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हरे कृष्ण जप चर्चा, 8 जनवरी 2020, पंढरपुर धाम. 897 स्थानों से भक्त जप के लिए जुड़ गए हैं। हरिबोल! यहां पर विशेष दर्शन है। भक्त यहां से, भक्त भुनेश्वर से, भक्त यूक्रेन से, मुंबई से अरवड़े से, भक्त सोलापुर से, भक्त नागपुर से, मॉरिशियस से, अलीबाग से, थाईलैंड से भक्त, यह दर्शन विशाल है, यह विश्वरूप है। उसमें भी भक्तों के रूप है या भक्त हरिनाम के माध्यम से भगवान को पुकार रहे हैं। यह दृश्य और भी अधिक मधुर बन जाता है। कृष्ण दयालु है। कृष्ण दयालु है कि नहीं ओजस्विनी? श्रीचंद्रिका कहती है कि कृष्ण अतिदयालु है। और कृष्ण दयालु नहीं होते तो इस वक्त हमारे हरिनाम का उच्चारण नहीं करते। हरिहरि, कृष्ण आपको जगाते भी है। जीव जागो जीव जागो गौराचांँद बोले गौराचांँद सभी को बुलाते हैं। हरिहरि, सूर्य का प्रकाश उपलब्ध तो है किंतु जो घर से बाहर निकलेंगे या छत पर पहुंचेंगे वहीं अनुभव कर सकेंगे सूर्य प्रकाश का, सूर्यकिरणों का, सूर्य के प्रकाश से वे लाभान्वित हो सकते हैं। सूर्य ने तो कई सारे कदम उठाएं। कहां का सूरज कहां पहुंचा। हम अगर कुछ कदम उठाते हैं उनकी ओर रास्ते में फिर मिलन होता है। तदवत कृष्ण या गौरंगा तोम बिना के दयालु जगत संसारे आपके बिना और कौन दयालु है कृपालु है। हरि हरि, भगवान कृपा बरसा रहे हैं। और वह कृपा की दृष्टि यहां कृपा कटाक्ष हम पर भगवान का है। कृष्ण के दया के बिना और कोई उत्तर तो नहीं हो सकता इस जन्म में। हम कुछ स्मरण कर रहे हैं। शुरुआत तो कर रहे हैं कुछ हल्का सा स्मरण हो रहा है। और स्मरण को बढ़ाना चाहते हैं और याद करना चाहते हैं। हरि हरि, और यादें बढ़ाने के लिए हम उनके नामों का उच्चारण, कीर्तन करते हैं, यह श्रवण होता है। उच्चारण करते हैं तो श्रवण भी होता है। या नित्यसिद्ध कृष्णप्रेम साध्य का उद्देश। श्रवणादि शुद्ध चित्ते करय उदय हमारा तो प्रेम है कृष्ण से, तो हम गलती से औरों से हरि हरि माया से प्रेम करते हैं। माया के भी कई रूप हैं हम उनसे प्रेम करते हैं। वह बात गलत है। फिर हम बात करते हैं, श्रवणादि शुद्ध चित्ते करय उदय श्रवणादि श्रवण आदि इस शब्द की ओर ध्यान तो दो। श्रवणादि मतलब सिर्फ श्रवण नहीं कहा है। श्रवण आदि, श्रवण और इत्यादि इत्यादि। श्रवण, कीर्तन, स्मरण, वंदन यह सब आ गए। कह तो दिया श्रवणादि। श्रवण आदि कहने से समझ लेना चाहिए कि नवविधा भक्ती का उल्लेख हो रहा। है श्रवणादि शुद्ध चित्त करय उदय शुरुआत तो श्रवण से होती है नवविधा भक्ती की शुरुआत या और भक्ति हम तब करेंगे जब प्रारंभ मे श्रवण भक्ति करेंगे। सुनेंगे कृष्णा कथा तो हम कृष्ण से प्रेम करना हम प्रारंभ करेंगे या कृष्ण का प्रेम बढ़ेगा। और ग्राम कथा करेंगे, इस कथा के वैसे दो भाग हैं। यह भाग में थोड़ा जल्दी खत्म करना चाहता हूं। भगवदगीता की जो कल सूचना दी गई थी, उसमें हम आगे बढ़ेंगे। गीता के 10 वे अध्याय के कुछ श्लोक सुनाने थे आपको, सुनाऊंगा। लेकिन अभी तो यह श्रवण का महिमा सुना रहेे हैं। कथाओं के दो प्रकार होते हैं या श्रवण के दो प्रकार के होते हैं। एक कृष्णकथा और दूसरी ग्रामकथा, माया की कथा। श्रवणादि शुद्ध चित्ते करय उदय। नित्यसिद्ध कृष्णप्रेम।। तो कथा या नामगान भी कहो, हम कृष्ण का सुनेंगे। कृष्णकथा सुनेंगे तो कृष्ण से प्रेम होगा। कृष्ण से प्रेम करने लगेंगे और ग्रामकथा सुनेंगे ग्रामकथा, संसारी कथा, स्त्रीपुरुष कथा इत्यादि इत्यादि तो क्या उदित होगा, काम उदित होगा। एक कथा तो कृष्णप्रेम को जगाती है। तो दूसरी कथा काम। दूरदर्शन, सिनेमाज, मूवीज, रेडियो, इंटरनेट जिसमें क्या है, ग्रामकथा, राजनीति, यह और वह। यह सुनने से क्या होगा? हमारा काम बढ़ेगा। कामवासना बढ़ेगी। वैसे भी आग लगी हुई है हमारे जीवन में। संसार दावानल कहते हैं। हमारे इंद्रियों में आग लगी हुई है। वह आग जितनी अधिक प्रज्वलित होगी हम