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हरे कृष्ण। जप चर्चा, पंढरपुर धाम से, 7 जनवरी 2021 आज 820 स्थानों सें अविभावक जप कर रहे हैं जय गौरांग...! ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय। बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते | वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः || (श्रीमद्भभागवतगीता 7.19) अनुवाद: -अनेक जन्म-जन्मान्तर के बाद जिसे सचमुच ज्ञान होता है, वह मुझको समस्त कारणों का कारण जानकर मेरी शरण में आता है | ऐसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ होता हैं | वासुदेवः सर्वमिति वासुदेव ही क्या है?, कोन है? वासुदेव ही सबकुछ हैं। वासुदेवः सर्वम इसको ज्ञान कहते हैं। संपूर्ण ज्ञान हुआ आपको, क्या समझने से वासुदेव सर्वम। इतना ही जानना हैं। कितना जानना है? वासुदेव सर्वम वासुदेव ही सबकुछ हैं। शौनको ह वैसे महाशालोडि्गरसं विधिवदुपसन्न: पप्रच्छ। कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति।। (मुण्डकोपनिषद् 1.3) अनुवाद: - महाशालाआधीपति शौनक अंगिरस के पास विधिवत शिष्य रूप में आये और उनसे पूछा: -है भगवान! क्या है जिसे जान लेने के पश्चात यह सब कुछ ज्ञात हो जाता हैं। कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति।। जीनको जानकर सर्वमिदं सब जानते हैं कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते तब समझ में आता है जानना पुरा हुआ भगवान को जानने से आप सब कुछ गया जान गए वासुदेव सर्वमिति जो वासुदेव को जानता है स महात्मा वह महात्मा कहलाता हैं। स महात्मा सुदुर्लभः ऐसा महात्मा दुर्लभ है केवल दुर्लभ ही नहीं सुदुर्लभ। ऐसे महात्मा बनीएँ आप। मनु प्रिया! हरि हरि!ठीक हैं! अब नहीं कहेंगे(जप चर्चा में उपस्थित एक भक्त को प. पु. लोकनाथ महाराज ने संबोधित किया) जय गौरांग...! श्रीमद्भगवत् गीता की जय हो! भगवत गीता के नववे अध्याय के अंतिम श्लोक 43 में भगवत गीता यथारुप वहां पर जो भगवान ने कहा है... मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु | मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण:।। (श्रीमद्भभागवतगीता 9.43) अनुवाद: - अपने मन को मेरे नित्य चिंतन में लगाओ, मेरे भक्त बनो मुझे नमस्कार करो और मेरी ही पूजा करो। इस प्रकार मुझमें पूर्णतया तल्लीन होने पर तुम निश्चित रूप से मुझ को प्राप्त होगे। यह बात भगवान नवावा अध्याय और नववे अध्याय का अंत मतलब मध्य हुआ भगवत गीता का मध्यांतर भाग कुल अध्याय कितने है? 18 हैं ना, इतना तो पता चला के नहीं चला अबतक आपकोे। कितने है? 18 अध्याय।जो बात भगवान ने गीता के बिल्कुल मध्य में कहीं है, वह बात पुन: भगवान ने गीता के अंत में भी कहा हैं। और यह ऐसी एक बात है जो भगवान ने दो बार कही है, जहां तक मैं समझा हूंँ। एक ही वचन पूरा तो श्लोक नहीं लगभग तीन पद पर कुल 4 पद होते हैं अनुष्टुप स्कंद में 4 पद होते हैं, उसके 3 पद भगवान ने दो बार कहा हैं। मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु | मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण:।। कंठस्थ किया इसको तो याद करो! भगवान ने क्या कहा। ऐसे भी भक्त है जो जिनको पूरी गीता कंठस्थ होती हैं। पूरे सहस्त्र श्लोक कुछ तो याद करो! प्रार्थना करो भगवान से कि आपको याद रहे भगवत गीता के वचन। आपका ध्यान मै जरा आकृष्ट कर रहा हूंँ यह बड़ी बात या छोटी बात है एक बात भगवान ने दो बार कहीं हैं। इसको आप नोट करो दुबारा भी देख सकते हो नववे अध्याय