंद प्रभु और जीव गोस्वामी ग्रहण किया करते थे। हम ऐसे दिन में यह बातें सुनते हैं तो उसका श्रवण भी होता है। यह रोमांचकारी घटनाएं अथवा बातें अथवा वह काल अथवा समय है जब चैतन्य महाप्रभु की लीला और नित्यानंद प्रभु की लीला विद्यमान तथा संपन्न हो रही थी या चैतन्य महाप्रभु और नित्यानंद प्रभु की प्रकट लीला का समय था। उस समय कई सारे घटनाक्रम अथवा कार्यकलाप बड़े ही विशेष और रोमांचकारी भी हैं। हरि! हरि! वहां से नित्यानंद प्रभु ने जीव गोस्वामी को वृंदावन भेजा। वृंदावन जाते हुए रास्ते में जीव गोस्वामी वाराणसी रुके। उन्होंने सार्वभौम भट्टाचार्य के शिष्य मधुसूदन वाचस्पति से संस्कृत का व्याकरण सीखा। जीव गोस्वामी ने वहां पर व्याकरण का अध्ययन किया। उसके बाद वह एक संस्कृत में व्याकरण के विशेषज्ञ बन गए। तत्पश्चात वह वहां से आगे बढ़े। वृंदावन धाम की जय! वृंदावन में उनको वहां उपस्थित गोस्वामीगणों का सानिध्य लाभ हुआ। वृंदावन के छह गोस्वामी हैं, उन छह गोस्वामियों में जीव गोस्वामी सबसे कम उम्र वाले थे। दूसरे गोस्वामी तो बुजुर्ग, अधिक व्यस्क् थे अर्थात जब जीव गोस्वामी वृंदावन पहुंचे, तब वह युवक थे। वृन्दावन में जीव गोस्वामी, रूप गोस्वामी से दीक्षित हुए। रूप गोस्वामी ने सीधे व तुरन्त उनको दीक्षा नही दी अपितु उनकी परीक्षा भी ली।तब उस समय रूप गोस्वामी प्रसन्न हुए, हां-हां यह क्वालिफाइड अर्थात यह दीक्षा का अधिकारी अथवा पात्र है। हरि! हरि! ऐसी कई सारी बातें हैं। गोस्वामियों ने वृंदावन में अलग-अलग मंदिरों की स्थापना भी की है। चैतन्य महाप्रभु का यह आदेश और इच्छा थी कि वृंदावन के वैभव का पुनः प्रकाशन हो और स्थापना हो और प्रचार हो। गिरिराज गोवर्धन की जय हो यमुना मैया की जय जय हो। मुसलमानों के आक्रमणों के कारण वृंदावन उन दिनों में कुछ निर्जन प्रदेश जैसा बन चुका था। वहां सब पूजा पाठ, कथा कीर्तन परिक्रमा दर्शन लगभग सब बंद ही हो चुके थे। ऐसी स्थिति में श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु एक- एक गोस्वामी को भेज रहे थे। सर्वप्रथम उन्होंने लोकनाथ गोस्वामी और भूगर्भ स्वामी को भेजा। वैसे उनका नाम षड् गोस्वामियों की सूची में शामिल नहीं किया जाता लेकिन महाप्रभु ने उनको भी भेजा था। विशेषतया उन्होंने षड् गोस्वामी वृन्दों को भेजा था। वैसे श्रीरंगम से प्रबोधानंद सरस्वती भी वहां पहुंचे थे जोकि गोपाल भट्ट गोस्वामी के अंकल थे। इस प्रकार कई सारे पहुंचे। अन्य भी ऐसे कई सारे धीरे-धीरे पहुंचने वाले थे। श्रीनिवासाचार्य, नरोत्तम दास ठाकुर व श्यामानंद पहुंचेंगे। इस प्रकार वहाँ ऐसी टीम बन रही थी जैसा कि चैतन्य महाप्रभु चाहते थे कि वृंदावन के गौरव का गान हो अथवा स्थापना हो। इसी के अंतर्गत फिर मंदिरों का निर्माण और विग्रहों की स्थापना व आराधना हो और विशेषतया ग्रंथों की रचना हो। बुक्स आर् द् बैसेस अर्थात शास्त्र आधार है। तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ ( श्रीमद् भगवतगीता १६.२६) अनुवाद:-अतएव मनुष्य को यह जानना चाहिए कि शास्त्रों के विधान के अनुसार क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य है । उसे विधि-विधानों को जानकर कर्म करना चाहिए जिससे वह क्रमशः ऊपर उठ सके। शास्त्र प्रमाण है। शास्त्र अधिकृत है। शास्त्रों की रचना षड् गोस्वामी वृन्द करें। श्री चैतन्यमनोऽभीष्टं स्थापितं येन भूतले स्वयं रूपः कदा मह्यं ददाति स्वपदान्तिकम् (प्रणाम मंत्र) ऐसा चैतन्य महाप्रभु का अभीष्ट था और षड् गोस्वामी वृंद इसको जानते थे। वे इसके अनुसार व्यस्त थे और ग्रंथों के निर्माण का कार्य कर रहे थे। जीव गोस्वामी अब राधा दामोदर मंदिर में रहने लगे थे व वे राधा दामोदर की आराधना किया करते थे। हम उनका आज तिरोभाव तिथि उत्सव बना रहे है। जीव गोस्वामी आज के ही दिन राधा दामोदर मंदिर के प्रांगण में नित्यलीला में