Hindi

जप चर्चा पंढरपुर धाम से 11 जनवरी 2021 आज मैं जप भी कर रहा था। साथ ही साथ भगवान के अलग-अलग विभूतियों का स्मरण भी कर रहा था क्योंकि मैंने आपसे कहा था कि मैं आज यह कहूंगा भगवान की विभूतियां या फिर यह भगवान का जो ईश्वर है। उसका भी वर्णन होगा जो वर्णन स्वयं भगवान ने किया है। भगवान के ऐश्वर्या का वर्णन वह जो ऐश्वर्या पूर्ण है वह भगवान है उन्होंने ही किया है। भगवत गीता में श्री भगवान उवाच दसवें अध्याय में भगवान ने इसका वर्णन किया है। तभी अर्जुन भगवान को सुन नहीं रहे थे जब भगवान ने उन विशेष 4 श्लोकों का उल्लेख किया तब अर्जुन ने अपना साक्षात्कार भगवान को सुनाया। समझे कुछ समझे की नहीं ऐसे भगवान ने कहा तो नहीं होगा लेकिन फिर भी अर्जुन ने अपनी ओर से मुझसे रहा नहीं गया अब ना साक्षात्कार बताया गुह्यम आख्याती पृच्छति दिल की बात अपने दिल की बात अर्जुन ने भगवान को बताई, उसी के साथ उन्होंने कहा...... अर्जुन उवाच परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् | पुरुषं शाश्र्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् || १२ || अर्जुन ने कहा- आप परम भगवान्, परमधाम, परमपवित्र, परमसत्य हैं | आप नित्य, दिव्य, आदि पुरुष, अजन्मा तथा महानतम हैं | नारद, असित, देवल तथा व्यास जैसे ऋषि आपके इस सत्य की पुष्टि करते हैं और अब आप स्वयं भी मुझसे प्रकट कह रहे हैं और फिर आगे अर्जुन ने कहा.... सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव | न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः || १४ || हे कृष्ण! आपने मुझसे जो कुछ कहा है, उसे मैं पूर्णतया सत्य मानता हूँ | हे प्रभु! न तो देवतागण, न असुरगण ही आपके स्वरूप को समझ सकते हैं आप जो जो कह रहे हो मुझे स्वीकार हैं, क्योंकि आप जो भी कह रहे हो वह सत्य ही है तो सत्य को मैं स्वीकार करता हूं और जैसे जैसे मैं आपके सत्य वचन को स्वीकार कर लूंगा यहां जैसे जैसे आप के वचन को मैं स्वीकार ता गया तभी तो मेरे मुख से यह वचन निकले कैसे वचन निकले..... अर्जुन उवाच परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् | अर्जुन ने यह श्लोक कहां और आगे वह और भी सुनना चाहते थे भगवदसाक्षात्कार तो उन्हें हुआ ही उन्होंने यह सब भावना या भूमिका बनाई। अर्जुन और ज्यादा जिज्ञासु बने हैं, वेदान्त सूत्र १.१.१ अथातो ब्रह्म - जिज्ञासा अतः अभी ब्रह्म ( पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ) के विषय में प्रश्न पूछने चाहिये । हमें कैसे होना चाहिए जिज्ञासु होना चाहिए जिज्ञासु तो होती ही है फिर हम पूछते हैं क्या बाजार भाव हैं साथ ही हम में जिज्ञासा तो है ही पर कैसी जिज्ञासा हमें करनी चाहिए ब्रह्म जिज्ञासु होना चाहिए हमें अर्जुन ने कहा ही परब्रह्म आप परब्रह्म हो पवित्रं परमं भवान् इसी प्रकार वह पर ब्रह्म के संबंध में और अधिक जानना चाहते हैं अर्जुन जिज्ञासु है। चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन | आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ || १६ || हे भरतश्रेष्ठ! चार प्रकार के पुण्यात्मा मेरी सेवा करते हैं – आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी तथा ज्ञानी | भगवान ने भगवत गीता में कहा ही है चार प्रकार के लोग मेरी शरण में आते हैं। उसमें से एक प्रकार है जिज्ञासु ब्रह्म जिज्ञासु मेरी और आते हैं वह जिज्ञासु बन कर जिज्ञासा करते हैं और जिज्ञासा का जो उत्तर प्राप्त होता है तो उसके बाद वह मेरी ओर आते है और अगर अधिक जिज्ञासा करते हैं तब और निकट पहुंचते हैं। ऐसे लोग सुकृतिन है.. चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन | ऐसा भगवान ने कहा ही है चार प्रकार के लोग मेरी और आते हैं। और चार प्रकार के लोग मेरी और नहीं आते हैं ऐसा भी भगवान ने कहा है, आगे उन्होंने कहा.... वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः | याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि || १६ || कृपा करके विस्तारपूर्वक मुझे अपने उन दैवी ऐश्र्वर्यों को बतायें, जिनके द्वारा आप इन समस्त लोकों में व्याप्त हैं अर्जुन ने कहा कि आपके विभूतियों का वर्णन सुनाइए..... याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि आपके इन विभूतियों से यह सारा जगत व्याप्त है। आपकी सर्व व्यापकता को सुनाइए एक तो आप मेरे समक्ष हो ही साथ ही आगे अर्जुन ने कहा.. पुरुषं शाश्र्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् | तो क्या आप और भी कुछ रूपों में इस संसार में हो और भी कोई रूप है आपका और भी कोई वैभव ऐश्वर्य है उसे आप मुझे सुनाइए वैसे श्रील प्रभुपाद जीने तात्पर्य में लिखा है कृष्ण भक्त तो वैसे कृष्ण में ही तल्लीन होते हैं कृष्ण के रूप में उनके सुंदर सर्वांग रूप में यह जिज्ञासा करने के पीछे का एक उद्देश्य और भी सफल होगा और वह क्या है ? जो लोग भगवान सर्वव्यापकता को भी जानना चाहते हैं, उससे प्रभावित होंगे और भगवान सर्वत्र है सर्वत्र है इस बात का प्रचार भी है तो आप सर्वत्र किस प्रकार से हो किन रूप में हो या किन व्यक्तित्व में वस्तुओं में आपका ऐश्वर्या छुपा हुआ है या प्रकट हुआ है उनका भी उल्लेख कीजिए। केशु केशु केशुच भागेशु चींतेशि भगवन मया ताकि मैं उन रूपों का दर्शन या स्मरण कर सकता हूं। यतो यतो यामी ततो नरसिम्हा मैं जहां जहां भी जाऊंगा वहां वहां आपका ही दर्शन हो। वह स्वयं रूप का दर्शन नहीं होगा किंतु आपके और आपका जो वैभव है आपका सौंदर्य है अलग-अलग शक्तियों का प्रदर्शन तो सर्वत्र हैं यह सारा संसार व्याप्त है ऐसे सारे आपकी व्यापकता को सुनाइए हे प्रभु ऐसा कहने पर ऐसे जिज्ञासा करने पर उसके बाद भगवान ने कहा.... श्री भगवानुवाच हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः | प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे || १९ || श्रीभगवान् ने कहा – हाँ, अब मैं तुमसे अपने मुख्य-मुख्य वैभवयुक्त रूपों का वर्णन करूँगा, क्योंकि हे अर्जुन! मेरा ऐश्र्वर्य असीम है | हन्त ते कथयिष्यामि इन सारे