Srimad Bhagavatam 12.13.13
ISKCON Chandigarh
24-08-2025

गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल! 

भाद्र पूर्णिमा महोत्सव की जय!

आपने जय तो कह दिया लेकिन मैं क्यों कह रहा हूं या स्मरण दिला रहा हूं भाद्र पूर्णिमा का? भाद्रपद पूर्णिमा को इसलिए भी कहते हैं क्योंकि भाद्रपद मास की यह पूर्णिमा है और वैसे भी भद्र या भाद्र मतलब मंगलमय/वेरी ऑस्पीशियस। इस शब्द से ये ध्वनित होता है कि ये मंगलमय बेला है, इतना कह तो दिया। ग्रंथराज श्रीमद् भागवतम् की जय! ओके! तो पहले उसी को कहते हैं। इस मास में और केवल मास में ही नहीं हम लोग, हरे कृष्ण लोग इस मास में भी इस मास के पहले भी और बाद में भी ग्रंथराज श्रीमद् भागवत का वितरण करते रहते हैं। प्रभुपाद कहे,”डिस्ट्रीब्यूट बुक्स, डिस्ट्रीब्यूट बुक्स,” डिस्ट्रीब्यूट व्हाट? बुक्स, मेरे ग्रंथों का वितरण करो। मेरे मतलब भगवान के ग्रंथ का वितरण करो। इस मास में ग्रंथराज श्रीमद् भागवत का वितरण करने की महिमा भागवत में ही कही गयी है। हरि बोल! हरि बोल! सभी ने तो नहीं कहा हरि बोल! प्रभुजी ने कहा, कमलापति प्रभु आपके समक्ष बैठे हैं, मायापुर से आए हैं और यह स्वयं बड़े प्रसिद्ध है, किसके लिए? भागवत-सेट के वितरण के लिए। पिछले महीने में या इसी महीने में कहो 300 भागवत के सेट का वितरण करके आप पहुंचे हैं। भागवत के वितरण की महिमा भागवत में ही कही गयी है, जैसे मैंने कहा, ग्रंथराज श्रीमद् भागवत के 12वें स्कंध में, मतलब अंतिम स्कंध है। मैं सोच रहा था कि भगवत गीता के भी अंतिम अध्याय में भगवत गीता के वितरण की महिमा या क्या लाभ होगा यह कृष्ण ही कहे हैं-

“न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तम:” जो इस संवाद का/ वह जो कुरुक्षेत्र में हुआ गीता का संवाद/ कृष्ण और अर्जुन के मध्य में, इसका जो वितरण करेंगे वे मुझे प्रिय होंगे, ऐसा कृष्ण कह रहे हैं (माफ करना मैं कुछ व्यंग कर रहा हूं) उस भक्त से (जो भगवत गीता का वितरण करता है) उससे मुझे और कोई प्रिय भक्त नहीं है कृष्ण कहे। तो जैसे गीता के वितरण की बात या महिमा और उसका लाभ गीता के अंतिम अध्याय में भगवान ही कहे, ‘तद्वत’ याने वैसे ही ग्रंथराज श्रीमद् भागवत के अंतिम स्कंध में, कितने स्कंध है भागवत में? द्वादश स्कंध है/ 12 स्कंध है। तो 12वें स्कंध के 13वे अध्याय में, ये भी याद रख सकते हो आप। 12वें स्कंध में कितने अध्याय है? 13 अध्याय और श्लोक कितने? 23 है। उसमें से जो हम लोग कहते रहते हैं 12.13.13(12 स्कंध, अध्याय 13वां और श्लोक भी 13 वा )। इस श्लोक में ग्रंथ राज श्रीमद् भागवत के वितरण की महिमा सूत गोस्वामी कहे हैं, कौन कहे? सूत गोस्वामी। अब तो वैसे शुकदेव गोस्वामी स्वामी नहीं रहे। 12वे स्कंध के प्रारंभ में ही मतलब पहले, बट आई थिंक आई आई डोंट नो द अध्याय, याद नहीं। जैसे शुकदेव गोस्वामी और राजा परीक्षित के संवाद का समापन होता है या भागवत कथा की पूर्णाहुति होती है और फिर जो भी होना था हो जाता है। वो सर्प भी आता है पक्षी के रूप में और अपना धंधा जो भी करना था वो करता है। शुकदेव गोस्वामी नित्य लीला प्रविष्ट होते हैं। “जय ओंम नित्य लीला प्रविष्ट शुकदेव गोस्वामी महाराज की जय!” भगवान की लीला में प्रवेश करते हैं। एंड देन फिर बचे हुए जो अध्याय है, 12 वे स्कंध के, वे सूत गोस्वामी द्वारा उवाच हैं. सूत: युवाच। वैसे भागवत की शुरुआत भी सूत गोस्वामी से ही होती है। पूरा जो प्रथम स्कंध है, पूरा प्रथम स्कंध में शुकदेव गोस्वामी एक अक्षर भी नहीं कहे हैं। पूरा प्रथम स्कंध किसकी वाणी है? किसके वचन है? सूत गोस्वामी के। जैसे भगवत गीता के पहले अध्याय में भगवान नहीं बोले हैं। वैसे पहले अध्याय को भी गीता के पहले अध्याय को भी, गीता ही कहा जाता है। लेकिन देयर इज़ नो सॉन्ग ऑफ गॉड, बस भगवान उवाच है, एक छोटा सा वाक्य भगवान कहते हैं, 

“पश्येतान समवेतान कुरुन” बस इतना ही भगवान कहे पहले अध्याय में। “तुम देखना चाहते थे कि किसके साथ तुम्हें युद्ध करना है? तो दिखाओ तो सही 

“सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत” दोनों सेना के मध्य में मेरे रथ को आगे बढ़ा के खड़े करो ताकि मैं निरीक्षण कर सकूँ/ मैं निरीक्षण करना चाहता हूं/ आई वांट टू ऑब्जर्व कौन-कौन पहुंचे हैं? तो कृष्ण वैसे ही करते हैं। “पार्थ सारथी” कृष्ण का नाम क्या हुआ अभी? पार्थसारथी,पार्थ के सारथी, रथ भी भगवान का नहीं है। उस रथ के वैसे रथी है अर्जुन और सा-रथी मतलब अलोंग विद अर्जुन, अर्जुन के साथ कृष्ण भी विराजमान है। सा-रथी मतलब साथ-वाले रथी, या रथ में विराजमान होने वाले रथ और रथी, जैसे देह और क्या होता है? देही। आत्मा देह में, देह-देही, रथ-रथी, धाम-धामी भी होता है; वृंदावन धाम और भगवान धामी। भगवान रथ को आगे बढ़ाए और खड़े किए, वही स्थल है ज्योतिसर। वहां आपने कृष्ण-अर्जुन का रथ देखा है? यस वही स्थान है, एग्जैक्ट लोकेशन है जहां अर्जुन के कथनानुसार भगवान ने रथ को आगे बढ़ाके वहां स्थित या स्थापित किया था। तब कृष्ण कहते हैं कि तुम देखना चाहते हो तो देखो, “पश्य एतान” देखो देखो! इनको “समवेता” एकत्रित हुए कौन? “समवेतान कुरून” यहाँ एकत्रित इन कौरवों को देखो, हरि हरि! इतना ही कृष्ण का वचन है पहले अध्याय में। जैसे कृष्ण का प्रवचन या उपदेश, भगवत गीता के दूसरे अध्याय से शुरू होता है, वैसे ही शुकदेव गोस्वामी द्वारा कही हुई कथा, भागवत कथा श्रीमद् भागवत के कौनसे स्कंध से? द्वितीय स्कंध से शुरू होती है। 

“ओम नमो भगवते वासुदेवाय”, ये दो बार आता है। प्रथम स्कंध के प्रारंभ में और द्वितीय स्कंध के प्रारंभ में। द्वितीय स्कंध के प्रारंभ में जो “ओम नमो भगवते वासुदेवाय” है ये शुकदेव गोस्वामी कह रहे हैं। 

हरि हरि! इस 12.13.13 में, श्लोक जो आपके समक्ष है? यस? आप देख रहे हैं या आप आंखें बंद करके समाधिस्थ या निद्रस्त हैं या योगस्थ हैं? भगवान जिस तरह से कहे, योगस्थ। क्या कहे भगवान? 