प्रविष्ट हुए थे। राधा दामोदर मंदिर में जीव गोस्वामी की समाधि भी है। हरि! हरि! श्रील प्रभुपाद वानप्रस्थ लेने के बाद एवं अमेरिका जाने से पहले जब वृंदावन में पहुंचे तब श्रील प्रभुपाद, श्रील जीव गोस्वामी द्वारा स्थापित राधा दामोदर मंदिर के प्रांगण में ही रहे। वहाँ वे विदेश में जाने की सारी तैयारी कर रहे थे। श्रील प्रभुपाद ने ग्रंथों के रचना की तैयारी भी इसी राधा दामोदर मंदिर में की। मैं जब पहली बार वृंदावन गया तब सर्वप्रथम जिस मंदिर में पहुंचा, स्वाभाविक ही था श्रील प्रभुपाद वहीं रहते थे अर्थात राधा दामोदर मंदिर ही हमारा पहला मंदिर रहा। वहाँ हमनें जीव गोस्वामी द्वारा स्थापित विग्रहों के दर्शन किए। वहीं पर जीव गोस्वामी की समाधि भी है, हमनें उनके भी दर्शन किए थे। उस समय भी उनके चरणों में प्रणाम किया था और आज भी प्रणाम करते हैं। इस मंदिर के प्रांगण का एक यह भी विशिष्टय रहा कि सभी गोस्वामीगण राधा दामोदर मंदिर के प्रांगण में एकत्र होते थे नाना-शास्त्र-विचारणैक-निपुणौ सद्-धर्म संस्थापकौ लोकानां हित-कारिणौ त्रि-भुवने मान्यौ शरण्याकरौ राधा-कृष्ण-पदारविंद-भजनानंदेन मत्तालिकौ वंदे रूप-सनातनौ रघु-युगौ श्री-जीव-गोपालकौ।।२।। ( षड् गोस्वामी अष्टक) अनुवाद:- मै, श्रीरुप सनातन आदी उन छः गोस्वामियो की वंदना करता हूँ की, जो अनेक शास्त्रों के गूढ तात्पर्य विचार करने मे परमनिपुण थे, भक्तीरुप परंधर्म के संस्थापक थे, जनमात्र के परमहितेषी थे, तीनो लोकों में माननीय थे, श्रृंगारवत्सल थे, एवं श्रीराधाकृष्ण के पदारविंद के भजनरुप आनंद से मतम धूप के समान थे। षड् गोस्वामी नाना शास्त्रों में निपुण थे और शास्त्रार्थ, चर्चा, विचार विमर्श किया करते थे कि किस प्रकार सद्-धर्म संस्थापकौ हो अर्थात सद्-धर्म गौड़िए वैष्णव धर्म की कैसे स्थापना हो सकती है, उसका प्रचार-प्रसार कैसे हो सकता है। यह षड् गोस्वामियों की चर्चा का विषय था। मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् । कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥ (श्रीमद् भगवतगीता १०.९) अनुवाद:- मेरे शुद्ध भक्तों के विचार मुझमें वास करते हैं, उनके जीवन मेरी सेवा में अर्पित रहते हैं और वे एक दूसरे को ज्ञान प्रदान करते तथा मेरे विषय में बातें करते हुए परमसन्तोष तथा आनन्द का अनुभव करते हैं। ददाति प्रतिगृह्णति गुह्यमचति तच्छति।भुङ्क्ते भोजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम् ।। ( श्री उपदेशामृत श्लोक संख्या ४) अनुवाद:- दान में उपहार देना, दान-स्वरूप उपहार लेना, विश्वास में आकर अपने मन की बातें प्रकट करना, अत्यंत गोपिनीय ढंग से पूछना,  प्रसाद ग्रहण करना और  प्रसाद अर्पित करना- भक्तों के आपस में प्रेमपूर्ण व्यवहार के ये छह लक्षण होते हैं। सभी छह गोस्वामी यहां राधा दामोदर के मंदिर प्रांगण में रहते भी और चर्चाएं भी किया करते थे। जीव गोस्वामी जो युवक भी थे, वह सारी व्यवस्था किया करते थे। वे सारा आयोजन किया करते थे और सभी षड् गोस्वामियों की सेवा भी किया करते थे, विशेषतया रूप गोस्वामी की जोकि उनके गुरु महाराज भी थे। जीव गोस्वामी ने अपने गुरु महाराज अर्थात रूप गोस्वामी के अंतिम दिनों में खूब वपु सेवा की। रूप गोस्वामी ने वहां भजन भी किए। वहां पर रूप गोस्वामी की भजन कुटीर भी है। रूप गोस्वामी का समाधि मंदिर भी राधा दामोदर मंदिर में है। श्रील प्रभुपाद वहीं पर रहते थे। श्रील प्रभुपाद ने भी अपना भजन जीव गोस्वामी के मंदिर में किया। श्रील प्रभुपाद ने विश्व भर में धर्म के प्रचार की तैयारी भी वहीं पर की। श्रील प्रभुपाद ने 1972 में इस्कॉन का पहला कार्तिक महोत्सव भी राधा दामोदर मंदिर में मनाया था। हम भी उस उत्सव में सम्मिलित हुए थे। गौरांग महाप्रभु और राधा दामोदर , षड् गोस्वामी वृन्द व परंपरा के आचार्यों तथा उन सभी की ओर से वृंदावन में