उसको पोषण देंगे ग्राम कथा करेंगे। या फिर कह भी सकते हैं इंद्रियों के जो विषय हैंं उसका आहार होगा। इंद्रियों का आहार होगा आंखों को कुछ रूप से खिलाएंगे, पिलाएंगे। जो भी है लेकिन यह रोकना है। हरि हरि, दूरदर्शन देखेंगे, बॉलीवुड, हॉलीवुड का संगीत सुनेंगे जिसका विषय होता है काम। याद रखिए थोड़ा दिमाग लड़ाइये थोड़ा चिंतन करो। मराठी में कहते हैं शहाणे व्हा। और यह जो भेद हैैै ग्रामकथा कृष्णकथा, कृष्ण में माया मेंं, इस को समझो। प्रेम में काम में क्या अंतर है इसको समझो और यही समझाती हैं भगवत गीता। कृष्ण समझाते है। कृष्ण स्वयं ही शिक्षक बने हैं या गुरु बने हैं। कृष्णम वंदे जगत गुरु और अर्जुन बने हैं शिष्य। शिष्यस्ते अहम् शाधिमाम् त्वाम प्रपन्नाम तो हमको भी अर्जुन जैसा शिष्य बनना है। तो उस बने हुए शिष्य अर्जुन को भगवान गीता का उपदेश सुनाते सुनाते दसवें अध्याय तक पहुंच गए हैं। तो यहां विशेष जो चार श्लोक हैं। वैसे भागवत भी चतुश्लोकी भागवत कहते हैं। भागवत में भी द्वितीय स्कंध में विशेष चार श्लोक हैं। तो चतुश्लोकी भागवत कहते है। भगवतगीता के 4 श्लोक 10 वीं अध्याय के 4 श्लोक 8 9 10 11 यह जो श्लोक हैं यह चतुश्लोकी या परिभाषित वाक्य है गीता के। दो श्लोक तो पहले सुनाएं हैं और अभी यह 10वां। तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्‌ । ददामि बद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ भाषांतर जो प्रेम पूर्वक मेरी सेवा करने में निरंतर लगे रहते हैं हमें ज्ञान प्रदान करता है जिसके द्वारा जिसके द्वारा वह मुझ तक आ सकते हैं देखिए कितनी रहस्यमई बात रहस्य भगवान यहां सुना रहे हैं। जीव को पहुंचाना है मुझ तक। येन मामुपयान्ति ते जीव को वैकुंठ पहुंचाना है। गोलोक पहुंचाना है। तो यह कैसे संभव है। यह तो लक्ष्य ही है जीव का। जीव का लक्ष्य कृष्ण और फिर कृष्ण जहांं रहते है वहां स्थान गंतव्य स्थान है। कृष्ण पहले चौथे अध्याय में कह चुके हैं। त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति पुनर्जन्म न एति की मामयेती कृष्ण ने कहां है पुनर्जन्मा न एति मामयेती मतलब जाता है आता है। वह पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं करता है। मेरे पास आता है। वह कौन और कैसा व्यक्ति मेरे पास आएगा? सुन तो लो कृष्ण कह रहे हैं। अब आपको कृष्ण सीधे आपको सुना रहे हैं। आपके और कृष्ण के बीच में कोई नहीं है। वैसे हमारे गुरु है। एवं परंपरा प्राप्त लेकिन उस कृष्ण की और से ही वह बोल रहे हैं और वह वही बात बोल रहे हैं जो कृष्ण ने कही थी एक समय, धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे और वह जो हुआ और सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत यह भी हुआ दोनों सेना के मध्य में मेरे रथ को खड़े करो। वहां पहुंचने पर ऐसे अर्जुन को भगवान जो कहे या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता भगवान के मुखारविंद से नि:सृत निकले जो वचन है वही सीधे हम तक पहुंच रहे हैं। वैसा ही अनुभव है मानो, क्या वैसा ही है? भगवान हमको सुना रहे हैं तेषां सततयुक्तानां सुनो और कौन सुना रहे हैं कृष्ण सुना रहे हैं तेषां सततयुक्तानां पहले कभी नहीं सुना था या सुना भी था तो समझे नहीं थे। किंतु अब भगवदगीता यथारूप सुनाई जा रही है विश्वभर में इसका प्रसारण हो रहा है। सुनो उत्तीशठाता जाग्रता उठो जागो वरान निबोदतः और आप को वरदान मिल रहा है, इसका बोध होने दो समझो भगवान वरदान दे रहे हैं। क्या दे रहे हैं भगवान, अपना संदेश अपना उपदेश दे रहे हैं सुना रहे हैं जीव को आपको मुझे हमको। तो सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् कृष्ण यहां पर तो बुद्धि देने की बात कर रहे हैं मैं बुद्धि देता हूं और बुद्धि को ड्राइवर भी कहा है। यन्त्रारुढाणी मायया इस शरीर को यंत्र कहे हैं भगवान गीता मे हीं कहे हैं इसको हम