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हरे कृष्ण! जप चर्चा पंढरपुर धाम से 28 जनवरी 2021 जय जय श्री चैतन्य जय नित्यानंद जय अद्वेतचंद्र जय गौरभक्तवृंद। नम ॐ विष्णु – पादाय कृष्ण – प्रेष्ठाय भूतले श्रीमते भक्तिवेदान्त – स्वामिन् इति नामिने। नमस्ते सारस्वते देवे गौर – वाणी प्रचारिणे निर्विशेष – शून्यवादी – पाश्चात्य – देश – तारिणे।। (जय) श्रीकृष्ण चैतन्य प्रभुनित्यानन्द श्रीअद्वैत गदाधर श्रीवासादि – गौरभक्तवृन्द। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।। आज 762 स्थानों से भक्त जप कर रहे हैं। हम सुन और पढ़ रहे थें प्रभुपाद का महामंत्र के ऊपर लिखा हुआ भाष्य। मै उसको भाष्य कह रहा हूँ। श्रील प्रभुपाद ने इस महिमा का गान किया है। हरे कृष्ण महामंत्र का महात्म्य कहा है।हरि हरि! जहां रुके थे वहां से हम आगे बढ़ेंगे आपको यह मिला? वचन (भाष्य)। हमने कहा तो था इसको अपलोड करने के लिए। जरूर प्राप्त कीजिएगा। पुनः पुनः पढ़ना और सुनना और इस पर मनन करना चाहिए। ये श्रील प्रभुपाद के जो वचन है हरिनाम महिमा के या नाम तत्व के और हरिनाम जप के संबंधी कुछ विधि-विधानो का या विधि-निषेधों का प्रभुपाद ने उल्लेख किया है। अपने लाइब्रेरी में आपको यह रिकॉर्डिंग या वचन संग्रहित करना चाहिए। उस पर आप कथा करिए,जपा रिट्रीट करोगे,जपा रिफाँन, जप को कैसे सुधारा जा सकता है आपको समझना है। समझना है इसको फिर समझाना है आपको इसका उपयोग कर सकते हो आप गौर – वाणी प्रचारिणे गौरांग महाप्रभु की ओर से श्री प्रभुपाद ने कहा है। महामंत्र में जो हरे है वह हरा से आता है हरे; हरा है हरे; हरा भगवान कि आल्हादिनी शक्ति है, श्री राधा ही है या हरिती जो कृष्ण के मन को हर लेती है इसीलिए यह जो शक्ति है हरा; हरा कहते हैं। हर लेती है जो मन को। अगर मगर की बात नहीं कृष्ण है ही मदन मोहन, मदन को मोहित करने वाले। मदन मोहन को भी मोहित करने वाली है यह राधा रानी इसलिए राधा रानी को राधा रानी की ख्याति है मदन मोहन मोहिनी के नाम से विख्यात है राधा रानी। राधारानी कि जय...! यह हरा कृष्ण के मन को कृष्ण के चित्त को हर लेती है कृष्ण को भी यह मोहित करती है ऐसी है राधा। भगवान की शक्ति है और फिर वह शक्ति बन जाती है व्यक्ति, मूर्तिमान! वह शक्ति मूर्तिमान बनती है। वह मूर्ति है राधा रानी! राधा ठाकुरानी! श्रील प्रभुपाद यह कह रहे हैं, है तो हरा लेकिन हम कहते हैं हरे इस महामंत्र में उस शक्ति को उस राधा रानी को संबोधित करते हैं संबोधन में। हरि हरि। श्रील प्रभुपाद कहते हैं इस महामंत्र में वैसे एक है कृष्ण नाम दूसरे है श्री राम तीसरा नाम है हरे। हरे के संबंध में भी श्रील प्रभुपाद ने कहा है कृष्ण और राम यह दोनों भी कृष्ण और राम; राम तो वैसे श्रीराम ही हैं जय श्री राम कभी-कभी लोग पूछा करते थे श्रील प्रभुपाद से हम जब हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।। कहते हैं यह कौन से राम हैं? श्रीराम हैं क्या हम श्रीराम समझ के जप कर सकते हैं? प्रभुपाद को कोई आपत्ति नहीं थी इस बात से, के हरे कृष्ण महामंत्र में जो राम है वह राम भी है, वे श्रीराम भी हैं और वह बलराम भी है। ऐसे श्रील महाप्रभु कहते थे यह तो वैसे महामंत्र में जो इस तत्व की दृष्टि से नाम तत्व की दृष्टि से विचार किया जाए तो हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। राम कृष्ण ही हैं, क्योंकि हरे हरे या हरा राधा है तो फिर राधा के साथ जो राम है वह कुछ नहीं होने चाहिए और आप राम को हरे राम को जय श्रीराम समझोगे तो फिर हरे या हरा सीता हुई ऐसा