श्लोकों में भगवान के ऐश्वर्या का वर्णन होगा। तो 19 से लेकर 42 श्लोकों तक भगवान अपने ऐश्वर्या का अपने पैसों का जिनको भी विभूतियां भी कहते हैं यह भी विभूति योग भी होता है, भगवान ने कहा हन्त हां हां मैं कहूंगा। मेरी विभूतियों का वर्णन मैं करुंगा मेरी इतनी सारी विभूतियां है असंख्य विभूतियां है या वैसे संसार में जो भी है वह मेरी विभूतियां है कोई छोटी है कोई मोटी है। वह मेरी शक्ति का ही प्रदर्शन है संसार को ब्रह्मांड को अनंत कोटि ब्रह्मांड को मुझ से अलग नहीं किया जा सकता। मैं ही हूं शक्ति के रूप में शक्ति और शक्तिमान में कोई भेद नहीं है इसके अनुसार यह संसार भी भगवान ही है यह सृष्टि भगवान ही है या कम से कम हम मानना चाहिए यह सृष्टि भगवान की है। ईशोपनिषद् मंत्र ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद् धनम् ॥१ इस ब्रह्माण्ड के भीतर की प्रत्येक जड़ अथवा चेतन वस्तु भगवान् द्वारा नियंत्रित है और उन्हीं की सम्पत्ति है । अतएव मनुष्य को चाहिए कि अपने लिए केवल उन्हीं वस्तुओं को स्वीकार करे जो उसके लिए आवश्यक हैं और जो उसके भाग के रूप में नियत कर दी गई हैं । मनुष्य को यह भलीभाँति जानते हुए कि अन्य वस्तुएँ किसकी हैं , उन्हें स्वीकार नहीं करना चाहिए इशोउपनिषद में कहां है ईशावास्यमिदं सर्व यह सारा संसार भगवान का हैं। मुख्य मुख्य विभूतियों का में उल्लेख करता हूं वैसे मेरी भी विभूतियों का अंत नहीं है। तो कुछ प्रधान विभूतियों का मैं उल्लेख करता हूं। सुनो अर्जुन को तो सुनो कहने की आवश्यकता नहीं थी भगवान सुनो यह हमारे लिए कह रहे हैं। क्योंकि हमारा मन और कुछ सुन रहा है हमारा मन और कहीं भटक रहा है। फिर कहा जाता है सुनो सुनाते सुनाते सुखदेव गोस्वामी भी राजा परीक्षित को कहते हैं या फिर कोई विशेष बात सुनानी हो तो उसके और आकर्षित करने के लिए ऐसा कहते हैं ध्यान से सुनो ऐसा नहीं है कि अर्जुन नहीं सुन रहे थे लेकिन भगवान ने कहा इसे थोड़ा और ध्यानपूर्वक सुनो यह छूटना नहीं चाहिए आगे सुनो.... अहमात्मा गुडाकेश *सर्वभूताशयस्थितः | अहमादिश्र्च मध्यं च भूतानामन्त एव च | अनुवाद:- हे अर्जुन! मैं समस्त जीवों के हृदयों में स्थित परमात्मा हूँ | मैं ही समस्त जीवों का आदि, मध्य तथा अन्त हूँ भगवान ने शुरुआत की अहमात्मा गुडाकेश गुडाकेश कौन है? अर्जुन है, वैसे अर्जुन को कई अलग-अलग नामों से संबोधित किया है। कृष्ण जी अर्जुन को कई अलग-अलग नामों से संबोधित करते हैं और अर्जुन की कृष्ण को कई अलग-अलग नामों से संबोधित करते हैं भगवत गीता में जो इसकी भी एक सूची है भगवत गीता में अर्जुन के यह नाम है और भगवत गीता में कृष्ण के यह सारे नाम है ऐसे सूची भगवत गीता में है। एक विषय है जो भक्त जिज्ञासु होते हैं वह इसका भी पता लगाते हैं और उसकी लिस्ट भी है उसका प्रेजेंटेशन भी उन्होंने दिया है लेकिन वह भी नहीं होगा पर आप सभी को याद रखना है ऐसा भी है। गुडाकेश इस शब्द का अर्थ है निद्रा रूपी अंधकार को जीतने वाला। प्रभुपाद जी ने तात्पर्य में