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जप चर्चा, 15 जनवरी 2020, पंढरपुर धाम. जय श्रीकृष्णचैतन्य प्रभु नित्यानंद। श्रीअद्वैत गदाधर श्रीवास आदि गौरभक्तवृंद।। 700 स्थानों से भक्त आज हमारे साथ जुड़े हुए हैं। हरि हरि, गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल! सुप्रभातम, आप सब का स्वागत है। माल्यार्पण के साथ मेरा भी स्वागत कर रहे हैं यहां पर। अच्छा होता कि आपके गले में माला होती, कंठी माला तो है। तुलसी महारानी की जय! एक माला तो हमेशा के लिए है आपके गले में। पता है ना आपको? इस माला को देखकर फिर यमदूत दूर से प्रणाम करते हैं या फिर भाग जाते हैं। ऐसा आदेश हुआ है यमदूतों को। हे यमदूतों ! जिनके गले में कंठी माला नहीं हैं,आप इनको ले आना, और जिनके गले में कंठी माला है, उन्हे मत लाना। वैसे जिन कुत्तों के गले में पट्टा होता है। उनको नगरपालिका की जो डॉग वेन होती हैं, नगरपालिका के लोग आते हैं कुत्तों को पकड़ने के लिए। उन कुत्तों को जिनका कोई मालिक नहीं है ऐसे ही भोंकते रहते हैं। और वह कुत्ते जिनके गले में पट्टा नहीं है मतलब मालिक नहीं है उनको पकड़ कर ले जाते हैं। लेकिन अगर पट्टा है तो उनको छूते नहीं है। उनसे दूर रहते हैं। ऐसी बात है हमारी गले में कंठी माला है, मतलब हमारा कोई मालिक है स्वामी है। गुरुजन स्वामी भी होते हैं। गुरुजन भी बन जाते हैं स्वामी। यह पहनाते हैं कंठी माला हमारे गले में। गले में तुलसी की कंठीमाला और हाथ में तुलसी की जप माला और फिर आप सुरक्षित हो जाते हैं। और वैसे स्वामियों के स्वामी जगन्नाथ इस जगत के नाथ है उनके बन जाते हैं हम दास बनते हैं तो फिर हमारी रक्षा हो जाती हैं। ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽजुर्न तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया৷৷18.61৷৷ भावार्थ : हे अर्जुन! शरीर रूप यंत्र में आरूढ़ हुए संपूर्ण प्राणियों को अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उनके कर्मों के अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियों के हृदय में स्थित है ৷৷18.61॥ ईश्वरः सर्वभूतानां गीता के अंत में भगवान कह रहे हैं। ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽजुर्न तिष्ठति। भगवान कह रहे हैं अर्जुन को। ईश्वरः तिष्ठति हे अर्जुन समझ में आया ईश्वरः तिष्ठति कुत्र तिष्ठति ईश्वरः कहां रहते हैं? ईश्वर हृद्देशे हृदय देश प्रदेश में ईश्वर रहते हैं। हृद प्रदेश। कौन कह रहे हैंं यहां परमेश्वर ही कह रहे। अर्जुन सेेे कह रहे और ऐसी बात कर रहे हैं मानो कहने वालों का कोई संबंध नहीं है ईश्वर से। ईश्वर है ना, ईश्वरःसर्वभूतानां हृद्देशेऽजुर्न तिष्ठति। श्रीकृष्ण यहां पर पूरी तरह से अनासक्त हैं। ऐसा कह रहे हैं मानो और ही कोई ईश्वर है और वह तुम्हारेे हृदय में है। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया भ्रामयन्सर्वभूतानि, सर्वभूतानि भ्रामयन सब जीव क्या करते हैं, भ्रमण करते हैं। यन्त्रारुढानि मायया माया से बने हुए माया से बनाए हुए यंत्र में आरूढ़ होकर, भूतानि मतलब बद्घ जीव भ्रमण करते है। और फिर यहां यंत्र की जो बात हुई तो यह यंत्र शरीर है। शरीर को यंत्र कहा गया हैं, वस्त्र कहा गया है या फिर कहीं वृक्ष कहा है। ऐसी कई सारे उपमाये या फिर शरीर की कई सारी तुलना हुई है। यन्त्रारुढानि मायया या फिर 8400000 प्रकार के यंत्र है। ऐसा नहीं है कि, भगवान केवल मनुष्य के हृदय में ही रहते हैं। भगवान तो सभी जीवो के ह्रदय में रहते हैं ऐसा भगवान नेे कहा। तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्‌৷৷18.62৷৷ अनुवादः हे भारत! पूरी तरह से भगवान की शरण में जाओ। उनकी कृपा से तुम्हें दिव्य शांति और सनातन परमधाम की प्राप्ति होगी। श्रीभगवान उवाच तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत तम एवं तम ईश्वर