कार्तिक मास में श्रील प्रभुपाद ने मुझे दीक्षा भी उसी मंदिर में दी थी। इस प्रकार मेरा भी राधा दामोदर मंदिर के साथ एवं सभी गोस्वामियों के साथ विशेषतया जीव गोस्वामी के साथ मेरा संबंध स्थापित होता है या श्रील प्रभुपाद ने जीव गोस्वामी के साथ यह संबंध स्थापित किया। उन्होंने मुझे नाम भी दिया 'तुम्हारा नाम लोकनाथ होगा'। उस समय स्वामी तो नहीं था। उसी वृंदावन में राधा दामोदर मंदिर में नाम् मिला था 'लोकनाथ' और तत्पश्चात श्रील प्रभुपाद ने कृष्ण बलराम मंदिर में जब मुझे सन्यास दिया तब उन्होंने कहा- 'मैंने तुम्हें लोकनाथ नाम दिया ही है अब इसमें स्वामी और जोड़ दो।' तब मैं कम् से कम नाम से तो स्वामी बन गया। मुझे श्रील प्रभुपाद ने बनाया। यह सब कृपा भी जीव गोस्वामी की कृपा है। हरि! हरि! आप जीव गोस्वामी के चरित्र को और भी पढ़िएगा, पढ़िए, सुनिए ,सुनाइए और जीव गोस्वामी का संस्मरण कीजिए। आप में से यदि कोई शब्दांजली अर्पित करना चाहते हैं या जीव गोस्वामी की गौरव गाथा कहना या गाना चाहते हैं तो कह सकते हैं । यह एक विषय है या और भी कोई विषय है? बुक डिस्ट्रीब्यूशन मैराथन तो हो गया ना (पूछते हुए)। (पदमाली प्रभु- जी! स्कोर एक दो दिन में प्रस्तुत कर दिए जाएंगे।) स्कोर तैयार करो- बुक मैराथन तो हो गया ना। स्कोर तो थोड़े कम सुने लेकिन हमनें आपके कार्यकलाप या आपके प्रयास सुने। आपने सुनाया कि आपने किस किस प्रकार से वितरण किया, आपने अपने अनुभव सुनाए। माताओं ने भी कुछ विशेष सुनाया। हरि! हरि! आपके जो अथक प्रयास रहे, आप घर घर जा रहे थे या गांव गांव जा रहे थे, अन्य सब काम धंधा छोड़कर आप सब भटक रहे थे। (भटकना मतलब बिना उद्देश्य के भटकना परंतु आप ऐसा तो नहीं भटक रहे थे) आप जानबूझकर एक उद्देश्य के साथ जा रहे थे, ठंडी गर्मी, मान अपमान की परवाह ना करते हुए आप जा रहे थे, कहीं सम्मान हुआ और कहीं.... ठुकरा दो या प्यार करो अर्थात किसी ने ठुकरा दिया अथवा किसी ने प्यार किया लेकिन आपके प्रयास रुके नहीं। ऐसे ही हमारे फुल टाइम भक्त ब्रह्मचारी भी प्रयास करते ही रहते हैं, उन्होंने भी किया, वैसे उनसे भी सुनना चाहिए था। पदयात्रा के आचार्य प्रभु ने तो सुनाया। पदमाली, मंदिर के ब्रह्मचारियों से भी सुनना चाहिए था, मंदिर के अधिकारियों से भी सुनना चाहिए था, उनके प्रयास और स्कोर भी कैसे रहे। अभी तो ज्यादा रिपोर्ट तो हमारे काँग्रेग्रशन भक्तों ने ही सुनाए हैं।कही कहीं डिस्ट्रीब्यूशन में बाल, वृद्ध अर्थात वृद्धों से लेकर बालक या बालिकाओं को भी हमनें देखा। बेंगलुरु के कई बालक बालिकाएं बड़े उत्साह के साथ पूछ रहे थे कि आज कहां जाएंगे, आज कहां जाएंगे, कौन से गांव जाएंगे? वे कितने उत्साहित थे। वह यह सब रिपोर्ट सुनकर मैं बहुत प्रभावित हो चुका हूं और प्रसन्न भी हूं। मैं आपका कृतज्ञ भी हूं। श्रील प्रभुपाद, गौरांग महाप्रभु और सभी आचार्यों की ओर से मैं आप सभी का आभार भी मानता हूं। मुझे विश्वास है कि आप के हृदय में वे भी बैठे हैं। भगवान् भी अपना हर्ष व्यक्त कर रहे हैं और आप भी शांत और संतुष्ट अनुभव कर रहे होंगे। क्या आप अनुभव कर रहे हो? आपने जो भी किया अर्थात आपने बुक डिस्ट्रीब्यूशन किया, गीता मैराथन किया, क्या आप उससे आप प्रसन्न हो? स्वर्ण मंजरी, तुमने कुछ किया या नहीं? जिन्होंने भी ग्रंथ का वितरण किया , संख्या की दृष्टि से कम् या ज्यादा हो सकता है लेकिन भगवान क्वालिटी ( गुणवत्ता) देखते हैं और उसी से भगवान प्रसन्न होते हैं। हमनें जो भी किया, उस पर हमें गर्व नहीं होना चाहिए। अपितु हमें नम्र ही होना चाहिए। भगवान हनुमान की सेवा से प्रसन्न थे जब रामेश्वर से श्रीलंका तक सेतू बंधन हो रहा था अर्थात पुल बन रहा था। वैसे वहां कई थे, उसमें एक गिलहरी भी थी। वह भी प्रयास कर रही थी। वह भी बालू के छोटे छोटे कण अपने बालों में उठाकर बड़े-बड़े चट्टानों पत्थरों के बीच में डाल रही थी। हनुमान जी बड़ी पहाड़ी फेंकते थे और यह गिलहरी बीच में थोड़ा सा कुछ रेती को डाल देती थी। जैसे सीमेंट टाइप ताकि वह कंक्रीट से मजबूत बने। भगवान दोनों की सेवा से प्रसन्न थे। ये दोनों भी शत प्रतिशत समर्पित थे। सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ ( श्रीमद् भगवतगीता १८.