लिखते हैं श्री कृष्ण अर्जुन को गुड़ाकेश क्यों कहते हैं इसमें थोड़ा विषय या अंतर भी है ऐसा भी कह सकते हैं निद्रा रूपी अंधकार को जीतने वाले अर्जुन की जय..... हे अर्जुन भगवान ने कहा अहमात्मा अहम आत्मा अस्मि पहला वैभव भगवान ने कहा पहले विभूति का उल्लेख हुआ और वह क्या है मैं आत्मा हूं जब इस बात को मायावादी और अद्वैतवादी पड़ते हैं,तब वो बड़े खुश होते होंगे या होते हैं। क्योंकि भगवान वह कहते हैं कि मैं आत्मा हूं तो वह कहते हैं अहम् ब्रह्मास्मि तो हम क्या हुए हम भगवान हुए यह बात यहां सिद्ध होती है। क्योंकि भगवत गीता में भगवान ही कह रहे हैं कि मैं आत्मा हू लेकिन बदमाशों, मायावादियों वैष्णव आचार्य ने इस आत्मा को परमात्मा के रूप में समझा है। भगवान ने जब कहा कि मैं आत्मा हूं तो भगवान ने कहा है कि मैं परमात्मा हूं जो परमात्मा है वह भगवान का ही स्वरूप है.... श्रीमद्भागवतम् १.२.११ वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम् । ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥११ ॥ अनुवाद:- परम सत्य को जानने वाले विद्वान अध्यात्मवादी ( तत्त्वविद ) इस अद्वय तत्त्व को ब्रह्म , परमात्मा या भगवान् के नाम से पुकारते हैं । ( श्री सूत गोस्वामी नैमिषारण्य के ऋषियों को उपदेश देते हैं सबके हृदय प्रांगण में मैं विराजमान हूं किस रूप में परमात्मा के रूप में वह आत्मा भी है और परमात्मा भी है। जैसे हम देख सकते हैं कि बाजार भी होता है और सुपर बाजार में होता है। अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एवच | भगवान ने भगवत गीता में कहां है मैं समस्त जीवो का आदी,मध्य तथा अंत हु। आदित्यानाम अहम विष्णुर आदित्यों में द्वादश आदित्य है एक आदश रुद्र हैं, अष्ट वसु हैं,39 मरुत हैं, अदिति के पुत्र आदित्य कहलाते हैं दीति के पुत्र दैत्य कहलाते हैं। द्वादश आदित्य में विष्णु भी एक आदित्य हैं। अदिति के पुत्र बने भगवान आदित्य में विष्णु में हूं ज्योतिश्याम रवि रणशमांन सभी जो प्रकाशमान या जो भी तारे कहो प्रकाश से जिन से विस्तृत होता है उनमें मैं सूरज हूं। मैं तेजस्वी सूर्य हूं प्रधान तारा तो सूर्य है इतना विशाल ब्रह्मांड और उसमें एक और एक ही पर्याप्त है सूर्य से हमारे कक्षा में कमरे में एक बल्ब सारे कमरे को प्रकाशमान करता है तो उसी प्रकार सारे ब्रह्मांड में एक लाइट है एक बल्ब है वह सूर्य है। यह कितना आश्चर्य कारक है यदि हम इसे गहराई से सोचें तो वह सुर्य मैं हूं। राजा वोमे सारे राजा भगवान है, ग्रहों का तारों का राजा है सूर्य इसलिए कभी-कभी कहते हैं सूर्यनारायण सूर्य भगवान क्योंकि भगवान का यह ऐश्वर्या है। नक्षत्रणाम अहम शशि तो यहां पर चंद्र का भी उल्लेख हुआ है तो नक्षत्रों में में चंद्र ग्रह हु। वेदांनाम वेदोस्मि ऐसे एक-एक विभूति का स्मरण और मनन हम बहुत समय के लिए कर सकते हैं शायद मैं कुछ समय के लिए पर जो ज्यादा विद्वान भक्त है वह बहुत सारा वर्णन कह सकते हैं एक-एक विभूति का लेकिन हम समय से बंधे हुए हैं। वेदों में मैं सामवेद हूं सभी देवों में इंद्र देवों के राजा है वह मैं हूं। इंद्रियों में मन षष्ठानि इंद्रियानी सभी इंद्रियों में प्रधान मन है तो वह मन मैं हूं। मन इतना चंचल है इसकी बराबरी कोई कर सकता है मन की बाहोत चंचलता है। इसकी तुलना शायद ही किसी चंचल वस्तु से की जा सकती है जहां तक चांचल्या की बात है तो उसमें मन ही है तो भगवान यह कह रहे हैं कि वह मन मैं ही तो हूं। और यह वैभव बन जाता है चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् | तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् || ३४ || हे कृष्ण! चूँकि मन चंचल (अस्थिर), उच्छृंखल, हठीला तथा अत्यन्त बलवान है, अतः मुझे इसे वश में करना वायु को वश में करने से भी अधिक कठिन लगता है अर्जुन ने यह कहा है छठे अध्याय में अपनी असमर्थता व्यक्त कर रहे हैं आप कह रहे हैं कि इस मन को निग्रह करो यह संभव नहीं है। भूताणाम अचेतसा जो जीव है जीवो में जो चेतना है वह चेतना मैं हूं या मेरे कारण है मैं इसका स्रोत हु। रुद्राणाम शंकरोशशमी रूद्रों में 11 रुद्र है उनमें जो शंकर है वह शंकर मैं हूं तो शंकर कोई अलग से स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं है वह है भी लेकिन वह भगवान ही बने हैं शंकर भगवान का ही एक स्वरूप है शंकर उनका एक ऐश्वर्य है। शंकर शी मतलब शांति और शंकर मतलब शम दम मन निग्रह इन्द्रिय निग्रह ऐसे भगवान ने कहा है। तो वो शंकर मैं हु, और साथ ही कुबेर जैसे और कोई संपति वान कोई नही हैं वो कुबेर मै हु ऐसे भगवान कहते हैं। जब हम ऐसे सूची पढ़ते हैं तो हमें समझ में आता है यह उल्लेख केवल जो भी है हो यही है यही प्रकृति पृथ्वी यह नहीं हो नहीं और स्वर्ग नहीं नर्क नहीं वह नहीं है यह जो विचार है उस का हनन भी होता है जब हम इन विभूतियों का स्मरण करते हैं। भगवान पूरे ब्रह्मांड की बात कर रहे हैं पूरे ब्रह्मांड की बात कर रहे हैं और बहुत समय पहले इतिहास की बात कर रहे हैं। मेरु शिखरिनाम अहम और पर्वतों में मेरु पर्वत में हूं मेरो नाम का पर्वत है आप अगर सुनोगे मेरु की स्थिति लम्बाई चौड़ाई और सुंदर भी है अद्भुत है मेरू पर्वत हमें भगवान का स्मरण दिलाता है। मेरु भगवान का ऐश्वर्या है पर्वतों में श्रेष्ठ पर्वत है मेरु जैसे भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि मुझसे और कोई श्रेष्ठ नहीं है तो वैसे ही पर्वतों में श्रेष्ठ है मेरु पर्वत और उसके समकक्ष और कोई नहीं है। और पुरोहितो में पुरोहित मतलब जो सामने वाले का हित चाहने वाला वो पुरोहित कहलाता हैं।यह पुरोहित की व्याख्या हुई वो हितचिंतक होते हैं। पुर मतलब सामने वाले जिसके वो पुरोहित बनते हैं। पुरोहितों में वाचस्पति मैं हूं, ब्रहस्पति मैं हूं बृहस्पति एक तो देवता है और उनके ही पुरोहित है और वह है बृहस्पति बृहस्पति वार भी है जो 7 दिन है उसमें एक बार होता है बृहस्पति उसे कहते हैं गुरुवार को यह गुरु कौन है बृहस्पति देवताओं के गुरु है। और जो कार्य किए है गणेश जी के भ्राता ये शिव परिवार