एवं भगवान श्रीकृष्ण ने कहा ईश्वर का परिचय दिया, वह तो वे बहुत समय से देते आ रहे हैं। कुरुक्षेत्र के मैदान में सेनोर्योभयमध्ये दोनों सेना के मध्य में। अब सारांश मेंं उन्होंने पुनः कहा पहले भी ऐसे कह चुके थे। सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टोमत्तः 15 में अध्याय में अभी पुनः कह रहे हैं सर्वस्य चाहं वहां तो अहम की बात किए थे मैं रहता हूं सबके हृदय प्रांगण में, मैं रहता हूं ऐसा भगवान ने एक बार कहा था। अब पुनः कह रहे हैं लेकिन अब यहां अहम की बात नहीं कर रहे हैं। यहां पर ईश्वर है और अब ऐसेे ईश्वर को अर्जुन पहचान चुके हैं।कौन हैैैै ईश्वर, कौन है परमेश्वर। परम ब्रह्मा परममधाम, पवित्रान परमम भवान आप ईश्वर हो। ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽजुर्न आप ईश्वर हो। आदिदेव आजमम भवान यहां सब यह सब साक्षात्कार हो चुके हैं। तो अब कृष्ण यहां अलग से नहीं कह रहे हैं। मैं हूंं ईश्वर या मैं कहां रहता हूं सभी के ह्रदय प्रांगण में। अर्जुन तो इस बात को भलीभांति समझ चुके हैं। यह सोचकर भी पता नहीं भगवान क्या क्या और कैसे सोचते हैं। और हम सोच रहे हैं भगवान नेे ऐसा सोचा ही होगा कि अर्जुन तो जानता ही है कि मैं ही वह परमेश्वर हूं। उसने कह दिया उसने अपने मुख से कहा कि, आप परम ब्रह्मा परममधाम और आदिदेवम अब अलग से कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। हरि हरि पुरुषम शाश्वतम दिव्य आदिदेव तमेव शरणं गच्छ अच्छा है सरल संस्कृत है। तमेव शरणं गच्छ उन्हीं के शरण में जाओ। तमेव शरणं गच्छ और कैसे शरण जाओ पिछले श्लोक में भी भारत कह रहे हैं। सर्वभावेन भारत कहीं अर्जुन कहा था उन्होंने पिछले श्लोक में भी भारत कह रहे हैं। बताया है कृष्ण कैसे सारे संबोधनो का उपयोग करते हैं। अर्जुन को संबोधित करते हैं। और फिर अर्जुन भी कृष्ण को कई सारे नामों से संबोधित करते। है वह भी एक विषय हैैै गीता का। पूरे भावभक्ति के साथ शरण लो। तत्प्रसादात्परां शान्तिं ऐसा करने से क्या होगा तत्प्रसादात्परां अर्जुन कहने वाले हैं। भगवान आप मुझे गीता का उपदेश सुनाएं, तत्प्रसादाम यह आपका प्रसाद रहा। यह आपका कृपा प्रसाद रहा। कृष्ण भी स्वयं कह रहे हैं, तत्प्रसादात्परां शान्तिं तुम सब गीता का प्रसाद अमृत उपदेश सुनोगे गीता अमृत का पान करेंगे तब साक्षात्कार होगा। इसके श्रवण चिंतन मनन और कीर्तन तुम भी कुछ सुना सकते हो। क्या समझे तुम गीता के संबंध में ऐसा जब तुम कुछ करोगे यही करना प्रसाद है। तुम्हें प्रसाद प्राप्त होगा। तुम प्रसाद ग्रहण करोगे। या भगवान की तुमने तम एव शरणम गच्छ तो कृपा प्रसाद प्राप्त हुआ। ऐसे तत्प्रसादात परां शांति प्रसाद भी प्राप्त हुआ। और उसके साथ साथ तुम शांति को प्राप्त करोगे कैसे शांति? परां शांति केवल शांति नहीं कहे, परां शांति सर्वोपरि शांत साधारण शांति नहीं। स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्‌ और शांति को ही प्राप्त करोगे। मतलब मन शांत होगा, तुम्हारा चित्त शांत होगा, इंद्रिय शांत होंगे और स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् इसी के साथ स्थानं प्राप्स्यसि त्वम प्राप्स्यसि स्थानं कैसा होगा? स्थान शाश्वतम् तुम शाश्वत स्थान को प्राप्त करोगे यहां तो शाश्वत स्थान भगवान के चरण कमल ही है। अयि नन्दतनुज किङ्करं पतितं मां विषमे भवाम्बुधौ। कृपया तव पादपंकज- स्थितधूलीसदृशं विचिन्तय॥5॥ अनुवाद- हे नन्दतनुज (कृष्ण)! मैं तो आपका नित्य किंकर (दास) हूँ, किन्तु किसी न किसी प्रकार से मैं जन्म-मृत्युरूपी सागर में गिर पड़ा हूँ। कृपया इस विषम मृत्युसागर से मेरा उद्धार करके अपने चरणकमलों की धूलि का कण बना लीजिए। प्रार्थना ही है श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु ने प्रार्थना की, मुझे आपके चरणों का दास, आपके चरणों की धूली का कण ही बनाईए हे प्रभु। तो वह स्थान, मेरे चरणों में स्थान प्राप्त होगा, मेरे चरणों की सेवा प्राप्त होगी। और अलग से कहने की आवश्यकता तो नहीं है मेरा धाम प्राप्त होगा मेरे धाम में लौटोगे जहां मैं रहता हूं। और तुम मुक्त हो जाओगे। मेरे सायुज्य मुक्ति को तो तुम ठुकराने वाले हो लेकिन और भी मुक्तिया है। सालोक्य है, सामिप्य है, सार्शष्टि है, सारुप्य है, इसमें से कोई भी मुक्ति तुम को प्राप्त होगी। यह तुम्हारे स्वरूप के अंतर्गत मतलब भगवान का सामिप्य, संनिधि या सालोक्य उसी लोक में रहो जहां कृष्ण रहते हैं। सालोक्य, सामीप्य, सारुप्य मतलब भगवान का स्वरूप सच्चिदानंद विग्रह है। कम से कम भगवान सच्चिदानंद विग्रह है। विग्रह मतलब रूप। तो तुम को भी सच्चिदानंद विग्रह रूप प्राप्त होगा। और सार्शष्टि, तुम मेरे पुत्र होंगे, मेरे परिवार के सदस्य होंगे, मेरा वैभव फिर तुम्हारा ही वैभव है, तुम्हारे ही सेवा में है, बाप जैसा बेटा। वैसे कृष्ण कहे है गीता के अंत में जहां अर्जुन है धनुर्धर अर्जुन और जहां योगेश्वर कृष्ण है तत्र श्री उल्लेख हुआ वहा होगा वैभव वहा समृद्धि होगी। हरि हरि। तो स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् मेरेेेे धाम को तुम प्राप्त होंगे। हरि हरि! विफले जनम गोङाइनु। मनुष्य जनम पाइया, राधाकृष्ण ना भजिया, जानिया शुनिया विष खाइनु॥1॥ तो कृष्ण निष्कर्ष मे कह रहे हैं, निष्कर्ष ही चल रहा है गीता का यहां। निष्कर्ष की बातें भगवान यहां कर रहे हैं लेकिन दुर्दैव क्या है? मनुष्य जन्म तो प्राप्त हुआ है और हम राधा कृष्णा का भजन नहीं कर रहे हैं। या दुर्दैव से भगवदगीता का पाठ नहीं कर रहे है। या गीता, भागवत का श्रवण नहीं कर रहे हैं या हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे नहीं कर रहे हैं। तो फिर हमारे आचार्य कहते हैं *जानिया शुनिया विष खाइनु हम जहर पी रहे हैं, वह एक दूसरी दुनिया है या दूसरा जगत है। मनुष्य जन्म तक प्राप्त हुआ है लेकिन राधा कृष्ण का भजन नहीं कर रहे हैं। हरी हरी। ऐसे लोगों को आप जानते होंगे, संभावना है कि ऐसे लोग आपके घर में भी हो सकते हैं, पड़ोस में हो सकते हैं। तो उनका क्या होगा? हरि हरि। तो इसीलिए फिर भगवान ऐसी अपेक्षा रखते हैं। इसीलिए गीता का प्रचार अनिवार्य है। भगवान तो यहां सब कुछ कह कर गए हैं, कह गए मतलब भूतकाल की बात नहीं है। कह रहे हैं ऐसा हम को समझना चाहिए। भगवान ने एक समय जो बात कही भगवदगीता का उपदेश सुनाया, उपदेश सुना ही रहे हैं भूतकाल की बात नहीं है। भगवान की हर लीला वैसे नित्य लीला होती है। तो कहीं ना कहीं या और किसी ब्रह्मांड में इस समय भगवान कह रहे होंगे या नहीं तो उसकी कोई परवाह नहीं है। गीता के वचन या गीता तो हमको प्राप्त हुई है और उसको हम जब पढ़ते हैं तो हमें समझना चाहिए कि भगवान सुना रहे हैं भगवदगीता अभी यहीं मुझे सुना रहे हैं भगवान। और फिर भगवान जिनको सुना रहे हैं यह गीता उनको कृष्ण ने यह बात भी सुनाई है कि, हे गीता को सुनने वालों या गीता के ज्ञान को, उपदेश को प्राप्त किए हुए ओ लोगो आप क्या करो इस संवाद को औरों तक पहुंचाओ। जानिया शुनिया विष खाइनु लोग जो जानबूझकर जहर पी रहेेे है उनको समझाओ, बुझाओ, प्रार्थना करो ताकि वे गीतामृत का पान करेंगे। ऐसा जब प्रयास आपका होगा न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तम: और ऐसा भक्त, ऐसा प्रचारक, ऐसे गीता का वितरक मुझे अति प्रिय है। वैसे भगवान तो कह रहे हैं उससे और कोई प्रिय नहीं है न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तम: । यह मैंने श्लोक नहीं बनाया, यह तो कृष्ण ने कहा आपको कई बार कहे हैं ही, आज भी कह रहे हैं। क्योंकि आज भी हम सुनना चाहते हैं आपसे आप के अनुभव गीता के श्रवण के और गीता के वितरण के। तो यह आखरी दिन है और अंतिम अवसर है। न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तम: । भविता न च मे तस्मादन्य: प्रियतरो भुवि ॥ ६९ ॥ अनुवाद - इस संसार में उनकी अपेक्षा न तो कोई अन्य सेवक मुझे अधिक प्रिय है और न तो कभी होगा किन की अपेक्षा? इसको समझने के लिए फिर पहले वाला जो 68 वाला श्लोक है उसे आपको सुनाना होगा उसका अनुवाद है.. य इदं परमं गुह्यं मद्भ‍क्तेष्वभिधास्यति । भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशय: ॥ ६८ ॥ अनुवाद - जो व्यक्ति भक्तों को यह परम रहस्य बताता है, यह परम रहस्य गीता का जो है, भक्तों को, श्रद्धालु जनों को, लोगों को जो सुनाता है वह शुद्ध भक्ति को प्राप्त करेगा। एक तो वह शुद्ध भक्ति को प्राप्त करेगा ऐसा वरदान भी है भगवान का और अंत में वह मेरे पास आएगा। हरि बोल। वैसे एक एक बात बड़ी महत्वपूर्ण है, हम उसकी चिंता नहीं करते। बस कोई मोटा मोटा करमन्ये वाधी कारस्ते इतना ही हम लोग जानते हैं बस खत्म हुआ। लेकिन भगवान ने हजारों बातें कही है छोटी मोटी। छोटी है ही नहीं भगवान की कही हुई बातें तो मोटी ही होती हैं, महत्वपूर्ण है। हम लोग नोट नहीं करते हैं तो कभी-कभी ऐसे छिप जाती हैं। भगवान ने यह भी कहा कि जो इस परम रहस्य को औरों को बताता है, गीता के ज्ञान का भक्ति का प्रचार प्रसार करता है तो वह शुद्ध भक्ति को को स्वयं प्राप्त करेगा और वह मेरे पास वापस आएगा। और ऐसे भक्तों की अपेक्षा कोई अन्य सेवक ना तो मुझे अति प्रिय है और ना कभी होगा। हरि हरि। हरे कृष्ण।

English

15 January 2021 Distribute the Bhagavad Gita and attain pure devotional service Today we have devotees chanting from 706 locations.Gaura Premanande Hari Haribol ! Good morning! Welcome! I am also welcomed by being honoured with a flower garland. I wish you all could get such garlands. You are wearing Tulsi beads garland already. Tulsi maharani ki Jai ! You are wearing one garland permanently around your neck. Messengers of death (Yamdutta) also go back by looking at the Tulsi garland around someone’s neck. Are you aware of this ? It is an order to the messengers of death - Do not to touch the person who is wearing Tulasi beads around his/her neck and never bring such devotees to Yamalok. In reality we see that the municipality workers catch and take away the stray dogs wandering on the streets who are always barking without reason. They catch the dogs who do not have a collar around their neck which means they do not have a master. If a collar is present then they do not catch such a dog. The workers keep their distance from them. If we have Tulasi beads around our neck it means we have our master or owner. Our spiritual masters also become our Swami or owner. They give us a Kanthi Mala for wearing around the neck and Tulsi Mala for Japa chanting. Then you are safe. Actually Jagannatha is the owner (Swami) of all owners (Swami). Then we become Their servant and we get all kinds of protection. īśvaraḥ sarva-bhūtānāṁ hṛd-deśe ’rjuna tiṣṭhati bhrāmayan sarva-bhūtāni yantrārūḍhāni māyayā Translation The Supreme Lord is situated in everyone’s heart, O Arjuna, and is directing the wanderings of all living entities, who are seated as on a machine, made of the material energy. (BG 18.61) At the end of Bhagavad Gita the Lord said - hṛd-deśe ’rjuna tiṣṭhati. It means hrd deshe ishwarah tishatai O Arjuna! Have you understood? Trata tishatati The Lord resides in hrd deshe : hrd is heart and deshe is area. The Lord resides in hrd pradesh. The Lord is narrating this to Arjuna. He is explaining in such a way that the