आपको समझा भी चुके हैं। इस यंत्र को रथ भी कहां है इस रथ को खींचने वाले घोड़े भी हैं, इंद्रियां है वह घोड़े। लगाम भी है वह है मन और बुद्धि है चालक या ड्राइवर और आत्मा है प्रवासी आत्मा है पैसेंजर। तो यह प्रवास हैं और हमारा जीवन भी एक प्रवास है एक यात्रा के रूप में। कुछ लोग कहते हैं फ्रॉम वोम्ब टू टोम्ब (गर्भ से कब्र तक) लेकिन यात्रा वहां समाप्त नहीं होती लेकिन कहते तो हैं। यात्रा है तो यात्रा का लक्ष्य पहले ही निर्धारित होता है यात्रा के प्रारंभ के पहले ही। हमें यहां जाना है हमें वहां जाना है हमें वहां जाना है फिर हम वाहन में बैठे हैं और ड्राइवर उसको चलाते हैं और जो बैठे हैं सवारी है उनको पहुंचाता है। तो इस तरह बुद्धि की महत्वपूर्ण भूमिका है। भगवान यहां पर कह रहे हैं मैं बुद्धि देता हूं दादामि बुद्धि योगं अहं दादामि यह हम छुपा हुआ है कहां नहीं गया है लेकिन यह स्पष्ट ही है। जब दादामि कहां है तो उसको सर्वनाम कहते हैं वह अहं ही हैं। यहां श्री भगवान उवाच चल रहा है अहं दादामि बुद्धि योगं मैं बुद्धि देता हूं। किन को बुद्धि देता हूं तेषां सततयुक्तानां जो मेरी भक्ति करते हैं भक्ति करना प्रारंभ किए हैं। तो वे तेषां उनको सततयुक्तानां जो मेरी भक्ति सेवा में युक्त है, कितने समय के लिए, सततयुक्तानां। वैसे कितने समय की बात नहीं है इसमें सातत्य की बात है। सातत्य मतलब सतत निरंतरता (कंटिन्यूटी), संगति (कांसिस्टेंसी)। तेषां सतत मतलब सदैव कीर्तनीय सदा हरी कि बात या नित्यम भागवत सेवया नित्यम सदा सततम् जो मेरी सेवा करते हैं। तो यह तो वॉल्यूम की बात कहो कितनी सेवा करते हैं या कब-कब सेवा करते हैं उसका ग्रैंड टोटल मतलब वॉल्यूम। उसकी संख्या उसकी मात्रा कितनी है तेषां सततयुक्तानां सतत। वैसे श्रील प्रभुपाद कहते थे 1 दिन में 24 घंटे जीवात्मा को दूसरा कोई धंधा है ही नहीं सिर्फ कृष्ण की सेवा जीवेर स्वरुप हय कृष्णेर नित्य दास कृष्ण का नित्य दास है तो तेषां सततयुक्तानां और भजतां प्रीतिपूर्वकम्। और एक तो सतत तो सेवा कर रहे हैं भगवान की अपेक्षा है वे सतत सब समय सेवा करें यह क्वांटिटी हुई। और जहां तक क्वालिटी की बात है प्रीतिपूर्वकम प्रेममई सेवा करें व्यापार ना करें कृष्ण के साथ भगवान के साथ प्रेम करें प्रेम मई सेवा करें। अहैतुकि अप्रतिहता जिसको श्रीमद्भागवत में ही कहा है स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे जो परम धर्म है, वही भागवत धर्म है, वही जैव धर्म है, वही सनातन धर्म है जीव का। तो वहां पर कहां है यह धर्म का अवलंबन और भगवान की सेवा कैसी अहैतुकि अप्रतिहता जिसमें कोई है कि नहीं हो अहैतुकि अप्रतिहता मतलब प्रेम मई और अखंड अप्रतिहता अखंड और प्रेममई। तो जैसे यहां भागवत में कहां है वही बात श्री कृष्ण यहां गीता के इस श्लोक में कह रहे हैं तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् यही धर्म है। और प्रेम पूर्वक नहीं हो रहा है तो फिर भगवान फिर आगे कहने वाले हैं सर्वाधर्मान परित्यज्य जो दूसरे दूसरे धर्म है जिसमें प्रेम नहीं है कृष्ण के प्रति प्रेम नहीं है जिसमें काम है, अपना कुछ हेतू है भुक्ति कामी, मुक्ति कामी, सिद्धि कामी कामना है। ऐसे धर्म को परित्यज्य मतलब प्रेम मई सेवा, मतलब श्रवणम, कीर्तनम, विष्णुस्मरणम। हरि हरि। और तत्कुरुष्व मदर्पणम् भी है फिर उसके साथ आत्मानिवेदन भी हआ, श्रवण से शुरुआत की। अंततोगत्वा सिमन्तद्वीप नवद्वीप मंडल परिक्रमा प्रारंभ हुई जहां श्रवण का महीमा है, गोद्रुम द्वीप गए तो वहां कीर्तन हुआ, अगले द्वीप गए तो वहां स्मरण हुआ मध्य द्वीप में, कोल द्वीप गए तो अर्चनम हुआ। ऐसे परिक्रमा परिभ्रमण करते करते जब हम लोग अंतरद्वीप पहुंच जाते हैं मध्य वाला जो द्वीप है तो वहां क्या करना होता है आत्मनिवेदनम पूर्ण समर्पण। तो शुरुआत हुई श्रवण से और यह श्रवण परिणत हुआ और श्रवण से फिर कीर्तन हुआ तो इस तरह फिर आत्मनिवेदन। तो तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ददामि ऐसे व्यक्ति को भगवान कहते हैं ऐसे व्यक्ति की जो शर्ते हैं जो करेगा क्या करेगा तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ददामि बुद्धियोगं तं तं उस व्यक्ति को मैं बुद्धि दूंगा मैं बुद्धि देता हूं। और फिर भगवान कृष्ण कहे तो है ये यथा मां प्रपद्यन्ते ।