में आते हैं। ये स्कंद हैं और आगे कहते है की सागर भी मैं ही हु वैसे हमारे कल्पना से परे है यह सागर और सागर का विस्तार गहराई इसके शक्ति भी हमारे कल्पना से परे हैं तो यह सागर मैं हूं। ऋषि यों में भ्रुगू ऋषि मैं हूं जहीर रुकू मुनि गए थे ब्रह्मा विष्णु महेश में से कौन श्रेष्ठ है यह जानने परीक्षा लेने गए थे भृगु मुनि वैकुंठ में भी गए थे वहां तो उन्होंने भगवान के वक्षस्थल पर लात मारी थी जिस मुनि ने भगवान के वक्षस्थल पर लात मारी वही महर्षि मैं हूं ऐसे भगवान कह रहे हैं और भगवान ने उस भृगु मुनि के चरण का जो चिन्न बना है। तो उन्होंने भगवान के वक्षस्थल पर लाथ मारी। हरि हरि। इस मुनि ने भगवान के वक्षस्थल पर लाथ मारी, वही मुनि या महर्षि को भगवान कह रहे कि, भृगुरहं मैं भृगु हूँ! और भगवान ने लाथ मारते समय भृगु मुनि के चरण का जो चिन्ह बना, उसको धारण करके बनाए रखे है। विट्ठल भगवान पंढरपुर में उनके वक्षस्थल पर भृगु मुनी के चिन्ह है, या कौस्तूभ मनी भी है और भृगु मुनि का चरणचिह्न भी है। यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि यह हमारे काम की बात है, जप यज्ञ! हम हर रोज हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।। करते है तो क्या करते है? यज्ञ करते है! जपयज्ञ या संकीर्तन यज्ञ करते है। उसमें कोई सामग्री या यज्ञशाला नहीं बनाते और कुछ सामग्री इकट्ठे नहीं करते, इसमें अग्निहोत्र या पुरोहित की आवश्यकता नहीं होती, हम स्वयं पुरोहित बनते है और अपने जपमाला यानी तुलसीमाला पर हरे कृष्ण हरे कृष्ण कहना प्रारंभ करते है तो, यज्ञ प्रारंभ हो गया! तो जितने सारे यज्ञ है अश्वमेघयज्ञ या, गोमेदयज्ञ या, राजसूययज्ञ है ऐसे कई प्रकार कई नाम है। तो उन सभी यज्ञों में श्रेष्ठ यज्ञ जप यज्ञ है। और वह यज्ञ मैं हूं ऐसा भगवान कह रहे है। जपयज्ञ की जय! अभी तो बहुत बड़ा सफर बाकी है, अभी आधा भी पूरा नहीं किए। हरि हरि। अभी आज सवाल जवाब नहीं होगा और थोड़ी देर के लिए मैं इसी पर चर्चा करूंगा। अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां सभी वृक्षों में आश्वस्थ वृक्षा में हूं और देवर्षीणां च नारदः देवऋषियों में भी प्रकार है। कोई देवर्षि है, कोई ब्रह्मर्षि है, कोई राजर्षि है, तो देवर्षि! देवों में या देवों के मध्य में जो ऋषि होते है या देवों के जो ऋषि होते है तो उनमें में नारद हूं! सिद्धानां कपिलो मुनिः और सिद्धोमे कपिल मुनि हूं। उच्चैःश्रवसमश्वानां और जब समुद्र मंथन से जब 14 रत्न निकले वह सभी रत्न अलग अलग वैभव है। उसमें से उच्चैःश्रवा नाम का घोड़ा, वह उच्चैःश्रवा घोड़ा में हूं! ऐसा भगवान कह रहे है। हरि हरि। एरावतं गजेन्द्राणां और फिर एरावतं भी निकला, जो इंद्र को प्राप्त हुआ। वह गजेंद्र! गजों में या हाथियों में श्रेष्ठ हाथी इंद्र को मिला। तो वह गजेंद्र यानी एरावत हाथी मैं हूं! आयुधानामहं वज्रं तो शस्त्र या आयुध कई प्रकार के है, लेकिन वज्र सर्वोत्तम है! वज्र से श्रेष्ठ आयुध या अस्त्र कहीं नहीं मिलेगा, तो वह वज्र