Lord is appearing to be speaking about someone else. He is asking Arjuna if he knows the Lord who resides in everyone’s heart. Kṛṣṇa is kind of completely detached. The living entities are wandering in this material world which is like a machine made by the illusionary energy of the Lord. Living entities enter in this machine and wander for many lives. The machine refers to the body. In Bhagavad Gita the body is compared to a tree or chariot sometimes. Here it is referred to as a machine. This machine is of 84,00,000 types. It is not that the Lord resides in the heart of a human's body only. He is present in the heart of all living entities. The Lord has said, tam eva śaraṇaṁ gaccha sarva-bhāvena bhārata tat-prasādāt parāṁ śāntiṁ sthānaṁ prāpsyasi śāśvatam Translation O scion of Bharata, surrender unto Him utterly. By His grace you will attain transcendental peace and the supreme and eternal abode. (BG 18.62) Kṛṣṇa has given an introduction of the Lord. He has given information about the Lord many times during narration of Bhagavad Gita on the battlefield of Kurukshetra. arjuna uvāca senayor ubhayor madhye rathaṁ sthāpaya me ’cyuta yāvad etān nirīkṣe ’haṁ yoddhu-kāmān avasthitān kair mayā saha yoddhavyam asmin raṇa-samudyame Translation Arjuna said: O infallible one, please draw my chariot between the two armies so that I may see those present here, who desire to fight, and with whom I must contend in this great trial of arms. (BG 1.21, 22) While standing in between the two armies the Lord had earlier said, sarvasya cāhaṁ hṛdi sanniviṣṭo mattaḥ smṛtir jñānam apohanaṁ ca vedaiś ca sarvair aham eva vedyo vedānta-kṛd veda-vid eva cāham Translation I am seated in everyone’s heart, and from Me come remembrance, knowledge and forgetfulness. By all the Vedas, I am to be known. Indeed, I am the compiler of Vedānta, and I am the knower of the Vedas. (BG 15.15) Now again He declared that He resides in the heart of all living entities. Earlier also He stated this, but now again He is explaining it. Here the Lord is not saying Himself. Rather He is using the term - the Lord. By this time Arjuna is totally convinced who is the Lord. arjuna uvāca paraṁ brahma paraṁ dhāma pavitraṁ paramaṁ bhavān puruṣaṁ śāśvataṁ divyam ādi-devam ajaṁ vibhum āhus tvām ṛṣayaḥ sarve devarṣir nāradas tathā asito devalo vyāsaḥ svayaṁ caiva bravīṣi me Translation Arjuna said: You are the Supreme Personality of Godhead, the ultimate abode, the purest, the Absolute Truth. You are the eternal, transcendental, original person, the unborn, the greatest. All the great sages such as Nārada, Asita, Devala and Vyāsa confirm this truth about You, and now You Yourself are declaring it to me. (BG 10.12 and 13) Arjuna accepts that the Lord is the original person, unborn and greatest. Arjuna has now realised all this in chapter 10. At the end Kṛṣṇa is not mentioning Himself as the Lord or that He is residing in the heart of all living entities separately. By then Arjuna is completely aware of all this. We do not know what the Lord has thought while narrating this but we assume that the Lord must have thought like this that Arjuna has now realised that I am the Lord. Arjuna had actually accepted this as said verse 10.12. There is no