हरि हरि। जब हमारा तेषां सततयुक्तानां हुआ सातत्य आ गया तभी भगवान ने बुद्धि दे दी उसके पहले नहीं दी ऐसी बात नहीं है। या प्रीतिपूर्वकम उसमें डिग्री भी है, उसमे मात्रा भी है और थोड़ी प्रीति से भगवान की सेवा की या फिर कुछ समय के लिए भगवान की सेवा की। तो कृष्ण कहते हैं ये यथा मां प्रपद्यन्ते जो जितनी मेरी शरण में आता है उतना मेरा उनके साथ आदान-प्रदान होता है। तो भगवान जरूर हमने जितनी भक्ति की है, जितने समय के लिए, इतने प्रेम से तो भगवान उतनी बुद्धि देंगे। ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव यथा तथा ये यथा मां प्रपद्यन्ते ये मतलब जो मां प्रपद्यन्ते जो जितनी मेरे शरण में आते है ताम उनको तथा एव मैं क्या करता हूं भजाम्यहम् यह तो बड़ी अद्भुत बात भगवान ने कही है। ताम तथा एव भजामी अहं वैसे समझना कठिन है लेकिन जहां तक यह शब्द जिस शब्द का भगवान उपयोग प्रयोग किए हैं। तो अहं भजामी भगवान कहते हैं जो जितनी मेरी शरण में आता है और शरण लेकर फिर मेरा भजन या सेवा करता है तो अहमपि भजामी मैं भी उसका भजन करता हूं। भगवान भी उसका भजन करते हैं भगवान भी उसका गुणगान गाते हैं भगवान भी उस से प्रेम करते हैं तो यह दो तरफा ट्राफिक है। तो ऐसा संबंध है जीव का भगवान के साथ ऐसा संबंध है। यह नहीं कि हमें ही केवल भगवान से प्रेम करना है और भगवान हमसे प्रेम नहीं करेंगे, नहीं, हम प्रेम करते हैं भगवान प्रेम करते हैं। वैसे भगवान पहले प्रेम करते हैं भगवान का प्रेम तो बना ही रहता है। प्रिय असि कृष्ण कहने वाले है यह सब मैं तुम्हें इसीलिए सुना रहा हूं है अर्जुन। यह भगवदगीता का उपदेश और यह सुनोगे यह सुनकर वैसे ही करोगे, तो कृष्ण ने कहा मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे प्रिय: असि तुम मुझे प्रिय हो जीव को भगवान प्रिय हैं। भगवान को जीव प्रिय होता है, ऐसे प्रिय जीव को भगवान बुद्धि देते हैं ताकि वह जल्द से जल्द भगवदधाम लौटे। ऐसी समझ है कि वैसे भगवान अधिक उत्कंठीत है हमको उनके पास लाने के लिए उनके धाम लौटाने के लिए। हम उतने उत्कंठीत नहीं है। जितने भगवान उत्कंठीत भी है और भगवान कई सारे प्रयास भी करते हैं। ताकि यह जीव जो बहिर्मुख हुआ है पुनः अंतरमुख हो और मुझे प्राप्त हो मैं भी उसे प्राप्त हो। अभी तो बीच में माया है, जीव और मेरे बीच में माया खड़ी हुई है। तो उस माया को हटाकर हम एक दूसरे को मिलेंगे, गले लगाएंगे इस तरह यह जीव वापस आएगा। तो यह सारा गीता का उपदेश सुनाने के पीछे यही उद्देश्य है। और इस गीता को कभी बुद्धि योग भी कहते हैं योग मतलब लिंक भी है। हमारे संबंध को पुनः स्थापित करने की बात योग द लिंकिंग। हरि हरि। येन माम उपयंन्ति ते उपयंन्ति आएंगे पास जैसे उपवास है ना उप शब्द से परिचित हुआ उपवास मतलब पास निकट वैसे यहां उपयंन्ति कहां मतलब पास जैसे नगर और उपनगर होते हैं नगर वाले के बगल में उपनगर। उपयंन्ति ते वह मेरे पास आएंगे। मैं यहां पर रुकूंगा। एक ही हुआ श्लोक और एक बचा है यह जो चार विशेष श्लोक है ग्यारहवा श्लोक दसवा अध्याय उसको कल पढ़ेंगे सुनेंगे। तब तक आप यह तात्पर्य वगैरह भी पढ़ो और विचारों का मंथन चिंतन करिए फिर आगे बढ़ेंगे हम। गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल।

English