६६) अनुवाद:-समस्त प्रकार के धर्मों का परित्याग करो और मेरी शरण में आओ । मैं समस्त पापों से तुम्हारा उद्धार कर दूँगा । डरो मत। हरि !हरि! मैं आप सभी का आभारी हूं। आपके प्रयास के लिए मैं प्रसन्न हूं। उल्टा सुलटा दोनों ही चलता है। यह कह सकता हूं कि भगवान भी प्रसन्न हैं। आपका प्रयास देख कर भगवान प्रसन्न हैं इसलिए मैं प्रसन्न हूं कभी-कभी यह भी कहते हैं कि यस्यप्रसादाद्‌ भगवदप्रसादो यस्याऽप्रसादन्न्‌ न गति कुतोऽपि।ध्यायंस्तुवंस्तस्य यशस्त्रि-सन्ध्यं वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम्॥8॥ ( श्री श्री गुर्वाष्टक) अनुवाद:- श्रीगुरुदेव की कृपा से भगवान्‌ श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है। श्री गुरुदेव की कृपा के बिना कोई भी सद्‌गति प्राप्त नहीं कर सकता। अतएव मुझे सदैव श्री गुरुदेव का स्मरण व गुणगान करना चाहिए। कम से कम दिन में तीन बार मुझे श्री गुरुदेव के चरणकमलों में सादर वन्दना करनी चाहिए। गुरुजन प्रसन्न हैं तो फिर भगवान प्रसन्न हैं इसे दोनों तरह से कहा जा सकता है भगवान प्रसन्न हैं तो गुरु प्रसन्न हैं, गुरु प्रसन्न हैं तो भगवान प्रसन्न हैं। भगवान ने कहा ही है कि वह भक्त मुझे प्रिय है जो इस संदेश को औरों के पास पहुंचाता है। न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः । भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥ ( श्रीमद् भगवतगीता १८.६९) अनुवाद:- इस संसार में उसकी अपेक्षा कोई अन्य सेवक न तो मुझे अधिक प्रिय है और न कभी होगा। आप भगवान के प्रिय भक्त हो। वैसे यह ग्रंथ वितरण का प्रयास अथवा सेवा करके आप भगवान के प्रियतर बने हो अर्थात अधिक प्रिय बने हो। यह सेवा करके या प्रचार करके अथवा ग्रंथों का वितरण करके पहले आप जितने प्रिय थे, उससे अधिक प्रिय बन गए हो। आप अधिक प्रिय बने हो तो हम आपसे अधिक प्रसन्न हैं, मैं अधिक प्रसन्न हूं। ठीक है। (पदमाली, इस सेशन का सार अथवा निष्कर्ष निकाल यहीं विराम देते हैं।) पदमाली- जी गुरु महाराज! पदमाली प्रभु- जैसा कि आप सब गुरु महाराज से व्यक्तिगत रूप से गुरु महाराज की प्रसन्नता के विषय में श्रवण कर रहे थे।इसे आप एक आदान प्रदान कह सकते हैं कि आपकी सेवा भगवान ने स्वीकार कर ली है। एक बार गुरु महाराज अरावड़े में क्लास दे रहे थे तो एक भक्त ने प्रश्न पूछा कि गुरु महाराज हमने जो सेवा की है,उससे भगवान संतुष्ट हैं या नहीं है, कैसे पता लगा सकते हैं? गुरु महाराज ने उसका बड़ा अच्छा उत्तर दिया था। गुरु महाराज ने कहा था। वैसे लगभग गुरु महाराज ने आज भी वही कहा है। गुरु महाराज ने कहा कि यह जानने के दो रास्ते हैं- एक तो अगर आप स्वयं प्रसन्न या संतुष्ट हैं जैसा कि गुरु महाराज ने आज कहा आपके हृदय में आपको संतुष्टि फील (अनुभव) हो रही है, दूसरा गुरु महाराज ने कहा वैष्णव या गुरुजन प्रसन्न हैं। अगर यह दोनों पैरामीटर (माप) पूरे हुए हैं तब आप मान लीजिए कि भगवान आपकी सेवा से प्रसन्न हैं या भगवान ने आपकी वह सेवा स्वीकार की है। गुरु महाराज ने आपको फिर से व्यक्तिगत रूप से सबको बता ही दिया कि वह कितने प्रसन्न हैं, उस से सीधा कनेक्शन (संबंध) बैठ सकता है। गुरु महाराज ने स्वयं बताया कि आप सबकी सेवा से भगवान भी प्रसन्न हैं, भक्त तो हैं ही। श्रील प्रभुपाद परंपरा में प्रसन्न हैं और आज विशेष रूप से श्रील जीव गोस्वामी का तिरोभाव दिवस है और एक आचार्य तो नहीं, महाप्रभु के एक परिकर जगदीश पंडित का तिरोभाव दिवस है जो कि जगन्नाथ मिश्र और शची माता के पड़ोसी रहे हैं। आप उनके बारे में और पढ़ व जान सकते हैं। गौड़ीय इतिहास में थोड़ा पढ़ कर उसका भी ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं व अन्यों को अपने नाम हट्ट या प्रीचिंग प्रोग्राम में भी बता सकते हो । महाप्रभु के परिकरों के बारे में भक्तों को बता सकते हैं, जागृत कर सकते हैं। आप सब का धन्यवाद है। आप सब बने रहे। आज कुछ इंटरनेट के इश्यू थे, उस वजह से थोड़ा दिक्कत आ रही थी। कल संभवत: जिस प्रकार से गुरु महाराज ने इच्छा व्यक्त की है तो हम प्रयास करेंगे कि हमारे कुछ ब्रह्मचारी भक्त आगे आकर हमें बुक वितरण के अपने अनुभव और साक्षात्कारों के साथ प्रोत्साहित करें, कल हम उसको करने का प्रयास करेंगे। धन्यवाद। विशेष धन्यवाद गुरु महाराज जी का, इतनी टेक्निकल प्रॉब्लम्स के बाद भी गुरु महाराज वापस आए और हम सब को अपना संग दिया। धन्यवाद गुरु महाराज । आज के सेशन को हम यहीं पर विराम देते हैं। श्रील जीव गोस्वामी तिरोभाव महा महोत्सव की जय ! श्रील जगदीश पंडित तिरोभाव महा महोत्सव की जय! वैष्णव ठाकुर की जय! श्रील प्रभुपाद की जय! परम पूजनीय लोकनाथ स्वामी महाराज की जय!

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16 January 2021 The glorious disappearance day of Srila Jiva Goswami Hare Krsna! Devotees from over 734 locations are chanting with us right now. jaya jaya sri krsna caitanya nityananda sri jayadvaita-candra jaya gaura bhakta vrnda Translation O Lord Sri Krsna Caitanya Mahaprabhu, all glories to You. O Prabhu Nityananda, all glories to You. O Lord Advaitacandra, all glories to You. O devotees of Lord Gauranga, all glories to You all. Today is the disappearance day of Srila Jiva Goswami, Srila Jiva Goswami tirobhava maha mahotsava ki jai! Srila Jiva Goswami is pratah smarniya, meaning he is a personality to be remembered in the morning. We should reserve our mornings to remember some special personalities. Morning time is very special and pure. Brahma muhurta is favourable for achieving Brahma. In such a muhurta we should remember Krsna, His devotees and saints. Whatever topics are suitable for remembering should be remembered in the morning. As I said, pratah smarniya. Srila Jiva Goswami is to be remembered in the morning and then we cannot only say in the morning but at all times, morning, afternoon and evening. The Gaudiya Vaisnavas are celebrating the disappearance day of Srila Jiva Goswami. By the mercy of Sri Caitanya Mahaprabhu we are also becoming Gaudiya Vaisnavas now. Amongst the Vaisnavas, Gaudiya Vaisnavas are superior. To make us Gaudiya Vaisnavas He has made many arrangements and amongst them are these Sad Goswami Vrinda and their efforts. Their goal was also making the whole world Gaudiya Vaisnavas. nana-sastra-vicaranaika-nipunau sad dharma-samsthapakau lokanam hita-karinau tri-bhuvane manyaou saranyakarau radha-krsna-padaravinda-bhajananandena mattalikau vande rupa-sanatanau raghu-yugau sri-jiva-gopalakau Translation I offer my respectful obeisances unto the six Gosvamis, namely Sri Rupa Gosvami, Sri Sanatana Gosvami, Sri Raghunatha Bhatta Gosvami, Sri Raghunatha dasa Gosvami, Sri Jiva Gosvami, and Sri Gopala Bhatta Gosvami, who are very expert in scrutinisingly studying all the revealed scriptures with the aim of establishing eternal religious principles for the benefit of all human beings. Thus they are honoured all