“योगस्थ कुरु कर्माणि” बहुत बड़ा उपदेश दिया भगवान ने, पूरा वाक्य भी नहीं कहा,वैसे एक ही पद है। वैसे हर श्लोक में चार-चार पद होते हैं लेकिन इस श्लोक का एक ही पद है। योगस्थ कुरु कर्माणि, पहले क्या करो ? योग में स्थित हो जाओ। योग में मतलब कृष्णभावना में स्थित हो जाओ/ सेटल हो जाओ और फिर “कुरु कर्माणि” फिर कार्य करो। योगस्थ कुरु कर्माणि, हरि हरि! इसको कह ही देते हैं पहले अदरवाईज मैं और बहुत कुछ कहते जाऊंगा और ये आज की बात ऐसी रह जाएगी या देरी से शायद कहूंगा मैं। सो कहिए मेरे पीछे, इट्स हियर राइट? कहां है श्लोक? अच्छा अच्छा! उसको बड़ा कर सकते हैं क्या? मेक इट इन बिगर फोंट, केवल श्लोक ही दिखा दो अभी। फिल अप द स्क्रीन विद द वर्ड्स-

प्रौष्ठपद्यां पौर्णमास्यां हेमसिंह समन्वितम्।

ददाति यो भागवतं स याति परमां गतिम्॥ १३॥

प्रौष्ठपद्यां – भाद्र माह में; पौर्णमास्यां – पूर्णिमा के दिन; हेमसिंह- स्वर्ण सिंहासन पर; समन्वितम्- बैठा हुआ; ददाति – उपहार के रूप में देता है; य:- जो; भागवत – श्रीमद्-भागवतम् को ; स:— वह; याति – जाता है ; परमां – परम ; गतिम्- गंतव्य तक

भाषांतर और तात्पर्य श्रील प्रभुपाद के शिष्यों द्वारा- समझ में आता है ना? आपको अचरज तो नहीं लग रहा?

प्रभुपाद ग्रंथराज के दसवें स्कंध के 13वें अध्याय तक ही भागवत का भाषांतर और तात्पर्य लिखे, नोट किया आपने? आई थिंक 13 चैप्टर, दसवें स्कंध का 13 चैप्टर वास द लास्ट चैप्टर, वहां से आगे का बचे हुए दसवें स्कंध के बहुत सारे अध्याय, दसवें स्कंध में कितने अध्याय है, कितने हैं? 90 हैं। “लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण” ग्रंथ का नाम सुने हो उसमें कितने अध्याय है? 90 हैं। प्रभुपाद दसवें स्कंध का संक्षिप्तीकरण कहो उस बुक में किये हैं जिसको हम लोग “कृष्ण बुक” कहते हैं। कौन सी बुक? कृष्ण बुक। 10वें स्कंध में 90 अध्याय है तो हर अध्याय का एक-एक उससे बन गया कृष्ण बुक। वे 90 अध्याय या 10वे स्कंध के अध्याय और 11 वां स्कंध के सारे अध्याय और 11वें-12वें स्कंध के ये सब, श्रील प्रभुपाद के शिष्यों ने इसका भाषांतर और तात्पर्य भी लिखे हैं, श्रील प्रभुपाद के तात्पर्यों को आधार बना के। हमारे गौड़ीय वैष्णव आचार्यों की जो कमेंट्रीज है, भागवत पर टीकाएं हैं उसके आधार पर वे उसकी रचना किये, उसका संकलन किये। यदि कोई व्यक्ति भद्र मास की पूर्णमासी को सोने के सिंहासन पर रखकर श्रीमद् भागवत का दान उपहार के रूप में देता है तो उसे परम दिव्य गंतव्य प्राप्त होग, मतलब भगवत धाम प्राप्ति या कृष्ण प्राप्ति।

“कृष्ण प्राप्ति होए जहां होएते” आप गाते हो ना ?अभी भी गाया/ गा रहे थे, उस वक्त मैं सोच रहा था कि कृष्ण प्राप्ति जो जीवन का लक्ष्य है उसको हम हासिल करेंगे/ प्राप्त करेंगे, क्या करने से? भागवत का वितरण करने से। कौन-कौन भगवत प्राप्ति या उसके बाद में मैं कहूंगा या पूछूँगा, पहले तात्पर्य पढ़ते हैं।