8 January 2021 Have faith that the Lord loves you more than you love Him - Gita Paribhasa sutras Hare Kṛṣṇa ! We have 827 participants chanting with us. This is special darshan which we are getting. There are devotees from Bhubaneswar, Ukraine, Mumbai, Aravade, Nagpur, Mauritius, Alibagh, Thailand, South Africa, present with us. This is like Virata-Rupa or Visvarupa darshan of devotees around the world. Devotees are calling out for Krsna by chanting the maha-mantra : Hare Kṛṣṇa Hare Kṛṣṇa Kṛṣṇa Kṛṣṇa Hare Hare Hare Rama Hare Rama Rama Rama Hare Hare Kṛṣṇa bada doya maya, Kṛṣṇa is kind. Can we say that? We wouldn't be chanting His holy name if He wasn’t kind. He wakes us up from the sleep, jiva jago jiva jago gaura chandra bole… The sun is available for everyone who wakes up early and they are blessed. toma bina ke dayalu jagat samsare? Who can be more merciful than You? Krsna is showering mercy, Krsna kripa kataksha. There cannot be any other way other than Kṛṣṇa's mercy to remember Him or trying to remember Him. By reciting Kṛṣṇa's name, we are directly contacting Him through hearing. nitya-siddha Kṛṣṇa-prema ‘sādhya’ kabhu naya śravaṇādi-śuddha-citte karaye udaya Translation : Pure love for Kṛṣṇa is eternally established in the hearts of the living entities. It is not something to be gained from another source. When the heart is purified by hearing and chanting, this love naturally awakens. (CC Madhya 22.107) Mistakenly we love illusion (maya). This is wrong. We commit sins by loving maya. śravaṇādi-śuddha-citte karaye udaya. śravaṇādi means hearing, chanting, kirtan etc. The nine processes of devotional service begin with hearing. By hearing Kṛṣṇa's pastimes we revive and increase our love for Kṛṣṇa.If we hear mundane talks then we end up remembering mundane things. There are 2 types of hearing, 1.Kṛṣṇa katha and 2.Gram katha By hearing Kṛṣṇa katha, we start loving Kṛṣṇa and by hearing gram katha (movies, politics, radio, internet) lust and anger increases. We are amidst the blazing fire of material existence - samsara davanala, our senses are on fire and if we further add fuel to the senses with mundane news then it will create havoc. Think wisely and differentiate between the two kathas and choose accordingly. This is what Bhagavad Gita teaches us, Lord Krsna is the teacher krsnam vande jagatgurum and Arjuna is the disciple karpanya-dosopahata-svabhavah prcchami tvam dharma-sammudha-cetah yac chreyah syan niscitam bruhi tan me sisyas te 'ham sadhi mam tvam prapannam Translation: Now I am confused about my duty and have lost all composure because of weakness. In this condition I am asking You to tell me clearly what is best for me. Now I am Your disciple, and a soul surrendered unto You. Please instruct me. ( BG 2.7) We are in the 10th chapter discussing the catur sloki, the 4 main verses from 10.8 to 10.11. We heard 2 verses yesterday and today we will hear the next two verses. teṣāṁ satata-yuktānāṁ bhajatāṁ prīti-pūrvakam dadāmi buddhi-yogaṁ taṁ yena mām upayānti te Translation To those who are constantly devoted to serving Me with love, I give the understanding by which they can come to Me. (BG 10.10) This is the secret of success. The spirit soul has to reach Vaikuntha, the supreme destination where Lord Kṛṣṇa resides. In the 4th chapter Lord Kṛṣṇa says : janma karma ca me divyam evaṁ yo vetti tattvataḥ tyaktvā dehaṁ punar janma