स्वीकार करना होगा, किंतु इस हरे कृष्ण महामंत्र में तो हरे अभी-अभी प्रभुपाद सिद्ध किए, ये कृष्ण कि शक्ति है, महामंत्र में यह राम की शक्ति नहीं है, बलराम की शक्ति हो सकती है। रमति रमयति च इति राम: ऐसी परिभाषा भी समझाई जाती है जो रमते हैं और रमाते हैं वह है राम और वही है श्री कृष्ण। जैसे रमण रेती है। श्री कृष्ण बलराम कि जय...! श्री कृष्ण बलराम मंदिर रमण रेति क्षेत्र में है। उस क्षेत्र का नाम रमण रेती क्यों हुआ। उस रेती में वहां के बालू में भी कहो, या रज रज में कृष्ण रमण किए राधा रमण, राधा के साथ रमण और भक्तों के साथ भी रमण, वहां गायों के साथ भी रमण किया, गोचारण लीला भी वहाँ हुई, या गायों के साथ, या कृष्ण बलराम के साथ रमन किए, गोपियों के साथ, राधा रानी के साथ रमण किए। कृष्ण बलराम मंदिर के आंगन में जो तमाल वृक्ष है श्रील प्रभुपाद उसको संभाल के रखे जब कंट्रक्शन (निर्माणकार्य)शुरू हो रहा था तो कुछ लोगों ने तो प्रस्ताव रखा कि इस वृक्ष को तोड़ना चाहिए, हटाना चाहिए। प्रभुपाद ने विरोध किया नहीं यह तमाल वृक्ष है क्योंकि तमाल वृक्ष का वर्ण कृष्ण जैसा ही है। तमालवर्ण! कृष्ण का नाम ही तमाल वर्ण तमाल कृष्ण श्रील प्रभुपाद ने तमाल कृष्ण गोस्वामी को यह नाम दिया। तमाल कृष्ण! तमालवृक्ष का जो वर्ण है तने का या शाखाओं का वह कृष्ण से मिलता जुलता है। तमाल वृक्ष को देखती है तो राधा रानी को कृष्ण का स्मरण होता है वह दौड़ कर आती है उस वृक्ष कि ओर कृष्ण यहां उपस्थित है आलिंगन देने के उद्देश्य से वह आ जाती है।तमाल वृक्ष से राधा कृष्ण कि लीलाओं का घनिष्ठ संबंध है। ऐसे तमाल वृक्ष कि भी जय...! उस क्षेत्र में कृष्ण रमे हैं इसलिए उसे रमणरेती कहते हैं। राम मतलब जो रमते हैं रमाते हैं एक धातु है रम, रम से श्रीराम हरि हरि! और कृष्ण, अनंत कृष्ण या अकर्षिणी कृष्ण जो सभी को आकृष्ट करें,आकृष्ट करने वाले भगवान। कृष्ण कन्हैया लाल कि जय...! यह श्री कृष्ण का वैशिष्ट है उन्हीं को राम कहते हैं क्योंकि वह रमते है रमाते है उन्हीं को कृष्ण भी कहते हैं या मुख्य नाम तो भगवान का प्रधान पूर्ण नाम तो कृष्ण ही है। भगवान के कई सारे नाम हो जाते हैं अलग-अलग लीलाओं के कारण भगवान के सौंदर्य के कारण, भगवान के अलग-अलग भक्तों के साथ जो संबंध है उनके कारण भगवान के कई सारे नाम हो जाते हैं। उन नामों में प्रधान नाम है कृष्ण।हरे कृष्ण! और उस नाम को हम पुकारते हैं जब हम जप करते हैं नाम को पुकारते हैं मतलब कृष्ण को पुकारते हैं, संबोधित करते हैं ओह कृष्ण! हे कृष्ण! कैसे कृष्ण? जो सभी को आकृष्ट कर रहे हैं अपनी ओर वे हैं कृष्ण। य आकर्षति स कृष्ण जो सब को अपनी और आकर्षित करते हैं वह कृष्ण है। स्व माधुरयेन मम चित आकर्षय तो जब हम हरे कृष्ण कहते हैं ,कृष्ण को संबोधित भी किया कीर्तन या जप करते समय। तब हमारा निवेदन है स्व माधुरयेन मम चित आकर्षय अपने माधुर्य से मेरे चित्र को आकर्षित कीजिए। कृष्ण ने भी कहा अर्जुन से मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् कथयन्तश्र्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च || (श्रीमद भगवद्गीता 10.9) अनुवाद: मेरे शुद्ध भक्तों के विचार मुझमें वास करते हैं, उनके जीवन मेरी सेवा में अर्पित रहते हैं और वे एक दूसरे को ज्ञान प्रदान करते तथा मेरे विषय में बातें करते हुए परमसन्तोष तथा आनन्द का अनुभव करते हैं | मेरे भक्तों की क्या पहचान है? मेरा भक्त कैसा हो? जिसकी चेतना मुझ में लगी हुई हो। जो मुझसे आकृष्ट है फिर मैं गर्व से कहूंगा कि वह मेरा भक्त है । जिन्होंने प्राण