तात्पर्य- 

श्रीमद् भागवत को सोने के सिंहासन पर रखना चाहिए। वैसे बीबीटी के कार्टन में भी हो सकता है। वैसे सोने से भी अधिक मूल्यवान है भागवत। जो अधिक मूल्यवान है उसी को हम दे सकते हैं, हाथ से भी दे सकते हैं, हाथ में रखते हुए, हाथ का आसन बनाके भी दे सकते हैं या पूरा बॉक्स जो कार्टन/ कागज का बना हुआ उसमें पैक करके हम दे और ले सकते हैं। यह लेनदेन की भी बात है और दोनों का भी कल्याण होने वाला है। केवल देनेवाले का ही नहीं किंतु लेनेवाले का भी। हरि हरि! क्योंकि यह समस्त साहित्य का क्या है? राजा है, ग्रंथराज। हम क्या कहते हैं? ग्रंथराज। राज मतलब राजा, सारे ग्रंथों का राजा है, ग्रंथराज श्रीमद् भागवत की जय! भाद्र मास की पूर्णिमा को साहित्य का राजा रूपी सूर्य, सिंह राशि पर स्थित होता है। अच्छा! और ऐसा दिखता है मानो राज सिंहासन पर बैठाया गया है। ज्योतिष के अनुसार सूर्य सिंह राशि में सर्वोच्च स्थिति पर होता है। इस तरह सिंहस्थ, जब कुंभ मेले चलते हैं तो सिंहस्थ सूर्य कहां स्थित है? तो वह सिंह राशि पर स्थित होता है। पूर्णमासी को साहित्य का राजा रवि /सूर्य भागवतम सिंह-राशि पर स्थित होता है। इसलिए भी आप सोने के सिंहासन पर स्थित करो और वितरण करो, ऐसा उल्लेख हुआ इस वचन में/ इस श्लोक में। इस तरह मनुष्य बिना किसी बंधन के, इस परम दिव्य ग्रंथ श्रीमद् भागवत की पूजा कर सकता है। भागवत की पूजा कैसे होगी? कई प्रकार से होती है। “नित्यं भागवत सेवया”। एक समय ग्रंथ वितरण करने वाले भक्त, ट्रैवलिंग संकीर्तन पार्टी के भक्तों ने अपना वाहन या वेहीकल् ग्रंथों से या भागवत से या गीता से इतना खचाखच भरा हुआ था कि उनके जो ट्रैवलिंग डीटीज़ है, विग्रह है उनके लिए कोई स्थान ही नहीं रहा। तो वे प्रभुपाद से कंसल्ट कर रहे थे, अब क्या किया जाए? हमारे पास तो विग्रह रखने के लिए स्थान ही नहीं हमारे व्हीकल में। हम कैसी आराधना करेंगे? तो प्रभुपाद कहे ग्रंथों की आरती उतारो, ग्रंथों की पूजा करो, ग्रंथ ही भगवान है, ग्रंथ भी भगवान है और इसको वांग्मय मूर्ति कहा जाता है, कैसी मूर्ति? वांग्मय। वान्ग् मतलब वाक, वाकमय जिसमें कई सारे वाक्य है, सेंटेंस है एक है, दो है, ऐसे सारे वांग्मय हैं फिर वे मूर्ति हो जाते हैं परसोनिफाइड हो जाते हैं इसलिए फिर इसकी आराधना भी हो सकती है। यहां जो “प्रौष्ठपद्यां पौर्णमास्यां” का जो उल्लेख हुआ है, ये भाद्रपद मास की पूर्णिमा का उल्लेख हुआ है। इस दिन वितरण की बात क्यों कर रहे हैं? इसका कारण यह है सुन लो, सुन रहे हैं ना? वैसे शुकदेव गोस्वामी पुनः-पुनः बीच-बीच में कहा करते हैं, “श्रुणु” / सुनो या देखो या सुनो, श्रोता को वो कहते हैं। क्यों? ताकि थोड़ा और भी ध्यान उनका केंद्रित हो जाए या आकृष्ट हो जाए। डोंट मिस दिस, अब मैं जो कहने वाला हूं उसको सुनो। ये नहीं कि मैं सुन नहीं रहा हूं, लेकिन और भी ध्यान से सुनो। यहां मंदिर के बाहर मन को दौड़ने मत दो, यही रखो, सुनो। शुकदेव गोस्वामी भाद्रपद मास में, भाद्रपद मास की नवमी को भागवत कथा प्रारंभ किए। भागवत कथा गंगा के तट पर हस्तिनापुर, जानते हो हस्तिनापुर? हस्तिनापुर धाम के जय! हस्तिनापुर के बाहर गंगा के तट पर शुकदेव गोस्वामी भागवत कथा राजा परीक्षित के लिए सुनाना प्रारंभ किए। वैसे सुनने के लिए कई राजर्षि/ महर्षि / देवर्षि वहां पहुंच गए, कहां-कहां से? सारे ब्रह्मांड भर के, सुन तो लो। सोना अधिक महत्वपूर्ण है क्या? व्हाट इज मोर इमपोरटेनट? सुनना कि सोना? सीधे बैठो, सिट प्रॉपर्ली, योगी जैसे, न कि भोगी जैसे। वहां पर शुकदेव गोस्वामी नवमी के दिन भागवत कथा प्रारंभ किए। कथा कितने दिन होने वाली थी? सात दिन। आठवें दिन हो भी नहीं सकती थी। क्यों? क्योंकि राजा परीक्षित को श्राप दिया था कि कितने दिन में तुम क्या होगे? तुम मरोगे।

हम भी कैसे करते हैं हम लोग भी एक सप्ताह भर में मर जाते हैं कि नहीं?हां? डरना नहीं। महाराज आशीर्वाद देने आए हैं कि श्राप देने आए हैं। इसका तात्पर्य यह है कि हम लोग सप्ताह भर में ल, एक सप्ताह में ही मरते हैं। कोई संडे को मारता है, कोई मंडे को, कोई ट्यूसडे को, लाइक दैट राइट? सभी कितने दिन में मरते हैं? सब सप्ताह में,संडे/मंडे। उनके सात दिन ही शेष थे इसलिए उन्होंने सात दिनों तक कथा की। नवमी से प्रारंभ हुआ, नवमी से सात दिन गिनिये। कथा की पूर्णाहुति किस दिन हुई होगी? यस,पूर्णिमा को। नवमी, लाइक दैट, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा। देख रहे हो सेवन डेज। शुकदेव गोस्वामी की कथा की पूर्णाहुति पूर्णिमा के दिन हुई और मास भी कौन सा था? भद्रमास की पूर्णिमा के दिन हुई। तो फिर इस कथा के श्रवण का फल इसको श्रुतिफल कहते हैं, श्रुतिफल या फिर श्रवण करने के लिए आप पूरा भागवत ही दो और वह भागवतम् प्राप्त करने वाला इसको पढ़ेगा। राइट, वह पड़ेगा भागवत को। भागवत को पढ़ना मतलब क्या है? पढ़ना मतलब ही सुनना होता है। पढ़ना मतलब ही सुनना होता है। किसी ने कही हुई बातें या वचन उसी को, यस दैट आल्सो कुड बी सेड। प्रभुपाद भाषांतर कर रहे थे, तात्पर्य लिख रहे थे, इसलिए भी वैसे ग्रंथ भगवद्गीता और भागवत का वितरण करना चाहिए।

श्रील प्रभुपाद ने कितना सारा कष्ट उठाया हमारे कल्याण के लिए, यह हमने देखा है। हम जब सो जाते तो उस समय प्रभुपाद भी विश्राम कर लेते लेकिन मध्य रात्रि में प्रभुपाद जग जाते, हम तो सोए रहते। प्रभुपाद यूसड् टु वेक अप इन द मिडिल ऑफ द नाइट और भाषांतर किया करते थे। यह देखी हुई बात है, केवल सुनी ही नहीं, ये देखी हुई बात है। जब प्रभुपाद ग्रंथ लिखते थे तो इसका मतलब प्रभुपाद पेन-पेपर लेकर ऐसे नहीं लिखते थे। कैसे लिखते थे? डिक्टाफोन मशीन में उसकी रिकॉर्डिंग करते थे और फिर तुरंत ही उसको क्या करते? वे उसको ट्रांसक्राइब करते , उसको टाइप करते। फिर उसका मनुस्क्रिप्ट बन जाता धीरे-धीरे। ले-आउट डिजाइन होता और फिर प्रिंटिंग होता गीता भागवत का। भक्त वैसे गोडाउन को पूरा भरने नहीं देते, द बी.बी.टी गोडाउन वाज़ पैक्ड, श्रील प्रभुपाद फोटो खींचकर कहते, “नो नो! इसको खाली करो, उसकी फोटोग्राफ मुझे दिखाओ। भरा था लेकिन खाली का फोटोग्राफ मुझे दिखाओ। तो गोडाउन भर जाते थे और खाली हो जाते थे और खाली करने वाले ग्रंथ-वितरक हुआ करते थे। फिर फाइनली जब ग्रंथ का वितरण हुआ और किसी के हाथ में भाग्य से लगा प्राप्त हुआ और फिर वह व्यक्ति जब भागवत को जब पढ़ रहा है, गीता को भागवत को पढ़ रहा है, तो क्या कर रहा है? प्रभुपाद ने किसी एक रात्रि को जो भी कहा, जो रिकॉर्ड हुआ, श्रील प्रभुपाद उवाच, उसी को तो पढ़ने वाला क्या करता है? सुनता है।यस, उसको सुनता है। प्रभुपाद के ग्रंथ पढ़ना मतलब सुनना ही है। प्रभुपाद ने जो-जो कहा, अपने दिल की बात केवल मन की बात नहीं। मन की बात तो हमारे प्रधानमंत्री.. मन की बात। लेकिन क्या भरोसा इस मन का? दिल की बात तो कहा,दिल की बात मतलब दिल में विराजमान जो आत्मा है, उसकी बात उसकी पुकार को हम सुनते हैं, जब प्रभुपाद के ग्रंथ को हम पढ़ते हैं। तो प्रभुपाद ने किया कीर्तन, उसके पहले शुकदेव गोस्वामी ने किया था कीर्तन। हरि हरि। और उसी को एज़-इट-इज़ प्रभुपाद हमको सुनाते रहे, अपने ग्रंथों के रूप में हमको सुना रहे हैं या प्रभुपाद ने किया हुआ पहले कीर्तनम है और फिर, फिर हम क्या करते हैं? हम श्रवण करते हैं। तो फिर क्या होना चाहिए?