naiti mām eti so ’rjuna Translation One who knows the transcendental nature of My appearance and activities does not, upon leaving the body, take his birth again in this material world, but attains My eternal abode, O Arjuna. (BG 4.9) How can you reach Krsna ? He is telling you explicitly, through the guru, spiritual master. evaṁ paramparā-prāptam imaṁ rājarṣayo viduḥ sa kāleneha mahatā yogo naṣṭaḥ paran-tapa Translation This supreme science was thus received through the chain of disciplic succession, and the saintly kings understood it in that way. But in course of time the succession was broken, and therefore the science as it is appears to be lost. (BG 4.2) The spiritual master delivers the same message of Kṛṣṇa. This message is directly from the lotus lips of Lord Kṛṣṇa. Mukha padma bhasya. Keep hearing from the guru and understand it deeply, teṣāṁ satata-yuktānāṁ, the Lord is giving the benediction to us, comprehend it. The Lord is being merciful and granting a special benediction to all of us through His teachings. bhajatāṁ prīti-pūrvakam - the Lord is giving us intelligence which is the driver, the means to understand. īśvaraḥ sarva-bhūtānāṁ hṛd-deśe ’rjuna tiṣṭhati bhrāmayan sarva-bhūtāni yantrārūḍhāni māyayā Translation The Supreme Lord is situated in everyone’s heart, O Arjuna, and is directing the wanderings of all living entities, who are seated as on a machine, made of the material energy. (BG 18.61) The body is the vehicle or the chariot which is driven by the horses, which are our senses, and are bridled by the rope, our mind and the driver, is our intelligence and the soul, the passenger. Our life is a journey from 'womb to tomb.’ It does not end. The destination is pre-decided. The driver drives the chariot and the migrant which is the soul is sent to the destination. Intelligence plays an important role. Here Lord Kṛṣṇa says, "I give the intelligence.” dadāmi buddhi-yogaṁ taṁ. "To whom do I give intelligence?" To those who are devoted to Me constantly, teṣāṁ satata-yuktānāṁ, consistently, always kirtaniya sada harih. Srila Prabhupada says, remember the Lord and engage in devotional service, 24 hours, jivera svarupa hoye Krsnera nitya dasa. This is quantitative service. Do the services qualitatively, with love prīti-pūrvakam. Do not have a business mentality. sa vai puṁsāṁ paro dharmo yato bhaktir adhokṣaje ahaituky apratihatā yayātmā suprasīdati Translation The supreme occupation [dharma] for all humanity is that by which men can attain to loving devotional service unto the transcendent Lord. Such devotional service must be unmotivated and uninterrupted to completely satisfy the self. (SB 1.2.6) This is the prime duty of living entity, the duty prescribed by Srimad Bhagavatam. The eternal dharma of the soul is to serve Lord Kṛṣṇa with selfless love, with unmotivated selfish desires, ahaituky apratihatā. The Lord is repeating the same thing in Bhagavad Gita bhajatāṁ keprīti-pūrvakam. Furthermore the Lord will be declaring, if you can't serve with love then at least give up the selfish desires to achieve liberation, mystic power. sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śaraṇaṁ vraja ahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ Translation