में हूं! ऐसा भगवान कह रहे है। धेनूनामस्मि कामधुक् और फिर गायों में सुरभि गाय में हूं! सुरभिगाय मेरा वैभव है। सर्पाणामस्मि वासुकिः तो सर्प सर्वत्र है। एक नागलोक है। उसमें भी कई प्रकार है। लेकिन उसमें जो वासुकी है, जब यह समुद्र मंथन हो रहा था तब डोरी चाहिए थी समुद्र मंथन के लिए, तो वासुकी की रस्सी बनाई समुद्र मंथन के लिए, फिर मंदराचल पर्वत को वासुकी से लपेट लिया और 33 कोटि देवता उसे पकड़े है! कितनी लंबाई और कितना विशेष रस्सी बने यह वासुकी! तो भगवान कहते हैं कि वासु कि मैं हूं! और फिर प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां दैत्यों में श्रेष्ठ दैत्य! ऐसा दैत्य आपको कहीं नहीं मिलेगा जो बस नाम के लिए दैत्य है! वह सूर है, असूर नहीं है! प्रल्हाद महाराज! असुरों में प्रल्हाद महाराज में हूं! कालः कलयतामहम् काल दमन करता है, नियंत्रण रखता है तो वह काल में हूं! ऐसा भगवान कहते है। मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं और सारे पशुओं में वनराज केसरी, सिंह मैं हूं! वैनतेयश्च पक्षिणाम् और सारे पक्षियों में गरुड़ में हूं! जब हम यह सुनते है तो थोड़ा विचार करते है, ध्यान करते है, तो कोई भाव भी उत्पन्न होगा और हम भी स्वीकार करेंगे! कि हां, हां यह भगवान का वैभव है! सूर्य तो मैं हूं ऐसा भगवान कहे ही है, और नदियों में गंगा नदी में हूं। तो जब हम बद्रिकाश्रम जाते है, हम 1 साल पदयात्रा करते हुए जा रहे थे तब हमने वहां अनुभव किया। जा तो रहे थे बद्रिकाश्रम के दर्शन के लिए लेकिन हम हिमालय की चट्टानों से घिरे हुए थे। बहुत विशाल पर्वत हिमालय! स्थावर और सबसे बड़ी कोई वस्तु है इस भूमि पर तो वह हिमालय है। और हिमालय की गोद से हम बद्रिकाश्रम जा रहे थे, और इधर उधर देखते तो हिमालय हिमालय था और ऊपर देखते तो सूर्य है, जो वैभव है और फिर नीचे देखते तो गंगा बह रही है वह भी भगवान का वैभव है, तो जब हम पदयात्रा करते हुए जा रहे थे हरिद्वार से बद्रीकाश्रम तो वह सन्निधि या सानिध्य हिमालय का सानिध्य, सूर्य का सानिध्य या प्रकाश और गंगा की पवित्रता और शीतलता हमें कृष्णभावनामृत या बद्रीनारायणभावनामृत बना रहे थी। यह सारे वैभव थे। हरि हरि। एक समय प्रभुपाद से किसी ने पूछा कि, क्या हम देख सूर्यास्त देख सकते है प्रभुपाद? यह माया तो नहीं है? तो श्रील प्रभुपाद कहे थे कि, सूर्य को जब हम भगवान का वैभव समझ कर देखते है, या फिर ऐसा या इस विचार के साथ देखोगे तो यह माया नहीं है! वह भी कृष्णभावनामृत कार्य है। यहां पर तो इस दसवें अध्याय में तो नहीं है लेकिन आगे अध्याय में भगवान कहे हैं कि, जब हम जल पीते है, तो जल में जो रस है वह रस में हूं! ऐसा भगवान कहे है। तो श्रील प्रभुपाद हमने ऐसा कई बार सुनाते थे। जब मुंबई में भागवत कथा में श्रील प्रभुपाद समझाते थे या उन्हें समझाना था कि, जल का रस में हूं! ऐसा भगवान कहते है। तो उसका स्पष्टीकरण देते हुए श्रील प्रभुपाद पास में रखा हुआ प्याला उठाकर उसे पीते और कहते कि जब हम जलपान करते