“श्रवनम कीर्तनम विष्णोेः स्मरणम” विष्णु का स्मरण,कृष्ण का स्मरण होगा और यदि कृष्ण का स्मरण हुआ तो इस ग्रंथराज श्रीमद् भागवत के अध्ययन का, श्रवण का फल प्राप्त हुआ हमें।

हरि बोल! शुकदेव गोस्वामी अभी-अभी मार्ग में थे, वे अभी आ ही रहे हैं। शुकदेव गोस्वामी आ रहे हैं….। तो चर्चा हो रही थी राजा परीक्षित के सात दिन बाकी हैं, कितने दिन बाकी हैं? सात दिन ही बाकी है तो उनकाे क्या करना चाहिए सात दिनों में ताकि, “अंते नारायणः स्मृतिः” हो जाए। इनको हर दिन थोड़ी-थोड़ी अधिक-अधिक स्मृति हो जाए और सातवें दिन तो पूरा स्मरण भगवान का इनको हो जाए, क्योंकि डेट्स वेरी इंपॉर्टेंट क्योंकि, “यं यं वापि क्या?स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्”, यं यं वापि स्मरण स्मरण, जिस प्रकार का स्मरण मृत्यु के समय होता है, 

“तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भ‍ावभावित:” उस पर ही हमारा भविष्य निर्भर होगा। किस प्रकार का शरीर या नो शरीर, शरीर ही नहीं,शरीर की जरूरत ही नहीं, भगवत धाम वह लौटेगा या नही? यह सारा निर्भर करता है – अंतिम जो क्षण होते हैं। इसलिए हम लोग गाते तो रहते हैं, ”गोविंद नाम लेके”,तब क्या हो जाये? तब प्राण तन से निकले”। “वो छवि मन में बसी हो”..जो भी हमने दर्शन किया, राधा माधव की वो छवि मन में बसी हो। हरि हरि!

 शुकदेव गोस्वामी ये भागवत कथा सुनाए , सात दिन सुना रहे थे। वैसे वह समय कलियुग जब,ये तो बता दिया कहां सुना रहे थे राइट? कहां सुना रहे थे? सुना न आपने? हां याद है? और कितने दिनों तक सुनाएं? क्या सुनाएं? भागवत कथा। सब याद है? याद रखने के लिए पहले क्या करना होता है? याद है याद है याद है मतलब वो जो तुमने सुना था/पढ़ा था/देखा वो याद है ? याद तो तभी होगा जब पहले का सुना या देखा या सुंघा हुआ कोई अनुभव है, तो उसी को हम लोग याद करते हैं ना? इसको रिमेंबर कहते हैं, रिमेंबर री..री..मतलब रिपीट। ये अंग्रेजी का शब्द है तो उसकी भी उत्पत्ति कैसे होती है, हर शब्द की। तो री मतलब पुनः,अगेन, रिमेंबर रिसाइट.. एनीवे। पहले यदि हमने सुना है, पढ़ा है, तभी तो प्रश्न है उसका रिमेम्ब्रेंस का/ याद रखने का। उसी को कहा वैसे “श्रवनम् कीर्तनम् विष्णु स्मरणम्”। शुकदेव गोस्वामी ने ये कथा कब सुनाई? तो उसका भी शास्त्र में वर्णन है। मैं कल रात को भी कह रहा था कि ये कथा सुनाई, (हरि बोल! सुनो! आप बीच में सो गए।) तो उस वक्त जो कही हुई बातें आपको याद रहेगी क्या? कथा हो रही,कथा हो रही है और बीच में आप सो गए, तो आप जब जग जाओगे तो आपको याद रहेगा क्या? और कभी भी याद नहीं होगा क्योंकि सुना ही नहीं तो याद रहने का प्रश्न ही नहीं है। 

हरि हरि! जब कलियुग 30 साल का था, कलयुग कितने साल का था? 30 साल का था। कलयुग शुरू कब हुआ? 

“क्ष्मां त्यक्त्वा स्वपदं गतःतद्दिनात् कलिरायातः यदा मुकुंदो भगवान”