के अंत में और फिर अठारहवें अध्याय के अंत में भगवान ने पुनः मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु | मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे || (श्रीमद्भभागवतगीता 18.65) अनुवाद: -सदैव मेरा चिन्तन करो, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो और मुझे नमस्कार करो | इस प्रकार तुम निश्चित रूप से मेरे पास आओगे | मैं तुम्हें वचन देता हूँ, क्योंकि तुम मेरे परम प्रियमित्र हो | यह बड़ी महत्वपूर्ण बात हैं। हरि हरि! यह चार बातें करने के लिए कहा हैं मन्मना मेरा स्मरण करो! भव मद्भक्तो मेरा भक्त बनो! मद्याजी मेरी आराधना करो! मां नमस्कुरु मुझे नमस्कार करो! श्रील प्रभुपाद ने एक समय कहा था आप चार बातों का या नियमों का पालन करते हो ऐसा जब प्रभुपाद ने कहा तो भक्त सुन रहे थे भक्त सोच रहे थे कि प्रभुपाद कहेंगे 4 रेगुलेटिव प्रिंसिपल (नियामक सिध्दांत) नशा पान नहीं करेंते, मांस भक्षण नहीं करते, अवैध स्त्री पुरुष संग नहीं करते और जुआ नहीं खेलते ऐसा प्रभु बात कहेंगे, ऐसा भक्तों ने सोचा था। चार नियमों का पालन करते है, लेकिन प्रभुपाद ने तो यह सब कहने के बजाय प्रभुपाद ने कहा मन्मना मेरा स्मरण करो! भव मद्भक्तो मेरा भक्त बनो! मद्याजी मेरी आराधना करो! मां नमस्कुरु मुझे नमस्कार करो!, और इतना करोगे तो जो बात भगवान ने दो बार कही है, नववे अध्याय के अंत में और भगवत गीता के अंत में उन्होंने दोनों स्थानों पर मामेवैष्यसि बात कही है इतना करोगे तुम तो तुम मुझे प्राप्त करोगे,ऐसा भगवान ने कहा हैं। हरि हरि! इतना तो करना स्वामी!,उन्होंने तो किया ही है, उन्होंने तो कहा ही है, और अगर उतना ही करते है, जितना उन्होंने कहा है बस इतना सा करने से मामेवैष्यसि मेरी ओर आओगे, मुझे प्राप्त होंगे मेरे धाम लौटोगे के इस बात को भगवान ने गोपनीय भी कहा है तो यह आप याद रखिए। कौन सा श्लोक भगवान ने दो बार कहा हैं? और कोई बात दोहराई जाती है दो बार या तीन बार कही जाती हैं। हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नाम तीन बार कहीं गयी है क्यों महत्वपूर्ण है क्यो यह पुनः पुनः स्मरण दिलाया जा रहा है जो बात गीता के मध्य में नववे अध्याय के अंत में कहा था भगवान ने पुनः स्मरण दिला रहे है,और गीता के अंत में वैसे यह बात कह के उपदेश का समापन होने वाला है तो और फिर पुनः अंत में जो बात कही जाती है,वह महत्वपूर्ण होती है दो बार बात कही गई है तो महत्वपूर्ण होनी चाहिए।इसे नोट करो!,(ध्यान दो) भगवान क्या कह रहे हैं? मैं यह भी कहना चाह रहा था, कहूंगा ही, वैसे हर शास्त्र का कुछ श्लोक या एक श्लोक शास्त्र का परिभाषित वचन,वाक्य,या श्लोक ऐसी प्रसिद्धि होती है, परिभाषित या पेहचान होती हैं। एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् । इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे ॥ (श्रीमद्भागवतम् 1.3.28) अनुवाद:- उपर्युक्त सारे अवतार या तो भगवान् के पूर्ण अंश या पूर्णांश के अंश ( कलाएं ) हैं , लेकिन श्रीकृष्ण तो आदि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं । वे सब विभिन्न लोकों में नास्तिकों द्वारा उपद्रव किये जाने पर प्रकट होते हैं । भगवान् आस्तिकों की रक्षा करने के लिए अवतरित होते हैं । भागवत का परिभाषित श्लोक माना जाता हैं। *ईशवर: परम: कृष्ण: सच्चिदानंदविग्रह:। अनादिरादिगोंविन्द: सर्वकारणकारणम्।। (श्री ब्रम्ह-संहिता 5.1) अनुवाद: - गोविंद के नाम से विख्यात कृष्ण ही परमेश्वर हैं। उनका सच्चिदानंद शरीर हैं। वे सबों के मूल उत्स हैं। उनका कोई अन्य उत्स नहीं एवं वे समस्त कारणों के मूल कारण हैं। यह श्लोक ब्रह्म संहिता का परिभाषित श्लोक माना जाता हैं। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।। वैसे ही भगवत गीता के दसवें अध्याय के चार श्लोकों को भगवत गीता के परिभाषित वचन या श्लोक रूप में प्रसिद्धी हैं। जहा तक मै समझा हूँ। सुना, पढ़ा या समझा। वह श्लोक है दसवें अध्याय श्लोक संख्या आठवां नववा, दसवां, ग्यारहवा। गीता लेकर बैठा हूंँ मैं,कलीयुग के जीव हैं। हरी हरी! भूल जाते हैं उनके लिए श्रील व्यास देव ने ग्रंथों को लिखा पहले ग्रंथ लिखे नहीं जाते थे। ग्रंथ केवल सुने जाते थे। ग्रंथों का केवल और केवल श्रवणं कीर्तनं किया जाता था। उसीसे स्मरणं होता था। यह श्लोक महत्वपूर्ण हैं ऐसे भी और एक महत्वपूर्ण जानकारी बताता हूंँ। गीता के बीच वाले जो 6 अध्याय हैं, यह भी महत्वपूर्ण हैं। भक्ति योग की चर्चा है या भक्तों की, भक्ति की, भगवान की चर्चा का विषय है अध्याय संख्या 7 से 12 तक, यह अध्याय गीता के बगल वाले पहले छ: और अंतिम छ: यह बीच वाले छ: अध्याय को सुरक्षित रखते हैं। एक प्रकार का पैकेजिंग(संवेष्टन) यह छ: -छ:अध्याय शुरुआत के छ: अंक वाले छ: रक्षा करते हैं और बीच वाले जो भक्ति योग की चर्चा है, भगवान और भक्त की चर्चा हैं। यह गोपनीय बातों की चर्चा बीच के छ: अध्याय में हैं। इसको नोट कीजिए! बीच वाले जो छ: अध्याय है, उसके बीच वाला जो दसवां अध्याय हैं। यह भगवान का ऐश्वर्य... *ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशसा: श्रीय: ज्ञान वैराग्ययोश चैव सन्नम भग इतिंगना।। (विष्णु पुराण 6.5.47) अनुवाद: - पराशर मुनि जो श्रील व्यास देव के पिता हैं श्री भगवान के बारे में कहते हैं कि छः ऐश्वर्य यथा धन बल यश रूप ज्ञान एवं वैराग्य परम पुरुषोत्तम भगवान में पूर्ण मात्रा में विद्यमान होते हैं अतः श्री भगवान सर्व आकर्षक हैं। भगवान के छ: ऐश्वर्य हम जानते ही है, उनके अलावा और छ: अन्य कार्यों का उल्लेख भगवान ने भगवत गीता के दसवें अध्याय में किया हुआ हैं। इसका वर्णन हम कभी सुना सकते हैं। यह प्रात कालीन कक्षाएं हो रही हैअभी, तो इस 10 अध्याय में भगवान ने भगवान का ऐश्वर्या चार श्लोक दसवें अध्याय के चार श्लोक परिभाषित वाक्य वचन या श्लोक बड़े प्रसिद्ध हैं। वह पहला श्लोक यह है... अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते। इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विता:।। (श्रीमद्भगवद्गीता 10.8) अनुवाद: - मैं समस्त आध्यात्मिक तथा भौतिक जगतों का कारण हूंँ, प्रत्येक वस्तु मुझ ही से उद्भूत हैं। जो बुद्धिमान यह भली-भांति जानते हैं, वह मेरी प्रेमा भक्ति में लगते हैं तथा ह्रदय से पूरी तरह मेरी पूजा में तत्पर होते हैं। आप सब गीता के विद्यार्थी बनो, भगवान के विद्यार्थी बनो । श्री कृष्ण गुरु हैं (कृष्णम वंदे जगत गुरु) और गीता को अभ्यासक्रम के रूप में स्वीकार करो और पढ़ो भी ।और कुछ पढ़ा नहीं पढ़ा ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, आपने खगोल पढ़ा, भूगोल पढ़ा, पर सबसे महत्वपूर्ण है भगवत गीता को पढ़ना। यदि आपने भगवद गीता नहीं पड़ी तो क्या पढ़ा ? आपकी सारी पढ़ाई बेकार है। गीता को पढ़ो, कृष्ण को सुनो और स्वयं को भी समझो । सारे संसार की परेशानियों से मुक्त हो जाओ। कृष्ण को प्राप्त करो और भगवद धाम लौटो। भगवद गीता में कृष्ण हम सबको आमंत्रित कर रहे हैं। अहं सर्वस्य प्रभवो मत्त: सर्वं प्रवर्तते इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विता: ॥ ८ ॥ श्रीमद भगवद गीता ,आधाय 10,श्लोक8 अनुवाद मैं समस्त भौतिक तथा आध्यात्मिक जगतों का कारण हूँ,प्रत्येक वस्तु मुझसे ही उद्भूत है।जो बुद्धिमान यह भलीभाँति जानते हैं ,वे मेरी प्रेमाभक्ति में लगते हैं तथा हृदय से पूरी तरह मेरी पूजा में तत्पर होते हैं। तात्पर्य पढ़कर सुनाने का समय नहीं, यह आपका गृह कार्य है। मैं सोच रहा था पूरी मानव जाति के समक्ष ये प्रश्न है या कह सकते हैं कि पाश्चात्य जगत ऐसा समझता है कि कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनका कोई उत्तर प्राप्त नहीं कर पाया। उनमें से एक है कि, हम आए कहां से ?हमारा और इस संसार का स्तोत्र क्या है? इसका उद्गम क्या है? कहां से शुरुआत हुई संसार की? सब समझते है कि उसका उत्तर प्राप्त नहीं हुआ है ।यह संसार के लोग इसकी खोज करते ही रहते हैं। लेकिन ऐसा नहीं कि इसका उत्तर पता नहीं है। मैं, आप, शृष्टि और हम सब का स्तोत्र भगवान हैं।ये बात भगवान ने घोषित की है। अहं सर्वस्य प्रभवः श्रील प्रभुपाद भाषांतर में लिख रहे हैं समस्त आध्यात्मिक और भौतिक जगतों का कारण मैं हूं और जो इसको स्वीकार करेगा तो उसका कल्याण होगा। इति मत्वा भजन्ते माम् ........... इस बात को जानकर व्यक्ति बुद्धिमान बनेगा। इस बात को जानकर कि भगवान सारी सृष्टि के ,हर चीज़ के स्तोत्र हैं । आप आंख बंद करके कह सकते हैं कि हर चीज के स्तोत्र भगवान ही हैं। यहां अहं कौन हैं? श्री भगवान उवाच हम कहने वाले श्री कृष्ण हैं । मच्च‍ित्ता मद्ग‍तप्राणा बोधयन्त: परस्परम् । कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥ ९ ॥ भगवद गीता अध्याय 10 ,श्लोक 10 अनुवाद मेरे शुद्ध भक्तों के विचार मुझमे वास करते हैं,उनके जीवन मेरी सेवा में अर्पित रहते हैं और वे एक दूसरे को ज्ञान प्रदान करए तथा मेरे विषय में बाते करते हुए परम संतोष तथा आनंद का अनुभव करते हैं। उन चार श्लोकों मैं से यह दूसरा श्लोक है ।जब वह यह समझ जाएगा कि मैं ही स्तोत्र हूं सभी जड़ और चेतन का । श्रील प्रभुपाद कहते हैं कि जीवन एक जीवित वस्तु में से ही आ सकता है ना की जड़ वस्तु में से । जैसे संसार में हम आत्मा हैं,हम चेतन है, तो उसका स्तोत्र भी चेतना ही है। नित्योSनित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्। तमात्मस्थं येSनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्ति: शाश्वती नेतरेषाम्।। कठोपनिषद् 2.2.13 अनुवाद: - जो अनित्य पदार्थों में नित्य स्वरूप तथा ब्रह्मा आदि क्षेत्रों में चेतनोंमें चेतन है और जो अकेला ही अनेकों की कामनाएं पूर्ण करता है, अपनी बुद्धि में स्थित उस आत्मा को जो विवेकी पूर्व देखते हैं उन्हीं को नित्य शांति प्राप्त होती है औरोंको नहीं हमारी चेतना का स्तोत्र या आत्मा का स्तोत्र या फिर देह का स्तोत्र ,जो पंचमहाभूत (पृथ्वी ,जल, अग्नि ,वायु आकाश )से बना है,इस सबके स्तोत्र श्री भगवान है। यह भी कहा जाता है कि भगवान है और भगवान की शक्ति है। हम भगवान की शक्ति हैं भगवान की तीन शक्तियां हैं। बहिरंगा शक्ति, अंतरंगा शक्ति और तटस्थ शक्ति । अंतरंगा शक्ति जिससे बैकुंठ लोक गोलोकधाम ,यह आध्यात्मिक जगत बना है। बहिरंगा शक्ति जिससे यह सारी सृष्टि बनी है ,जो हम प्रत्यक्ष देखते हैं ,सुनते हैं और स्पर्श करते हैं। और तटस्थ शक्ति यानी जो तट पर है।जिसको अंग्रेजी में बोलते हैं बीच ।बीच इसलिए कहते हैं क्योंकि वह बीच में होता है एक तरफ से समुद्र है और दूसरी तरफ भूखंड है ।