भी समर्पित किये हैं और जब भी मेरे भक्त एकत्रित होते हैं वे बोध करते हैं ,एक दूसरे से मेरे संबंध में कुछ सुनते सुनाते हैं । ऐसे हैं मेरे भक्त। मेरा भक्त इसी में संतुष्ट रहता है और रमण करता है। पुनः इस रमने की क्रिया का उल्लेख हुआ है तो महामंत्र का जप करते समय यह भी प्रार्थना है मया सः रमस्व हे राधे आपका जो रमण होता है उसमें मेरा भी समावेश करिए ना । मेरे साथ रामिये हे कृष्ण, हे राधे, ऐसा भी भाष्य महामंत्र पर लिखा गया है । श्रील प्रभुपाद आगे लिख रहे हैं, भगवान को आह्लाद देने वाली शक्ति है, राधा रानी ।भगवान सच्चिदानंद है। संधिनी से सत और संवित से चित्त ।संवित नाम की भगवान की शक्ति है। भगवान सत हैं का मतलब शाश्वत हैं। चित यानी भगवान को व ज्ञान है, इसीलिए वह भगवान है। भगवान सच्चिदानंद विग्रह है और आह्लाद यानी आनंद से पूर्ण है । श्वेताश्वतरोपनिषद् 6.8 न तस्य कार्य करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते। परास्य शक्तिर्विविधैव श्रुयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च।। अनुवाद: - उसके शरीर और इंद्रिया नहीं है, उसके समान और उससे बढ़कर भी कोई दिखाई नहीं देता, उसकी पराशक्ति नाना प्रकार की ही सुनी जाती है और वह स्वाभाविक ज्ञान क्रिया और बलक्रिया है। भगवान के कई अलग-अलग शक्तियां हैं यहां पर श्रील प्रभुपाद आह्लादिनी शक्ति के बारे में उल्लेख कर रहे हैं जो कि राधा रानी हैं। वह क्या करती हैं ?भगवान को आनंद देती हैं , उनके आनंद का कारण बनती है। पर कहा तो है कि भगवान ही सर्व कारण कारण है, इसलिए शक्तिमान और शक्ति में भेद नहीं है। शक्तिमान ही शक्ति बने हैं। राधारानी जो स्वयं कृष्ण की ही शक्ति है और फिर शक्ति ही आह्लाद देती है या फिर कृष्ण ही बन जाते हैं शक्ति और कृष्ण ही कृष्ण को आह्लाद देते हैं, शक्ति के माध्यम से। राधा कृष्ण - प्रणय - विकृति दिनी शक्तिरस्माद् एकात्मानावपि भुवि पुरा देह - भेदं गतौ तौ । चैतन्याख्यं प्रकटमधुना तद्वयं चैक्यमाप्तं ब - द्युति - सुवलितं नौमि कृष्ण - स्वरूपम् ॥ राधा - भाव(आदि लीला चैतन्य चतीतामृत 1.5) अनुवाद "श्री राधा और कृष्ण के प्रेम - व्यापार भगवान् की अन्तरंगा ह्लादिनी शक्ति की दिव्य अभिव्यक्तियाँ हैं। यद्यपि राधा तथा कृष्ण अपने स्वरूपों में एक हैं, किन्तु उन्होंने अपने आपको शाश्वत रूप से पृथक् कर लिया है। अब ये दोनों दिव्य स्वरूप पुनः श्रीकृष्ण चैतन्य के रूप में संयुक्त हुए हैं । मैं उनको नमस्कार करता हूँ, क्योंकि वे स्वयं कृष्ण होकर भी श्रीमती राधारानी के भाव तथा अंगकान्ति को लेकर प्रकट हुए हैं । " दोनों राधा और कृष्ण एक तनु है, एक आत्मा है, एक विग्रह है। दोनों एक ही आत्मा होते हुए भी भेद हुआ है। एक के दो हुए, एक हुए कृष्ण और दूसरी हुई राधा ।एक दूसरे के साथ लीला खेलने के लिए आदान प्रदान करने के लिए वे दो हुए। वैसे एक ही हैं और फिर इस कलियुग में भगवान चैक्यमापतं दो के पुनः एक हो जाते हैं ।और वह रूप है द्युति सुवलितं नौमी कृष्ण स्वरूपं श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु का इसमें कृष्ण राधा के भाव और कांति को अपनाते हैं ।जो एक के दो हुए थे वह पुनः दो के एक हो जाते हैं। श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु की जय। अधुना मतलब इस कलियुग में प्रकट हुए हैं। वह रूप है श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु का तो इस प्रकार राधा और कृष्ण का घनिष्ठ संबंध है और ऐसा संबंध और किसी के साथ नहीं है। घनिष्ठता में भी घनिष्ठ, घनिष्ठतर और घनिष्ठत्तम होगा। यह संबंध घनिष्ठतम है । द्वितीयो न अस्ति दूसरा नहीं है। जैसा कृष्ण का संबंध राधा रानी के साथ है। जय श्री राधे । जय श्री राधे। हरि हरि । हरे कृष्ण।