 यदा मतलब क्या? यदा मतलब जब। 

“यदा यदा ही धर्मस्य” यदा मतलब जब। यदा मुकुंद भगवान, मुकुंद भगवान समझ आया? क्ष्मां त्यक्त्वा,क्ष्मां मतलब पृथ्वी, त्यक्त्वा मतलब छोड़कर, स्वपदम गतः मतलब अपने धाम लौटे। ओके? आर यू विद मि? मेरे साथ हो आप? हर क्षण रहो। मेरे साथ मतलब भागवत के साथ और भागवत के साथ मतलब भगवान के साथ। यदा मुकुंदो भगवान क्ष्मां त्यक्त्वा स्वपदं, ‘तद्दिनात्‘ मतलब उस दिन से, ऐसा अर्थ होता है। तद्दिनात् कलिरायातः, कलियुग आ गया। मतलब जिस दिन भगवान अपने धाम लौटे, जो दिन वैसे द्वापार युग का अंतिम दिन था, वही कलयुग का प्रथम दिन बन गया, उस दिन से कलयुग शुरू हुआ। तो होते-होते आप जानते ही हो फिर जब भगवान अंतर्धान हो जाते हैं और ये समाचार लेके अर्जुन द्वारका से हस्तिनापुर लौटते हैं। सात महीनों के उपरांत, सात महीने वे लौटे नहीं, वहीं रहे। तो ब्रेकिंग द न्यूज़,न्यूज़ को ब्रेक किया मतलब कहा, जो ऐसी बातें सुनना नहीं चाहते थे, लेकिन क्या किया जाए? भगवान नहीं रहे, यह समाचार जब पांडवों को दिया गया था और कुन्ति को भी जब दिया गया तो कुन्ति यह समाचार सुनते ही ऑन द स्पॉट वो भगवत धाम लौटी और सभी पांडवों ने सोचा हरि हरि! (समथिंग हैपनड, माइक्रोफोन को कुछ हुआ, अच्छा हुआ देखते क्या होता है)। पांडवों ने सोचा अब क्या, भगवान नहीं रहे संसार में तो उन्होंने वानप्रस्थ तो ले ही लिया। प्रस्थान किए बद्रीिका आश्रम के लिए और उसके पहले, प्रस्थान के पहले मतलब अब तक तो युधिष्ठिर महाराज सम्राट थे, राजाओं के भी वे राजा थे, एंपरर। उनका एंपायर या साम्राज्य कहां तक फैला हुआ था? शास्त्रों में कहा है सुनो, सोने वालों सुनो। “ पृथ्वीपते” कहा है युधिष्ठिर महाराज को भी और अब होने वाले नेक्स्ट सम्राट राजा परीक्षित, उनको क्या कहा है? क्या कहा है? पृथ्वीपति, सर्वत्र उनका फैला हुआ था साम्राज्य और जब कुरुक्षेत्र का वॉर हुआ, उसमें सम्मिलित होने वाले राजा सारे पृथ्वी भर से वहां पहुंचे थे इसलिए उसको महाभारत, “हिस्ट्री ऑफ ग्रेटर इंडिया” कहते हैं। इंडिया वैसे एक बकवास का शब्द है, हम लोग इंडियन नहीं है। कोई अमेरिकन बन गए, कैनेडियन बन गए, ऑस्ट्रेलियन बन गए इसी तरह इंडियन हम लोग बन गए। वैसे हम है कौन है? भारतीय है। भारत मतलब पृथ्वी पर फैला हुआ था भारत। तो ऐसे विराट विशाल साम्राज्य का त्याग कर पांचों पांडवों ने दे रिटायर्ड टाइमली एंड लेफ्ट द किंगडम। और उसके पहले उन्होंने क्या किया? राजा परीक्षित को सम्राट बनाया। राइट? गेटिंग दैट। फिर अभी कह ही सकते हैं, जो मैंने कहा और मैं वही कह रहा हूं जो सत्य है। “मैं जो भी कहूंगा सच ही कहूंगा”। सच के अलावा या झूठ के अलावा और कुछ नहीं कहूंगा। जब राजा परीक्षित, आई थिंक ही वाज़ रूलिंग फॉर थर्टी इयर्स क्योंकि भागवत जब सुनाया तो इस प्रकार 30 वर्ष बीत चुके थे। कलयुग भी अब 30 वर्ष का था। गणना कब शुरू हुई? कृष्ण के प्रस्थान से ये काउंटिंग शुरू हुई और 30 वर्ष बीत गए। राजा परीक्षित भी 30 वर्ष से कारोबार संभाल रहे थे। उनका कैपिटल/उनकी राजधानी कौन सी थी? हस्तिनापुर उनकी राजधानी थी। ही वास रूलर ऑफ द होल वर्ल्ड, सारे जगत के वे सम्राट थे। उनको यह कथा सुनाने जा रहे हैं और सुनाई भी शुकदेव गोस्वामी ने। जब भगवान इस पृथ्वी को त्याग कर ( इधर भी में देखता हूं नहीं तो आप फायदा उठा सकते हो मेरा, इसीलिए वैसे वक्ता को उच्च आसन दिया जाता है ताकि वो, अपना जो क्षेत्र है, उसका निरीक्षण कर सकते हैं। वही कारण है कि आसन ऊंचे क्यों होते हैं)। कृष्ण जब जाने की तैयारी कर रहे थे भगवत धाम,लेकिन यह बात वैसे एक समय प्रयास तो था या जाने-अनजाने उद्धव को इस बात का पता नहीं था कि भगवान के अब 125 वर्ष यह धरातल पर जो लीला खेल रहे थे वो बीत चुके हैं और भगवान अब “स्वपदम गत:” अपने धाम लौटेंगे। उद्धव को जब पता चला कि भगवान प्रस्थान की तैयारी कर रहे हैं, तो कहने लगे,” नहीं नहीं मैं भी जाऊंगा, मुझे भी ले चलो” इसका ये सब संवाद थोड़ा-सा भागवत में आता भी है, आया ही है ऑफ कोर्स। फिर भगवान कह रहे हैं, “ नहीं! नहीं! तुम रहो, तुम रहो। इस संसार को तुम्हारी जरूरत है, दे नीड यू। मैं चाहता हूं तुम रहो।” लेकिन उद्धव तैयार नहीं थे, “ नहीं! नहीं! नहीं! मैं भी आपके साथ जाऊंगा”। 

“शून्यायितं जगत्सर्वं गोविन्द-विरहेण में“ इसका अनुभव तो हमको नहीं होता, हम लोग रटते तो रहते हैं, कहते तो रहते हैं, कंठस्थ भी होता है ये शून्यायितं जगत्सर्वं गोविन्द-विरहेण में। किन्तु उद्धव तो ऐसे अनन्य भक्त थे, अनन्य; अन+अन्य। भगवान कृष्ण कन्हैया लाल की जय! अभी वैसे द्वारकाधीश बने हैं, कन्हैया लाल तो वृंदावन में होते हैं। तो उन्होंने कहा,” नहीं नहीं नहीं मैं भी रहता हूं, मैं भी रहता हूं।” कैसे रहोगे आप?” मैं भागवत कथा के रूप में इस संसार में रहूंगा।”

“कृष्णे स्वधामोपगते धर्मज्ञानादिभि: सह” भगवान लौटे अपने धाम, तो क्या हुआ? कलौ/कलयुग आ गया,” कलौ नष्टद्रशाम ऐशाम”, कलौ मतलब क्या? कलयुग में। केवल कलयुग नहीं, कलयुग में। कलि मतलब कलि, कलौ मतलब कलयुग में, ये सप्तमी विभक्ति है,व्याकरण में सप्तमी। 

“कलौ नास्तेव नास्तेव”; “कलौ नष्टद्रशाम” मतलब इस जगत के लोगों की दृष्टि क्या होगी? नष्ट होगी, अंधे होंगे या तमोगुण इतना छा जाएगा कि कुछ दिखाई नहीं देगा।

“अहम अज्ञान जम तमः” ऐसे गीता में भगवान कहते हैं। इसकी क्या शुरुआत है? हां जोर से ,

“तेषां सततयुक्तानां”, नहीं! नॉट देट। 

“तेषामेव अनुकम्पा” भगवान कह रहे कि दुनिया वालों को मैं जब देखता हूं दुखी/असहाय या हेल्पलेस और 

“मंद सुमंद मतयो ह्युपद्रुता:” तो मेरे हृदय में कंपन होता है, कम्पित होता है मेरा हृदय,मुझे दया आती है सबको देखके।

“तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तम: 

नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता।

भगवत गीता के दसवें अध्याय के चार श्लोक है, उनको क्या कहा जाता है? “चतुश्लोकी भगवत गीता” चार श्लोकों में बड़ी रहस्यमय बातें कही है, उसमें से एक श्लोक है/ एक वचन है, 

“तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः” जब तमगुण से अज्ञानजम या कहो अज्ञान से जन्मा, मतलब उत्पन्न हुआ तम/ अंधेरा। समझ रहे हैं आप? अज्ञानजम /अज्ञान से उत्पन्न जम/ तमः 

तम / अंधेरा। “अहम नाशयामि” अहम मतलब कौन? कौन कह रहे है? कृष्ण कह रहे हैं मैं नाश करता हूं। वही बात चल रही कलौ नष्टद‍ृशामेष कलयुग आते ही दृष्टि नष्ट होती है, कुछ दिखाई नहीं देता। हरि हरि! मंदिर का रास्ता तो दिखता ही नहीं, मॉल का रास्ता दिखता है, सिनेमा घर का रास्ता दिखता है।