need to specify it again. Arjuna has said that the Lord is the original personality, unborn and eternal so one should surrender to Him. This is a good and easy to understand narration in Sanskrit. tam eva sharanam gancha means surrender to that Lord by sarva bhavan bharat. Now the Lord is calling him Bharat and in the last verse He called him Arjuna. Earlier I have explained how the Lord has addressed Arjuna by various names. Arjuna also addressed the Lord by many names. This is the topic of study in Bhagavad Gita. Here the Lord is instructing that we must take shelter with complete faith and devotion and you will attain peace of mind. Now Arjuna is going to say to Lord that the Bhagavad Gita which was narrated to Arjuna by the Lord is a special blessing (prasada) for him. Kṛṣṇa himself is also saying the same thing. When you study Bhagavad Gita then you will become realised. You will realise that taking shelter of the Lord is the real blessing of the Lord. Thus you will attain absolute peace along with blessings. It is not just ordinary peace of mind, but you will attain transcendental peace. Your mind will become peaceful along with all the sense organs. Not only this, but you will reach to the eternal abode of the Lord. That abode is eternal or permanent. The eternal place is actually the Lord’s lotus feet. ayi nanda-tanuja kińkaraḿ patitaḿ māḿ viṣame bhavāmbudhau kṛpayā tava pāda-pańkaja- sthita-dhūlī-sadṛśaḿ vicintaya Translation O son of Maharaja Nanda (Krsna), I am Your eternal servitor, yet somehow or other I have fallen into the ocean of birth and death. Please pick me up from this ocean of death and place me as one of the atoms at Your lotus feet. (Siksatakam Verse 5) This is prayer by Sri Krsna Caitanya Mahaprabhu, Please make Me a servant of Your lotus feet. The Lord is confirming that you will get this place and you will get service of His lotus feet. It is not necessary to mention this, but you will get His abode also. You will return to the abode where I am residing. In this way you will become free. You have already rejected sayujya liberation. But other types of liberation are also there, namely salokya, samipaya. You may get one of these liberations. You will get Samipaya or Salokya meaning stay in the same abode where Kṛṣṇa resides. You may attain the same form as the Lord. The Lord’s form is Saccidanand. You can also get such a form. As you are My son and you are My family so you will receive all My splendour. 'Like father, like son'. Kṛṣṇa has declared in Bhagavad Gita that wherever Lord Sri Krsna and Arjuna are present, in that place all prosperity and splendour will be present. Hari Hari! biphale janama gońāinu manuṣya-janama pāiyā, rādhā-kṛṣṇa nā bhajiyā, jāniyā śuniyā biṣa khāinu Translation 0 Lord Hari, I have spent my life uselessly. Having obtained a human birth and having not worshiped Radha and Krishna, I have knowingly drunk poison.