over the three worlds and they are worth taking shelter of because they are absorbed in the mood of the Gopis and are engaged in the transcendental loving service of Radha and Krsna. [Sri Sad Goswami -astaka] Srinivas Acarya was a great Gaudiya Vaisnava acarya. He wrote this Sad Goswami-astaka. We have sung one of the astakas he has mentioned there. vande rupa-sanatanau raghu-yugau sri-jiva-gopalakau He offers respectful obeisances unto the six Gosvamis, and while offering obeisances and writing about them, he teaches us to offer obeisances. If you want to offer obeisances you should offer obeisances to these Sad Goswami Vrinda. vande rupa - offer obeisances to Rupa Goswami, Sanatana Goswami, Jiva Goswami and Gopal Bhatta Goswami. Raghu yugau - there were two Raghus, Raghunath Bhatta Goswami and Raghunatha Dasa Goswami. Srinivasa Acarya is inspiring us to offer obeisances to these Goswamis. These Sad Goswamis were from different places. Gopal Bhatta Goswami was from South India, Srirangam Raghunath Bhatta was from Varanasi, Uttar Pradesh Raghunath Dasa was from Saptagram, Bengal Remaining 3 Goswami were from Ramkeli, Bengal They were born at different places and by the arrangement of Sri Krsna Caitanya Mahaprabhu they reached Vrndavana and their team is famous as the Sad Goswami Vrinda. Associates of Caitanya Mahaprabhu stayed in Mayapur, Jagannatha Puri and then in Vrndavana. Amongst the associates of Caitanya Mahaprabhu who stayed at these three different places, Sad Goswami Vrinda have a special position. Among these Sad Goswamis, Srila Jiva Goswami has a special position. He was born at Ramkeli. When Caitanya Mahaprabhu had gone to Ramkeli He had met Dabir Kasa and Sakara Mallik. They were finance ministers of King Husain Shah. Sri Krsna Caitanya Mahaprabhu initiated them and named them Rupa Goswami and Sanatana Goswami. He also made them His associates. At that time Jiva Goswami was a child and he had not met or talked to Sri Krsna Caitanya Mahaprabhu. Later also he did not meet Sri Krsna Caitanya Mahaprabhu. Rupa, Sanatana and Anupama were three brothers. Amongst these three brothers Anupam died and his son was Jiva Goswami. That means Rupa and Sanatana were the uncles of Jiva Goswami. Since Jiva Goswami’s father had died, he was detached from this material world. Jiva Goswami wanted to join his uncles, Rupa and Sanatana. Since childhood he was very attached to Gauranga and Nityananda. He learnt how to worship the Deities of Krsna and Balarama. Along with the worship of Krsna Balarama, he also worshipped Gaura Nityananda. Jiva Goswami gave some reason and left home and went straight to Mayapur to the house of Srinivas Thakur which is where Nityananda Prabhu was staying in those days. Reaching there he surrendered himself at the lotus feet of Nityananda Prabhu. Nityananda Prabhu gave Jiva Goswami His association. He did Navadvipa mandala Parikrama with Jiva Goswami and showed Navadvipa to him. Nityananda Prabhu became the guide as He is Adi guru. He took Jiva Goswami on yatra and introduced Jiva Goswami to other devotees. Yogapitha was the residence of Nimai. In those days Caitanya Mahaprabhu had taken sannayasa and He had reached Jagannatha Puri. He also