और क्या क्या? जहाँ “महा नरसिंह अवतार” दिखाई जा रही है तो वो रास्ता दिखे तो अच्छा है, वो चित्रमंदिर का रास्ता।

“नाश्यामि आत्मभावस्तो” भगवान कहते हैं कि मैं ऐसे अंधकार को नष्ट करूंगा, कैसे? “ज्ञानदीपेन भास्वता” ऐसे व्यक्ति के, जिस पर मुझे दया आ रही है, उसके हृदय प्रांगण में मैं ज्ञान का दीप जलाऊंगा और वही ज्ञान का दीपक है भगवत गीता और भागवतम् , हरि बोल! जहां भगवत गीता को भगवान कहे उस स्थान को क्या कहते हैं? वो तो कहते ही है लेकिन उस स्थान को “ज्योतिसर” कहते है। कुरुक्षेत्र तो कहते ही है, लेकिन वो एग्जैक्ट लोकेशन को क्या कहते हैं? ज्योति सर। एक तो ‘सर’ मतलब सरोवर भी होता ही है और यहां मैं सोच रहा हूं, वैसे ये मैंने कहीं पढ़ा नहीं लेकिन थोड़ी-सी कल्पना कर रहा हूं कि ज्योति, जो ज्ञान की ज्योति भगवान ने भगवत गीता के रूप में जो जलाई वहां, तो यह ज्ञान या ज्योति का वो सरोवर है या स्रोत है। है ऐसा कुछ? कुछ खींचातानी करके हम लोग ऐसा भी अर्थ निकाल सकते हैं कि ज्योति का स्रोत है। ज्योतिसर स्रोत है ज्योति का,ज्ञान का। ज्ञान का दीपक वहां जलाए भगवान अर्जुन के हृदय प्रांगण में और वैसे लक्ष्य तो भगवान का हम सब थे। एक दिन हमारे हृदय प्रांगण में भी उसी ज्योति को प्रकाशित करना चाह रहे थे इसीलिए शुरुआत की उन्होंने और अर्जुन को निमित्त बनाया कुरुक्षेत्र में और राजा परीक्षित को क्या बनाया? निमित्त बनाया। यस आर यू गेटिंग दैट? ये गीता ना तो केवल अर्जुन के लिए थी ना तो शुकदेव गोस्वामी के लिए थी। बैक टू भागवत/ भागवत के प्रारंभ में ही कहा है, मैं जो कह रहा हूं। भगवान अपने धाम लौटे और फिर क्या हुआ? कलयुग आया और “कलौ नष्टदृशामेष” फिर आगे कहा है लोगों की दृष्टि नष्ट होगी और 

“अधुना पुराणार्कोऽधुनोदितः” अधुना मतलब अब। अब मतलब कब? जब आया कलयुग तब। अधुना पुराण अर्क उदिता, ‘उदिता’ मतलब उदित हुआ, पुराण; कौन सा पुराण? भागवत पुराण। कैसा है यह भागवत पुराण? पुराण अर्क उदिता, ‘अर्क’ क्या होता है? अर्क माने सूर्य, ऐज़ ब्रिलियंट ऐज़ सन। भागवतम कैसा है? ब्रिलियंट एज़ सन, सूर्य की जो प्रखर ज्योति होती है। वैसे उससे भी अधिक ज्योति “कोटि सूर्य समप्रभा” केवल एक सूर्य जैसी प्रभा ही नहीं है इस भागवत में, कितनी प्रभा है? कोटि सूर्य समप्रभा वाला एक ग्रंथ, क्या हुआ? उदित हुआ। तब उद्धव कहे, “ठीक है फिर मैं रहता हूं, आई विल स्टे बैक, स्टे बिहाइंड, मैं रहता हूं।” तो उद्धव रह गए। उनको रहने के लिए कहा, “तुम बद्रिकाश्रम जाओ और वहां रहो, केवल रहना ही नहीं वहां प्रचार करना है भागवत का।” ठीक है, वैसे मैं जरूर करूंगा लेकिन मैं अपनी पसंद का जो स्थान है, कौन सा? कुसुम सरोवर। वृंदावन में गोवर्धन परिक्रमा के मार्ग पर, राधा कुंड से जैसे हम आगे बढ़ते हैं, पूछरी के लौठे बाबा की ओर, तो शुरुआत में क्या होता है? एक कुसुम सरोवर आता है। कुसुम सरोवर जहां प्रतिदिन गोपियां और राधा रानी कुसुम मतलब पुष्प/ फूल, फूलों का चयन करने/ तोड़ने वहां आती है, तो मैं वहां रहूंगा। वहां क्यों रहोगे?वहाँ गोपियाँ आती है तो उनके चरणों की धूल मेरे मस्तक पर आयेगी। मैं वहीं रहूंगा और कैसे रहूंगा? वहां की जो घास है/ लता/ बेली जो है कुसुम सरोवर के तट पर उसके रूप में मैं रहूंगा ताकि गोपियां आएगी तो मुझ पर चल सकती है/ नाच सकती है/ खेल सकती है या ठुकरा सकती है। इसी के साथ मुझे अंग-संग प्राप्त होगा, चरणों की धूल मुझे प्राप्त होगी। इस उद्देश्य से शुकदेव उद्धव वहां रहने लगे और फिर आपको क्या-क्या कहे, क्या-क्या ना कहे। उद्धव वैसे नहीं कहूंगा, मैं कहता हूं वही बात है कि भगवान जब नहीं रहे,उनके प्रस्थान के पहले ही, वैसे अर्जुन को उन्होंने कहा था क्युकी अर्जुन वही थे ना और चार पांडव तो हस्तिनापुर में थे। अर्जुन वही थे द्वारका में ,उनको कहा था,” तुम मेरी जो रानियां है इनको संभालो, इनको तुम हस्तिनापुर ले जाओ और उनकी थोड़ा देखभाल करो”।

अर्जुन ने वैसे ही किया और फिर धीरे-धीरे सारा इतिहास तो उसे पता भी नहीं है कि स्टेप- बाय-स्टेप कैसे क्या हुआ? होता ये है कि सारी रानियां, भगवान की 16,108,कुछ कम भी हो सकती है, क्युकी और भी प्रस्थान करती है अलग प्रकार से। वे मथुरा में पहुंचती है, मथुरा-मंडल में पहुंचती है, उस वक्त दैट इज़ अनदर थिंग। उस वक्त राजा परीक्षित को हस्तिनापुर का सम्राट बनाए तो मथुरा के राजा थे वज्रनाभ, थे क्या बल्कि उनको नियुक्त किया था, जो कृष्ण के प्रपौत्र थे, ग्रेट ग्रैंड सन ऑफ कृष्ण। कृष्ण के पुत्र कौन? प्रद्युम्न, फिर प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध और अनिरुद्ध के पुत्र थे ये वज्रनाभ। समझ गए ना? ग्रेट ग्रैंड सन। वे भी आए थे रानियों के साथ तो उनको बनाया राजा, मथुरा का राजा बनाया। अब इन सारी रानियां की देखभाल ये वज्रनाभ ही कर रहे थे तो रानियां ऐसे महसूस कर रही थे कि अरे! ये धाम में तो भगवान कहां है? भगवान का तो दर्शन नहीं हो रहा है। पहले खूब सुना था कि इतनी सारी रौनक होती है। वृंदावन धाम की जय! यहाँ पग-पग पर नृत्य होता है, गान होता है और सारी लीलाओं का मंचन होता है। लेकिन कृष्ण नहीं मिल रहे थे, कृष्ण का दर्शन नहीं हुआ। ये सारा श्रीमद भागवत का महात्म्य स्कंद पुराण में जो लिखे हैं श्री व्यास देव, उसके अंतर्गत आता है। तो बात ये है कि ये सुझाव दिया गया था, शांडिल्य ऋषि सुझाव देते हैं कि क्या करो, आप इन सारे रानियों को कुसुम सरोवर ले जाओ, (उनको जाने दो, हम तो सोते रहेंगे, ले जाओ) और वहां जाकर आप कीर्तन करो, गान करो, इससे क्या होगा? उद्धव वहां प्रकट होंगे। ऐसा ही शांडिल्य ऋषि ने कहा था और वैसे राजा परीक्षित भी पहुंचे थे वहाँ। वे हस्तिनापुर से आए थे और वज्रनाभ तो वहां थे ही, तो उन दोनों ने वहाँ ये व्यवस्था की थी। सारी रानियों को ले गए कुसुम सरोवर और जैसे ही वहां कीर्तन शुरू हुआ तो उसी के साथ उद्धव प्रकट हुए। हरि बोल! कथा प्रारंभ करने के पहले, 