तो हम जीवात्मा भी बीच में हैं। अंतरंगा बहिरंगा तटस्थ यह भगवान की ही शक्तियां हैं। इसीलिए भगवान जो है वह शक्तिमान है । न तस्य कार्य करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते। परास्य शक्तिर्विविधैव श्रुयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च।। श्वेताश्वतरोपनिषद् 6.8 अनुवाद: - उसके शरीर और इंद्रिया नहीं है, उसके समान और उससे बढ़कर भी कोई दिखाई नहीं देता, उसकी पराशक्ति नाना प्रकार की ही सुनी जाती है और वह स्वाभाविक ज्ञान क्रिया और बलक्रिया हैं। और आगे इन्हीं तीन शक्तियों से विविधता हो जाती है। कई प्रकार की शक्तियां बन जाती हैं ।पर मोटे मोटे प्रकार से यह तीन ही शक्तियां हैं। तो संसार में बस भगवान और भगवान की शक्ति हैं और तीसरा किसी का अस्तित्व नहीं है। और शक्ति का स्तोत्र भगवान ही हैं। अहं सर्वस्य प्रभवः बिजली शक्ति है, इस विद्युत का स्तोत्र है पावर हाउस या जनरेटर। उसी प्रकार हमारी शक्ति के जनरेटर भगवान हैं और शक्ति और शक्तिमान का ही अस्तित्व है तीसरा किसी का नहीं। जो इस प्रकार जानता है तो उसकी चेतना भगवान में लग जाती है। वह भगवान का चिंतन करने लगता है और भगवान कितने महान हैं या फिर भगवान की कितनी शक्तियां हैं। राधा रानी भी भगवान की शक्ति हैं। इस अध्याय में भगवान आगे अपनी शक्तियों का नाम लेने वाले हैं। मच्च‍ित्ता मद्ग‍तप्राणा फिर हमारा चिंतन कृष्ण का होगा । फिर हम जान जाएंगे राधा कृष्ण प्राण मोर युगल किशोर । फिर समर्पण होगा एयर हम अपने प्राण समर्पित करेंगे भगवान के लिए। बोधयन्त: परस्परम् इतना प्रभावित हो जाएगा वह यह जानकर कि मेरे कारण ही सारा संसार निर्मित होता है ।यह सब से आश्चर्य होगा। आश्चर्यावर्त पश्यति। भक्त जैसा अनुभव करेगा वह अपने अनुभव को दूसरों को सुनाएगा बोधयन्त: परस्परम् एक दूसरे को याद दिलाएगा और फिर तुष्यन्ति च रमन्ति च संतुष्ट होगा। *आत्माराम बनेगा। आत्मा में आराम ।तो जो सुना है उसका मनन करो, चिंतन करो और हृदयंगम करो। हरे कृष्ण

English

7 January 2021 Paribhasa sutras Hare Kṛṣṇa ! om namo bhagavate vasudevaya! bahūnāṁ janmanām ante jñānavān māṁ prapadyate vāsudevaḥ sarvam iti sa mahātmā su-durlabhaḥ Translation After many births and deaths, he who is actually in knowledge surrenders unto Me, knowing Me to be the cause of all causes and all that is. Such a great soul is very rare. (BG 7.19) This is knowledge, complete knowledge. To know vāsudevaḥ sarvam iti, Vasudeva is all in all. yasmin vijñāte sarvam idaṁ vijñātaṁ bhavati Translation By understanding the Lord, we understand everything. Person who knows the Vasudeva, is known as Mahatma and such mahatmas are very rare. [Muṇḍaka Upaniṣad 1.3] I'm sharing some of my insights on Bhagavad Gita. At the end of chapter 9, which is the interval of Bhagavad Gita, the Lord has made the same point which is repeated at the end of chapter 18. Almost 3 verses has been repeated by Kṛṣṇa. I would like you all to learn these verses of Bhagavad Gita. man-manā bhava mad-bhakto mad-yājī māṁ namaskuru mām evaiṣyasi yuktvaivam ātmānaṁ mat-parāyaṇaḥ Translation Engage your mind always in thinking of Me, become My devotee, offer obeisances to Me and worship Me. Being completely absorbed in Me, surely you will come to Me. (BG 9.34) This verse is very