Abandon all varieties of religion and just surrender unto Me. I shall deliver you from all sinful reactions. Do not fear. (BG 18.66) Follow the nine process of devotional service beginning with hearing and going upto complete surrender. These are practiced on the nine islands of Mayapur. On Navadvipa-mandala Parikrama, each island is dedicated to the nine devotional processes. The island Simantadvipa signifies hearing (sravan bhakti). Next is Godrumadvipa which signifies kirtan. The next island Madhyadvipa signifies remembering and the next island Koladvipa is for arcanam. In this way by touring all the islands one finally reaches Antardvipa, the central island which signifies full surrender, atma-nivedam. When one fulfils the conditions laid down by the Lord, He awards intelligence to that devotee. teṣāṁ satata-yuktānāṁ bhajatāṁ prīti-pūrvakam dadāmi buddhi-yogaṁ taṁ yena mām upayānti te Translation To those who are constantly devoted to serving Me with love, I give the understanding by which they can come to Me. (BG 10.10) ye yathā māṁ prapadyante tāṁs tathaiva bhajāmy aham mama vartmānuvartante manuṣyāḥ pārtha sarvaśaḥ Translation As all surrender unto Me, I reward them accordingly. Everyone follows My path in all respects, O son of Pṛthā. (BG 4.11) The Lord says that even if you do a little service unto Him He will give intelligence accordingly. The Lord also sings the glories of His devotees. This is two way traffic. This is the kind of relationship the living entity can have with the Lord. Initially the Lord loves us. We are His part and parcel and need to revive our loving propensity towards Him. man-manā bhava mad-bhakto mad-yājī māṁ namaskuru mām evaiṣyasi satyaṁ te pratijāne priyo ’si me Translation Always think of Me, become My devotee, worship Me and offer your homage unto Me. Thus you will come to Me without fail. I promise you this because you are My very dear friend. (BG 18.65) Devotees are dear to Kṛṣṇa and similarly Kṛṣṇa is dear to the devotees. The Lord is more eager than us to take us back to Godhead. The living entity has turned his back to the Lord and Maya is the obstacle in between. She is the keeping us away from the Lord. But if we turn our face to the Lord then we can attain the Lord and embrace Him. This is Buddhi Yoga and the thought of the Lord and the intention to narrate Bhagavad-Gita. Revive our lost relationship with the Lord, yena mām upayānti te. Read the purports, contemplate on it. Gaura Premanande Hari Haribol! Question 1 If we haven't achieved love until now, is there any hope to get it in the future? Gurudev uvaca Honestly, if you have served the Lord and haven't received any love. That cannot happen. It is not possible. Krsna immediately reciprocates. Lord has said in Bhagavad Gita ye yathā māṁ prapadyante tāṁs tathaiva bhajāmy aham mama vartmānuvartante manuṣyāḥ pārtha sarvaśaḥ Translation As all surrender unto Me, I reward them accordingly. Everyone follows My path in all respects, O son of Pṛthā. (BG 4.11) Question 2 Service was done quantitatively, but quality wise love was not enough. Is there any hope? Gurudev uvaca There is less love, but at least some love is there. Otherwise how could there be service, Japa, tapa, book distribution. It