(Dainya Bodhika Song 2 from the book Prarthana by Narottam Das Thakure verse 1 ) In conclusion Kṛṣṇa of the Bhagavad Gita Krsna is saying, “ It is unfortunate that after getting this human body, we do not worshiping Radha and Kṛṣṇa or unfortunately not study Bhagavad Gita or Srimad Bhagavatam or we do not chant Hare Krishna Hare Krishna Krishna Krishna Hare Hare Hare Rama Hare Rama Rama Rama Hare Hare Therefore our acaryas are indicating that even after getting all this knowledge we are intentionally drinking poison. It is a totally different world of people who have human bodies, but they are not at all worshipping Radha and Kṛṣṇa. Such people must be present around you. Possibility is that such people may be present in your house or they may be your neighbours also. That is why the Lord is expecting that Bhagavad Gita should be preached. The Lord has already narrated all this. It is not that this has happened in the past. We should know that this is happening in the present also. The Lord is still narrating this in some other universe at this time. All of the Lord’s pastimes are eternal pastimes as they keep manifesting somewhere. But that doesn't matter much as we have already received Bhagavad Gita. While we read Bhagavad Gita we should consider that Lord is talking to us. The Lord has told this to all of those who are reading it. Whoever is reading Gita or whoever is studying it, should spread its knowledge. Tell other people who are intentionally drinking poison so that they will be benefited by its nectar. When you put such efforts in spreading the message of the Lord then that devotee is very dear to the Lord. Actually the Lord has said that no one else is more dear to Me than such devotees. na ca tasmān manuṣyeṣu kaścin me priya-kṛttamaḥ bhavitā na ca me tasmād anyaḥ priya-taro bhuv Translation There is no servant in this world more dear to Me than he, nor will there ever be one more dear. (BG 18.69) I have not made up this verse. This is what Kṛṣṇa said. Today also He is saying the same thing. I want to hear from you your experience of Bhagavad Gita distribution. This is sort of the last chance for this. Refer to the 69 verses of chapter 18. The Lord is reminding us to listen carefully to this. In this world no one is more dear to Me and will never be dear. To know who is more dear to the Lord we should refer to the previous verse - number 68. The translation of that verse is, "a person who spreads this supreme secret to devotees or to faithful people will attain pure devotional service." This is the boon given by the Lord and at the end of his life he will come to Me. This is very important. People know only one verse from Bhagavad Gita and that is this. karmaṇy evādhikāras te mā phaleṣu kadācana mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo ’stv akarmaṇ Translation You have a right to perform your prescribed duty, but you are not entitled to the fruits of action. Never consider yourself the cause of the results of your activities, and never be attached to not doing your duty. (BG 2.47) The Lord has actually said many, many important things. All the narrations by the Lord are great and important and sometimes they remain hidden. The Lord has also said that whoever narrates this supreme secret to others and who distributes and preaches the knowledge given in the Bhagavad Gita he will attain pure devotional service and will return to Him. No one else is more dear to me. This is spoken by the Lord. All right we will stop here.

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