English

28 January 2021 Attractor of the All Attractive Hare Kṛṣṇa! jaya jaya śrī caitanya jaya nityānanda jayādvaita-candra jaya gaura bhakta vrṇda nama om vishnu-padaya krishna-preshthaya bhu-tale srimate bhaktivedanta-svamin iti namine namas te sarasvate deve gaura-vani-pracarine nirvishesha-shunyavadi-pashchatya-desha-tarine jaya sri-krsna-caitanya prabhu nityananda sri-advaita gadadhara srivasadi-gaura-bhakta-vrinda Hare Krishna Hare Krishna Krishna Krishna Hare Hare Hare Rama Hare Rama Rama Rama Hare Hare Devotees from 762 locations are chanting with us. Yesterday we were hearing and reading Srīla Prabhupāda’s commentary on the Hare Krishna mahā-mantra. We will start from where we stopped. Did you get the statement? If not, then please make sure you get it for repeated reading, hearing and contemplating. After reading, one must understand and make others understand too. gaura-vani-pracarine - preaching the message of Lord Caitanya. Srīla Prabhupāda has spread this message or the holy name on behalf of Lord Caitanya. Srīla Prabhupāda continues: The word Hara is the form of addressing the energy of the Lord. The word Hare in the mahā-mantra is derived from the word Hara. Hara is the Ahladini Sakti or internal potency of Kṛṣṇa. This internal potency is Radha. This energy of Kṛṣṇa or Hara attracts Kṛṣṇa. Krsna is known as Madan Mohan, who attracts Madan or Kāma deva and Radharani is Madan Mohan Mohini - the One who attracts Kṛṣṇa, Madan Mohan. This energy becomes a personality, who is Radharani. Hare is the way to address Hara or Radharani. Srīla Prabhupāda further says, both Kṛṣṇa and Rāma are forms of addressing the Lord directly and They mean the highest pleasure, eternal. One is the name of Kṛṣṇa, another is Rama and the third is Hare, in the mahā-mantra. Rāma is Lord Srī Rāma. People would ask Srīla Prabhupāda, "Who is Rāma in the mahā-mantra. Is He Lord Sri Rama?" Prabhupāda would reply, "Yes yes, this is the same Rama or Balarama also." But since Hare is Radharani, therefore Rāma is Kṛṣṇa only in the mahā-mantra. If we consider Rāma as Sri Rāma, then this Hare must be addressing Sita, but since Srīla Prabhupāda already asserted Hare as Radharani, therefore Rāma must be Kṛṣṇa here. ya ramati ramayati ca iti ramah The one who derives joy for Himself and gives joy to others is Rāma or Sri Kṛṣṇa. The Kṛṣṇa Balaram temple in Vrindavan is in Raman Reti. That area is known as Raman Reti because Kṛṣṇa performed His transcendental pastimes with Radharani there. He also performed His pastimes with Balarama, the Gopis, cows and cowherd boys. In the courtyard of Kṛṣṇa Balaram temple, there is a Tamal tree and the proposal was to remove it during the construction of the temple, but Srīla Prabhupāda rejected that proposal. That was because the colour of the tree is that of Kṛṣṇa. Kṛṣṇa is also