“ओम नमो भगवते वासुदेवाय” कथा करने वाले हैं भागवत कथा सुनाएंगे उद्धव। वैसे शुकदेव गोस्वामी द्वारा कही हुई कथा, दैट इज़ मोर ऑफिशियल कथा, जो 30 वर्षों के उपरांत हुई, कलि के 30 वर्ष उपरांत। उद्धव तो कृष्ण के डिपार्चर या प्रस्थान के कुछ ही समय उपरांत कथा किये, एक पूरे मास के लिए/ पूरे महीने के लिए और वहाँ उद्धव बैठक भी है जहां कथा हुई कुसुम सरोवर पर। उद्धव का क्या है? कुंड भी है,उद्धव कुंड भी है, ऐसा घूमकर जब हम आते हैं परिक्रमा में। कथा प्रारंभ करने के पहले,वैसे वे कहते हैं, राजा परीक्षित को कहते हैं, ऐ यू गेट अप, आप उठो। क्यों? क्युकी आप लॉ एंड ऑर्डर को मेंटेन करो ताकि हम शांति से कथा कर पाएंगे। आप राजा हो या सम्राट हो, सिक्योरिटी वगैरह को संभालो, कोई आतंकवादी वगैरह ना आ जाए या कुछ विघ्न उत्पन्न ना करे। तब उन्होंने कहा, मेरा क्या होगा? मैं कब कथा सुनूंगा? तब उद्धव कहे (ये बिल्कुल कलियुग के प्रारंभ की बात है) तुम्हारे लिए विशेष कथा का आयोजन होगा और शुकदेव गोस्वामी तुम्हें कथा सुनाएंगे। ऑफ कोर्स दैट वाज़, 30 वर्षों के उपरांत। अभी भी वे सम्राट बने थे तो करीब 30 वर्षों तक वो कारोबार संभालेंगे फिर कथा होने वाली थी। तो वे बच गए, फिर अब वहाँ ये सब रानियां थी और ये प्रभुजी थे। जैसे ये रानियां कथा सुन रही थी, आप सुन रहे हो? उसी के साथ वे अधिकाधिक क्या होने लगी? देखो 

“नित्यम भागवत सेवया” और फिर क्या होता है? “नित्यम भागवत सेवया” करने से एक तो “नष्ट प्रायेशु अभद्रेशु” जो भी अभद्र है/ अमंगल है हमारे जीवन में/ हमारे मन में तो उसका क्या होगा? नष्टः वो अमंगल नष्ट होगा। “नष्ट प्रायेशु अभद्रेशु” क्या करने से? नित्यम भागवत सेवया, भागवत की नित्य प्रति सेवा करने से। वहीं पर प्रभुपाद फिर कमेंट करते हैं, भागवत दो प्रकार के होते हैं, कम-से-कम दो तो प्रकार के होते ही है, वो कौन से है दो? एक तो राधा माधव की जय! ये भागवत है भगवान है और वहाँ तो राधा माधव इज़ नॉट इन द पिक्चर, वहाँ तो ग्रंथराज श्रीमद् भागवतम ही एक भागवत है और दूसरा भागवत कौन सा है? व्यक्ति भागवत है, पर्सन भागवत है। श्रील प्रभुपाद की जय! नित्यम भागवत सेवया जब कहा तो एक तो भागवत का सेवन करो। भागवत का सेवन मतलब क्या? भागवत का सेवन/ भागवत की सेवा कैसे करोगे? हां? अध्ययन से, वेरी गुड! यदि अध्ययन नहीं करेंगे भागवत का तो हम क्या करेंगे? फिर हम अपराध करेंगे जिसको शास्त्र निंदनम कहा है। शास्त्रों की निंदा कई प्रकार से होती है, श्रुति शास्त्र निंदनम कई प्रकार से होती लेकिन अभी नहीं बताऊंगा कौनसे प्रकार? लेकिन उसमें एक प्रकार ये भी हो सकता है कि शास्त्रों का अध्ययन ही नहीं करेंगे तो इससे बड़ी और कौन सी निंदा हो सकती है? प्रभुपाद भी तो चाहते थे कि “रीड भागवत, रीड भगवत गीता”।

हमारे जमाने में प्रभुपाद जब थे तो शिकायत भी की प्रभुपाद ने, शिकायत लगाई हमारी मतलब हम सब शिष्यों की, आई हैव वन कंप्लेन और वो क्या है? आप लोग मेरे ग्रंथों को, जितना मैं चाहता हूं उतना आप अध्ययन नहीं कर रहे हो। तो ऐसा मैं सोचता हूं कि हमसे वो भूल-चूक हो गई/ हमसे जो कसर रह गई कहो, ऑफ कोर्स वी आर ट्राइंग टू मेक अप, उस समय थोड़ा कम पढ़ते थे तो हम अब पढ़ रहे हैं। लेकिन ऐसी गलती आप नहीं करना। ये हमारे गलती से आप कुछ सीख सकते हो। हम जब थोड़ा कम पढ़ रहे थे तो आप क्या करो? आप क्या थोड़ा ज्यादा ही पढ़ो और साथ-ही-साथ “रीड माय बुक्स, रीड माय बुक्स, रीड माय बुक्स” एक मंत्र हुआ और दूसरा क्या है? “डिस्ट्रीब्यूट माय बुक्स, डिस्ट्रीब्यूट माय बुक्स, डिस्ट्रीब्यूट माय बुक्स” दूसरा मंत्र। दे गो टुगेदर/ दोनों करना है और फिर मैं कहूंगा कि ग्रंथराज श्रीमद्भागवत का यदि हमने अध्ययन किया, यदि मतलब यदि करना ही है, हमने ग्रंथराज श्रीमद् भागवत की सेवा की और फिर भागवत को पढ़ा भी और इस भागवत का वितरण भी किया तो हमने किसकी सेवा की? व्यक्ति भागवत/ पर्सन भागवत। प्रभुपाद ने इतना जो कष्ट करके, जो ग्रंथों का निर्माण रचना /संकलन किया, उसका साफल्य तो इसके अध्ययन में है और इसके वितरण करने मे है। “इफ यू वांट टू प्लीज मी, व्हाट यू शुड डू? क्या करना चाहिए आपको? मेरे ग्रंथों का वितरण करो। किसी पत्रकार ने पूछा, “ स्वामी जी!स्वामी जी! व्हेन यू डाई, हु इस गोइंग टू सक्सीड यू? आप जब मरोगे तो आपका कौन उत्तराधिकारी होगा?” उस समय प्रभुपाद ने जो जवाब दिया था, एक बार तो प्रभुपाद कहे,”मैं कभी नहीं मरूंगा, मैं मरने वालों में से नहीं हूं” और फिर आगे प्रभुपाद कहे,” मैं जीता रहूंगा मेरे ग्रंथों के रूप में”।