important as the topic discussed is important. Once Srila Prabhupada said, "We follow 4 regulative principles.” The devotees sitting there thought that Prabhupada would say - no meat eating, no intoxication, no gambling and no illegal sex. But instead he said this verse which states the 4 do's which one must offer to the Lord . These are Engage your mind in thinking of Me. Become My devotee. Offer obeisances unto Me. Worship Me. By doing this, “Being absorbed in Me you will surely achieve Me.” This is also known as confidential knowledge. Kṛṣṇa is repeating this at the end of Bhagavad Gita in the 18th chapter again. Only important points are repeated multiple times to stress the importance of a topic. We must take note of this. There are a few verses which are known as paribhasa sutras (definitive verses) We have one such verse from Srimad Bhagwatam ete cāmśa-kalāḥ puṁsaḥ kṛṣṇas tu bhagavān svayam indrāri-vyākulaṁ lokaṁ mṛḍayanti yuge yuge Translation All of the above-mentioned incarnations are either plenary portions or portions of the plenary portions of the Lord, but Lord Śrī Kṛṣṇa is the original Personality of Godhead. All of them appear on planets whenever there is a disturbance created by the atheists. The Lord incarnates to protect the theists. ( SB 1.3.28) Paribhasa verse for Brahma Samhita īśvaraḥ paramaḥ kṛṣṇaḥ sac-cid-ānanda-vigrahaḥ anādir ādir govindaḥ sarva-kāraṇa-kāraṇam Translation Kṛṣṇa who is known as Govinda is the Supreme Godhead. He has an eternal blissful spiritual body. He is the origin of all. He has no other origin and He is the prime cause of all causes. [B.S. 5.1] Similarly we have such verses in Bhagavad Gita. I am sitting with Bhagavad Gita in my hands because we are born in the age of Kali and we are conditioned to forgetfulness. That’s the reason Vyasadeva has written down the Vedic literatures. In the past devotees memorised them. The middle chapters of the Bhagavad Gita, 7-12 are important as they are based on Bhakti Yoga. The initial 6 chapters and the last 6 chapters are providing a fence around the middle 6 chapters. In the middle of the 10th chapter, is The Opulence of the Absolute. We have heard about the six opulences of the Lord, but here we can hear more opulences of the Lord. The four verses of this chapter are known as the paribhasa sutras of the Bhagavad Gita. I want you all to become the students of Bhagavad Gita. Become the students of Lord Kṛṣṇa. He is the teacher, so become His student, accept Bhagavad Gita as the syllabus and study it. It does not matter if you have studied Geography or Biology, if you haven't studied Bhagavad Gita then your so-called knowledge is useless. ahaṁ sarvasya prabhavo mattaḥ sarvaṁ pravartate iti matvā bhajante māṁ budhā bhāva-samanvitāḥ Translation I am the source of all spiritual and material worlds. Everything emanates from Me. The wise who perfectly know this engage in My devotional service and worship Me with all their