known as Tamala varna or Tamala Kṛṣṇa. Srīla Prabhupāda also named a disciple Tamala Kṛṣṇa Goswami. When Radharani sees the Tamala tree, it reminds Her of Kṛṣṇa and She runs to embrace the tree thinking of Kṛṣṇa. The Tamala tree has an intimate relationship with the transcendental pastimes of Radha and Kṛṣṇa. All glories to such a Tamala tree! Rāma is one who derives joy for Himself and gives joy to others. Rāma is derived from the word Rama in Sanskrit. Ya akarshati sa Kṛṣṇaha Krsna attracts everyone. This is His transcendental quality. He is also called Rāma as He performs varied pastimes. Kṛṣṇa is called many names according to His pastimes, but the foremost name is Kṛṣṇa and this is what we call out during chanting when we say Hare Krsna. Sva-madhuryena mac-cittah akarsaya Translation O Krsna! Capture my mind with the sweetness of your name, form and pastimes. (Explanation of the Mahā-mantra by Gopala Guru Gosvami) When we say Hare Kṛṣṇa, it is our request to Him to attract our mind and attention with His pastimes and qualities. mac-cittā mad-gata-prāṇā bodhayantaḥ parasparam kathayantaś ca māṁ nityaṁ tuṣyanti ca ramanti ca Translation The thoughts of My pure devotees dwell in Me, their lives are fully devoted to My service, and they derive great satisfaction and bliss from always enlightening one another and conversing about Me. (BG. 10.9) In Bhagavad-Gīta Kṛṣṇa says, "mac-cittā- whose thoughts dwell in Me and who are attracted by Me, mad-gata-prāṇā- whose lives are fully devoted to My service, bodhayantaḥ parasparam - who discuss about My pastimes and derive satisfaction (tuṣyanti ca) and bliss (ramanti ca) - such is My devotee." maya saha ramasva Translation O Hari! Take pleasure in me and enjoy with me. (Explanation of the Mahā-mantra by Gopala Guru Gosvami) Srīla Prabhupāda continues - Hara is the supreme pleasure potency of the Lord. Kṛṣṇa is sat-cit-ananda. Sandhini is Kṛṣṇa's energy of eternal existence (Sat), Samvit is Krsna´s energy of eternal knowledge (Cit) and Ahladini is Kṛṣṇa's energy of eternal bliss (Ananda). Therefore, Kṛṣṇa is sat-cit-ananda - made up of eternity, knowledge and bliss. parashya shaktir vibhidhev shruyate There are different energies of the Lord. Our discussion here is with respect to this Ahladini energy or Radharani who gives pleasure to Kṛṣṇa. īśvaraḥ paramaḥ kṛṣṇaḥ sac-cid-ānanda-vigrahaḥ anādir ādir govindaḥ sarva-kāraṇa-kāraṇam Translation Kṛṣṇa who is known as Govinda is the Supreme Godhead. He has an eternal blissful spiritual body. He is the origin of all. He has no other origin and He is the prime cause of all causes. (Śrī Brahma-Saṁhitā 5.1) Kṛṣṇa is said to be sarva karan kaaranam, the prime cause of all causes. As the energy (Radharani) and the possessor of energy (Kṛṣṇa) are non-different. Therefore Kṛṣṇa is His own energy and He personified as Radharani to give pleasure to Himself. ek atmanāma api deha bedha gatau to Radha Kṛṣṇa ek tanu hai - Radha and Kṛṣṇa are one soul, two transcendental