completed His 6 year South India yatra. Madhya lila pastimes were also completed. At the same time Caitanya Mahaprabhu ordered Nityananda Prabhu to preach in Bengal. sarvatra amar ajna koroho prakas prati ghare ghare giya koro ei bhiksa bolo `krsna', bhajo krsna, koro krsna-siksa iha bai arna boliba, bolaiba dina-avasane asi' amare kohiba Translation Make My command known everywhere! Go from house to house and beg from all the residents, `Please chant Krsna's name, worship Krsna, and teach others to follow Krsna's instructions.' Do not speak, or cause anyone to speak, anything other than this. [CB Madhya-Khanda 13.8-10] Caitanya Mahaprabhu sent Nityananda Prabhu to Bengal and that was why Nityananda Prabhu was in Mayapur. He took Jiva Goswami to Sacimata’s house at Yogapitha. Sacimata offered them prasada which Visnupriya had cooked which Nityananda Prabhu and Jiva Goswami honoured. When we hear these pastimes they are very special and thrilling. In those days the manifested pastimes of Caitanya Mahaprabhu and Nityananda Prabhu were taking place. From there Nityananda Prabhu sent Jiva Goswami to Vrndavana and on the way to Vrndavana he stopped at Varanasi where he learnt Sanskrit from a disciple of Sarvabhauma Bhattacarya, Madhusudan Vachaspati. Varanasi is famous as a seat of learning, as a university. Srila Jiva Goswami studied grammar and became an expert in Sanskrit grammar. Then he headed towards Vrndavana. There he was blessed by the association of the Goswamis. Amongst the six Goswamis of Vrndavana he was the youngest. In Vrndavana, Jiva Goswami received initiation from Rupa Goswami. Sad Goswamis have established different temples in Vrndavana. This was the order and desire of Caitanya Mahaprabhu that the opulence of Vrndavana be re-established and there should be preaching and glorification of Govardhana, Vrndavana Biharilal and Yamuna. Due to the attacks of Muslims, Vrndavana had been deserted and Deity worship, darsana and Parikrama had been stopped. In such a situation Caitanya Mahaprabhu was sending one Goswami at a time. The first Goswamis sent to Vrndavana were Lokanath Goswami and Bhugarbha Goswami. They are not included in the team of Sad Goswamis, but they were also sent. Sad Goswamis were sent and Prabhodananda Saraswati also reached from Srirangam. He was the uncle of Gopal Bhatta Goswami. Other Goswamis would soon be joining them, Srinivas Acarya, Narottam Dasa Thakura and Syamananda Pandit. Such a team was arriving there. Sri Krsna Caitanya Mahaprabhu wanted Vrndavana to be glorified all over and also be established and worshipped, specially sastra, as Books are the basis. tasmac chastram pramanam te [BG 16.24] Caitanya Mahaprabhu also desired that the Sad Goswamis should write books. sri-caitanya-mano-'bhistam , this was abhista or the desire of Caitanya Mahaprabhu and the Sad Goswamis knew it and accordingly they were busy writing books. Jiva Goswami now had started staying at Damodara temple. He was worshipping Radha Damodara. Before I forget, today we are celebrating his disappearance day as he entered the pastimes of Radha Krsna in the temple of Radha Damodara. His samadhi is also there in the temple. I keep telling you all always before