ये भी प्रभुपाद कहा करते ही थे कि “इफ यू वांट टू नो मी/ इफ यू वांट टू नो प्रभुपाद, रीड प्रभुपाद्स बुक्स”, “यदि मुझे आप जानना चाहते हो तो क्या करो? मेरे ग्रंथों को पढ़ो।” हरि हरि! प्रभुपाद बहुत प्रसन्न होते थे ग्रंथों के वितरण के रिपोर्ट सुनके, इसका भी अनुभव हमने किया है। हम भी, प्रभुपाद ने हमको भी, प्रभुपाद एंड गोपाल कृष्ण गोस्वामी महाराज (जो बीबीटी के ट्रस्टी रहे) इन दोनों ने मिलके मुझे, मैंने जब सन्यास लिया, तो हमको सेवा दी कि बीबीटी ट्रैवलिंग संकीर्तन पार्टी को आप संभालो। पहले मैं मुंबई में था, मुंबई का एक ब्रह्मचारी था फिर ये संन्यास लिया। बीबीटी ने हमको एक व्हीकल दिया और हम उसके माध्यम से ग्रंथों का वितरण करते थे सर्वत्र। हमारे पार्टी का नाम भी था, “नारद मुनि ट्रेवलिंग संकीर्तन पार्टी”, हरि बोल! जैसे नारद मुनि सर्वत्र भ्रमण करते थे, उसी प्रकार हमने सर्वत्र भ्रमण किया नारद मुनि ट्रैवलिंग संकीर्तन पार्टी में। हमने यथासंभव खूब ग्रंथों का वितरण किया और लास्ट टाइम हम प्रचार करते-करते, नॉर्थ इंडिया मे जब प्रचार कर रहे थे, उस दिन चंडीगढ़ भी हम आए थे, प्रभुपाद के समय भी। फिर हम बद्रिकाश्रम गए, ये बात वैसे एक सप्ताह पहले की है, प्रभुपाद के प्रस्थान या गोलोक गमन के पहले, एक सप्ताह पहले की बात है। प्रभुपाद का स्वास्थ्य ठीक नहीं था और हम भ्रमण कर रहे थे, भ्रमण करते-करते बद्रिकाश्रम पहुंचे पर उस समय समाचार प्राप्त करने का तो कोई साधन नहीं था।

प्रभुपाद के स्वास्थ्य में क्या सुधार-बिगाड़ हो रहा है, उस समय कोई एसएमएस या इंटरनेट ये सब संभव था ही नहीं और फोन भी नहीं चलते थे। तो हमको वृंदावन आना पड़ा, वृंदावन आए बद्रीकाश्रम से, प्रभुपाद को मिलने और उनके स्वास्थ्य के संबंध में पता लगवाने के लिए। फिर हम प्रभुपाद से मिले, हमारी पूरी पार्टी, नारद मुनि संकीर्तन पार्टी प्रभुपाद कक्ष में/ कोठी में प्रवेश किए। शुरुआत में हमने प्रभुपाद के ग्रंथों का जो वितरण हम कर रहे थे उस पर अपने अनुभव या रिपोर्ट्स सुनाना प्रारंभ किए तो प्रभुपाद जी पूछ रहे थे,” विच बुक इज़ सेलिंग द मोस्ट?” प्रभुपाद बहुत समय से लेटे-लेटे रहते थे, मतलब बैठना भी कठिन था। जब वे बोलते थे तो उनकी वॉइस वाज़ सो लो कि मुझे तो प्रभुपाद के मुख के पास कान को पहुंचाकर ही सुनना पड़ रहा था, जस्ट सिक्स इंचेस अवे फ्रॉम प्रभुपाद लोटस माउथ, हम सुन रहे थे। प्रभुपाद बहुत दिलचस्पी ले रहे थे बुक डिस्ट्रीब्यूशन की रिपोर्ट में और हर समय ऐसा देखा है प्रभुपाद को जब मेल पहुंचती थी तो कहते थे संकीर्तन रिपोर्ट जिस पत्र में है उसको पहले खोलो, ऐसा अपने सेक्रेटरी को कहते हैं और उसको सुनाओ पहले। आई वांट टू लिसन द स्कोर ऑफ़ लॉस एंजेलिस टेंपल बुक डिस्ट्रीब्यूशन, या दिस मंदिर दैट मंदिर। उस वक्त हमने ये भी कहा था प्रभुपाद को कि हम जब बद्रीकाश्रम में थे, कहां थे? बद्रिकाश्रम में तो हम व्यास गुफा में गए थे और हे प्रभुपाद! आपकी भगवतगीता हमने श्रील व्यास देव को दिखाई।

प्रभुपाद हरि बोल! तो नहीं कहे लेकिन हम उनके चेहरे की ओर देख रहे थे तो उनके चेहरे पर देअर वाज़ ए स्माइल ऑन हिज़ फेस, वे प्रसन्न हुए। हमने सोचा था कि हम प्रभुपाद के ग्रंथ या गीता लेके गए तो थे व्यास जी की गुफा में बद्रिका आश्रम में और हमने तो व्यास जी को नहीं देखा लेकिन उन्होंने जरूर हमें देखा होगा और साथ में जो भगवत गीता थी वो भी देखी ही होगी। ऐसा समझ के हमने प्रभुपाद को कहा था, आपकी भगवत गीता व्यास देव जी को दिखाई। थोड़ा विनोद, या ह्यूमरस बात थी लेकिन प्रभुपाद बड़े प्रसन्न हुए थे उस बात से, उनके ग्रंथों के वितरण का रिपोर्ट सुनके। उनकी बातें तो बहुत हो गई। प्रभुपाद के ग्रंथों का एक तो हम लोग दिसंबर मास में, वैसे पूरे साल भर सारे ग्रंथों का वितरण करते रहते हैं। गीता का वितरण हम दिसंबर मास में गीता जयंती के समय करते हैं। राइट? गीता जयंती के समय गीता का वितरण और भद्र पूर्णिमा के समय अब आप समझ रहे हो ना, भद्र पूर्णिमा क्या है? और इसका महात्म्य क्या है और इस वक्त ग्रंथ वितरण करने का क्या लाभ है? परम गति/ सुप्रीम डेस्टिनेशन क्या है? आप में से कौन सुप्रीम डेस्टिनेशन/ भगवत धाम या भगवान को /भगवत धाम को प्राप्त करना चाहते हो ? उसके लिए कुछ करना होगा ना,खाली-फोकट वहां नहीं पहुंचने वाले हो, यू हैव टू पे सम प्राइस। आप कुछ कहना चाहते हो? एक नहीं दो बातें कहो।