hearts. (BG 10.8) Kṛṣṇa says, "I am the source of everything that exists, either in the material or spiritual world.” Homework for you is to read the verse and its purports. People in the western world think that they have some unanswered questions. They think we don't know what is the source of our origin? How did this world come into being? Here Lord Kṛṣṇa has openly proclaimed, "I am the source of everything". What else do you want to know? In the purport, Srila Prabhupada has written - Kṛṣṇa is declaring, " I'm the source of everything". If you understand and accept this, then you are intelligent. What is He saying, aham means I, only Lord Kṛṣṇa can claim this. mac-cittā mad-gata-prāṇā bodhayantaḥ parasparam kathayantaś ca māṁ nityaṁ tuṣyanti ca ramanti ca Translation The thoughts of My pure devotees dwell in Me, their lives are fully devoted to My service, and they derive great satisfaction and bliss from always enlightening one another and conversing about Me. (BG 10.9) This is the second verse, "Whatever is matter or spirit I am the source of all". Srila Prabhupada says, 'Life comes from life, not from matter'. The source of our soul or our body is life which is made up of five elements earth, water, air, fire, ether. nityo nityānāṁ cetanaś cetanānām eko yo bahūnāṁ vidadhāti kāmān Translation Amongst all the living entities, both conditioned and liberated, there is one supreme living personality, the Supreme Personality of Godhead, who maintains them and gives them all the facility of enjoyment according to different work. That Supreme Personality of Godhead is situated in everyone’s heart as Paramātmā. [Kaṭha Upaniṣad 2.2.13] There is Lord Kṛṣṇa and His energies - Bahiranga (external), Antaranga (internal) and Tathasta (marginal) sakti. From the material energy (Bahiranga), whatever we perceive in the material world is created. From the spiritual energy (Antaranga) the whole spiritual world is created and in the middle there is the marginal potency (tathastha) wherein lies the living entities. It is known as marginal, because the soul lies in the middle, called the marginal potency. na tasya kāryaṁ karaṇaṁ ca vidyate na tat-samaś cābhyadhikaś ca dṛśyate parāsya śaktir vividhaiva śrūyate svābhāvikī jñāna-bala-kriyā ca Translation: Nārāyaṇa, the Supreme Personality of Godhead, is almighty, omnipotent. He has multifarious energies, and therefore He is able to remain in His own abode and without endeavour supervise and manipulate the entire cosmic manifestation through the interaction of the three modes of material nature [Śvetāśvatara Upaniṣad 6.8] Everything is an expansion of the energies of Krsna. These are the basic three energies of the Lord and there are more sub divisions of the energies. The source of energy is Lord Kṛṣṇa and He is known as shaktimaan. We know that a generator generates electricity. Similarly Kṛṣṇa is our Generator. One who understands this, his consciousness gets attached