bodies. Tanu means vigrah or Deities. Deha bedha gatau to, One is Krsna and another is Radharani. Just to perform the pastimes, They became two but actually They are one. This relationship of Kṛṣṇa with Radharani is very profound. I think the time is up. We could discuss only one paragraph, 2-3 paragraphs are remaining. We shall discuss this in the next session. We wish this mercy of Radharani is bestowed on us as well! Srīla Prabhupāda is a Radha devotee like all Gaudiya Vaisnavas. Gaudiya Vaisnavas worship Radharani and later on they become Kṛṣṇa devotees also. We worship those who worship Radha Kṛṣṇa. ramyā kācid upāsanā vraja-vadhu-vargeṇa yā kalpitā Translation There is no better worship than what was conceived by the gopīs. Sri Kṛṣṇa Caitanya Mahāprabhu strongly recommended that we must be devoted to the Gopis of Vraja and the chief amongst them is Radharani. Therefore we must be situated in the mood of Radharani following in Her footsteps and worshipping like Her. Then the mercy of Radharani will be bestowed. Kṛṣṇa is the epitome of mercy and so is Radharani. She bestows her mercy to us through Srīla Prabhupāda. Therefore we offer our respectful obeisances to Srīla Prabhupāda. Question and Answer Question All our mundane activities come to an end at the stage of pure goodness. How? Gurudev uvaca The mode of pure goodness or suddha satva is away from the three modes of material nature, namely mode of goodness, passion and ignorance. This is a kind of stage of our progress in spiritual life. Therefore this stage can be considered as one of the satvas, the 4th satva or suddha satva (nirguna or without any mundane attribute). prakṛteḥ kriyamāṇāni guṇaiḥ karmāṇi sarvaśaḥ ahaṅkāra-vimūḍhātmā kartāham iti manyate Translation The spirit soul bewildered by the influence of false ego thinks himself the doer of activities that are in actuality carried out by the three modes of material nature. (BG. 3.27) Whatever we do, is influenced by the three modes of material nature, but when we attain pure goodness then it is not influenced by the three modes or lust, but by love for Kṛṣṇa. māṁ ca yo ’vyabhicāreṇa bhakti-yogena sevate sa guṇān samatītyaitān brahma-bhūyāya kalpate Translation One who engages in full devotional service, unfailing in all circumstances, at once transcends the modes of material nature and thus comes to the level of Brahman. (BG. 14.26) 'The three modes of material nature' - here Kṛṣṇa is summarising it. Please read it and it will be clear from the purport. Srīla Prabhupāda explains, one who engages in full devotional service, unfailing in all circumstances, at once transcends the modes of material nature and thus comes to the level of Brahman. This stage is also called Brahman Bhuta or Suddha Satva. One is satva (goodness) and other is Suddha Satva (pure goodness). Goodness is material but pure goodness is spiritual or transcendental. Gaura premanande hari haribol!

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