was all done with love. Question 3 We hear so many spiritual topics, but still there are diversions. What is the solution to stay focused? Gurudev uvaca This is the result of weakness of the heart. We are shown the truth, but still cannot see it because we are too attached. We are blinded by lust, anger, envy, greed and so on. Carry on with the process, stick to it and gradually you will see the truth. In the end of 3rd chapter Arjuna asks why unwillingly we also commit sins and in answer to that, the Lord replied that it was because of lust, anger, sins which are committed. Try controlling the senses. The Lord will help you. Be enthusiastic and determined, have patience. Follow some guidelines to change the bad habits, abhyasena tu kaunteya. Practice every day, try. Have faith Avishya rakhshibe Kṛṣṇa - this is the symptom of surrender, have faith that Kṛṣṇa loves you. Question 4 I read in Srimad Bhagavatam that we should go to Kṛṣṇa for everything, but we also hear that, we shouldn't ask anything from the Lord, I find this contradictory. How to understand this? Gurudev uvaca akāmaḥ sarva-kāmo vā mokṣa-kāma udāra-dhīḥ tīvreṇa bhakti-yogena yajeta puruṣaṁ param Translation A person who has broader intelligence, whether he be full of all material desire, without any material desire, or desiring liberation, must by all means worship the supreme whole, the Personality of Godhead. (SB 2.3.10) Krsna says that four kinds of persons come to Him. catur-vidha bhajante mam janah sukrtino 'rjuna arto jijnasur artharthi jnani ca bharatarsabha Translation O best among the Bharatas [Arjuna], four kinds of pious men render devotional service unto Me—the distressed, the desirer of wealth, the inquisitive, and he who is searching for knowledge of the Absolute. (BG 7.16) Similarly there are four persons who do not come to Me. na māḿ duṣkṛtino mūḍhāḥ prapadyante narādhamāḥ māyayāpahṛta-jñānā āsuraḿ bhāvam āśritāḥ Translation Those miscreants who are grossly foolish, who are lowest among mankind, whose knowledge is stolen by illusion, and who partake of the atheistic nature of demons do not surrender unto Me. (BG 7.15) Dhruva Maharaja was purified of his material desire to achieve the kingdom, by going to Vrindavan and meditating on the four armed Visnu form as ordered by his spiritual master Narada Muni. He did severe austerities and chanted the mantra. By doing this his heart was purified and his devotion attracted the attention of the Lord. The Lord appeared in front of him in the place called Madhuvana near Vrindavan, but Dhruva Maharaja couldn't see the Lord. He saw the Lord seated within his heart through meditation. The Lord became pleased and by His potency He turned off the form which Dhruva Maharaja was meditating on in order to have his attention on the personal form. He asked him for any benediction as the Lord knew that Dhruva Maharaja wanted a bigger kingdom than his father’s. But Dhruva Maharaja didn't ask for anything. Rather he said, “swamin krutartosi varam na yache. I am feeling grateful. I was searching for the broken pieces of glasses which has no value but I got You who is the most valuable diamond. You are a precious jewel.”

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