to Kṛṣṇa. Ashcharya vat, then he will say, 'How wonderful is the Lord' and will devote himself in Lord Kṛṣṇa's service. He will be amazed by knowing the Lord, get different realisations and then share it with others, finding peace in the shelter of the Lord. The soul will find such satisfaction in the discussions on the topics of the Lord’s pastimes. tuṣyanti ca ramanti ca. Meditate, study, contemplate on the topics you've heard, get convinced. Hare Kṛṣṇa! Question 1 1.Is Krsna the source of Ignorance too? Gurudev uvaca In 15th chapter of Bhagavad Gita, the Lord says, sarvasya cāhaṁ hṛdi sanniviṣṭo mattaḥ smṛtir jñānam apohanaṁ ca vedaiś ca sarvair aham eva vedyo vedānta-kṛd veda-vid eva cāham Translation I am seated in everyone’s heart, and from Me come remembrance, knowledge and forgetfulness. By all the Vedas, I am to be known. Indeed, I am the compiler of Vedānta, and I am the knower of the Vedas. (BG 15.15) The Lord is busy. What does He do while sitting in the heart of a person? “I give knowledge or forgetfulness or ignorance.” The Lord is the source of everything. When Hiranyakashipu asked his son Prahlada, “Who gives you intelligence?” Prahlada replied, "The source of my good intelligence and your exploitative intelligence is one. The source of my devotion and your demoniac nature of abusing your power and strength is one. Like electricity is the source of giving heat and cold, origin is the same but the effects are different, whatever one desired or deserved, one will be bestowed.” avatīrṇe gaura-candre vistīrṇe prema-sāgare | suprakāśita-ratnaughe yo dīno dīna eva saḥ ||19|| Translation The advent of Lord Caitanya Mahāprabhu is just like an expanding ocean of nectar. One who does not collect the valuable jewels within this ocean is certainly the poorest of the poor. (Caitanya Candrika by Srila Prabodhananda Sarasvati) Caitanya Mahaprabhu has propagated the movement of love but those who do not wish to take it, they have sent to anartha sagara to suffer. By knowledge you can differentiate between good and evil, lust and love, jnana and ajnana. The Lord said, “I'm the origin of knowledge” Then similarly He is the origin of evil too. Why to ask? Who else can be the origin? Maya is there but she also belongs to Krsna, mayādhyakṣeṇa prakṛtiḥ sūyate sa-carācaram hetunānena kaunteya jagad viparivartate Translation This material nature, which is one of My energies, is working under My direction, O son of Kuntī, producing all moving and nonmoving beings. Under its rule this manifestation is created and annihilated again and again. (BG 9.10) Even Ignorance belongs to Krsna. daivī hy eṣā guṇa-mayī mama māyā duratyayā mām eva ye prapadyante māyām etāṁ taranti te Translation This divine energy of Mine, consisting of the three modes of material nature, is difficult to overcome. But those who have surrendered unto Me can easily cross beyond it. (BG 7.14)

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