going to America and after he became vanaprastha, Srila Prabhupada came to Vrndavana and stayed at Radha Damodara temple established by Jiva Goswami. He did all his preparation of going to the West here in this temples. He wrote books here. The first time I went to Vrndavana I first went to Radha Damodara temple as Srila Prabhupada stayed there and took darsana of Radha Damodara. I always pay my obeisances at the samadhi of Srila Jiva Goswami. All the Sad Goswamis would assemble in the Radha Damodara temple courtyard. nana-sastra-vicaranaika-nipunau Translation The Sad Goswamis were very expert in scrutinisingly studying all the revealed scriptures. They would hold their discussions here with the aim of establishing eternal religious principles for the benefit of all human beings. bodhayantah parasparam [BG 10.9] dadāti pratigṛhṇāti guhyam ākhyāti pṛcchati bhuṅkte bhojayate caiva ṣaḍ-vidhaṁ prīti-lakṣaṇam Translation Offering gifts in charity, accepting charitable gifts, revealing one’s mind in confidence, inquiring confidentially, accepting prasāda and offering prasāda are the six symptoms of love shared by one devotee and another. [NOI 4th verse] All the Sad Goswamis would stay in Radha Damodara temple courtyard and all discussion would happen there. They would honour prasada. The young Jiva Goswami would sponsor all the arrangements and serve the Goswamis. Jiva Goswami specially served Rupa Goswami, his spiritual master in the last days of his life. There we have Rupa Goswami’s samadhi mandir and bhajan kutir. Srila Prabhupada stayed there and did his bhajan there and prepared himself to preach in the whole world. The first Kartik festival was celebrated at Radha Damodara temple in 1972. I also took part in the festival. Srila Prabhupada gave me initiation in the same temple in Vrndavana in Kartik. In this way I also have a close attachment with the temple and the Sad Goswamis especially with Jiva Goswami. Prabhupada gave me the name Lokanath in Radha Damodara temple and then in the Krishna Balarama temple he gave me sannyasa initiation and said to add Swami to my name. I then became Lokanath Swami. Prabhupada made me a Swami. All this is the mercy of Srila Jiva Goswami. You read more about Jiva Goswami, recite his glories to others and remember Jiva Goswami. He is glorified for his intelligence. It's said that the world has not seen any genius like Jiva Goswami. He wrote 4 lakh slokas and the only other personality who wrote 4 lakh slokas is Srila Vyasa Dev. He wrote many books, amongst them Sad Sandarbha is famous which glorifies Srimad Bhagavatam. His books are our matchless gifts. He has also written commentary on Srimad Bhagavatam, Gopal Campu. He has also written a commentary on Brahma Sahmita. To teach grammar he wrote Harinam Amrita Vyakran, learning grammar while reciting the names of Hari so that grammar is not dry, but full of mellow. BHU Banarasa Hindu University has a special department under the name of Jiva Goswami where all his books are studied and people pursue PHD in those subjects. We should read the books written by him. Jai Srila Jiva Goswami tirobhava maha-mahotsava ki jai Hare Krsna!

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