है तब हम सोचेंगे कि, यह जो रस है यह भगवान है तो यह जलपान ही तुम्हें कृष्णभावनाभावित बनाएगा! जल तो पीते हो ना? तो ऐसा स्मरण करो! तो कृष्णाभावना बहुत व्यावहारिक है। हरी हरी। तो ऐसे भगवान के कई सारे वैभव है। उसका कोई अंत नहीं है और यह सारे सारा कुछ कहने के उपरांत भगवान कहे कि, यह सारे वैभव मेरा छोटा सा अंश है! हरि हरि। फिर अगले अध्याय में ग्यारहवें अध्याय में भगवान विराट रूप का वर्णन ही नहीं दर्शन भी देते है और इन सारे वैभव का जो उल्लेख हुआ है उसे दर्शाते है। यहां पर भगवान कहे है कि, मैं यह हूं मैं वह हूं! तो विराट रूप में भगवान ने दिखाया। और उसी क्रम से अभी दसवां अध्याय आप सुन ही चुके हो और फिर ग्यारहवें अध्याय का विराट रूप का दर्शन ले सकते हो! निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!

English

11 January 2021 The Universal Form - the ultimate proof of Lord's opulences Hare Kṛṣṇa! Devotees from 800 locations are chanting with us. You all are welcome here for the daily morning session. I was remembering the different opulences and powers of the Lord which I said I would describe today. Kṛṣṇa has been speaking for the past 9 chapters and 11 verses in the 10th chapter, now Arjuna will be sharing his realizations. arjuna uvāca paraṁ brahma paraṁ dhāma pavitraṁ paramaṁ bhavān puruṣaṁ śāśvataṁ divyam ādi-devam ajaṁ vibhum Translation Arjuna said: You are the Supreme Personality of Godhead, the ultimate abode, the purest, the Absolute Truth. You are the eternal, transcendental, original person, the unborn, the greatest. (BG 10.12) sarvam etad ṛtaṁ manye yan māṁ vadasi keśava na hi te bhagavan vyaktiṁ vidur devā na dānavāḥ Translation O Kṛṣṇa, I totally accept as truth all that You have told me. Neither the demigods nor the demons, O Lord, can understand Your personality. (BG 10.14) Arjuna wants to hear more opulences of the Lord. He has had God-realization. Arjuna became inquisitive to know the Absolute Truth, brahma-jijnasa. As living entities we are always curious about everything, but actual curiosity should be directed towards the Supreme Absolute Truth, athatho brahma jijnasa is what the Vedanta-sutra instructs. As the Lord has said in Bhagavad Gita, there are four kinds of persons who approach the Lord. catur-vidha bhajante mam janah sukrtino 'rjuna arto jijnasur artharthi jnani ca bharatarsabha Translation O best among the Bharatas [Arjuna], four kinds of pious men render devotional service unto Me—the distressed, the desirer of wealth, the inquisitive, and he who is searching for knowledge of the Absolute. (BG 7.16) Further Arjuna said to Lord Kṛṣṇa, vaktum arhasy aśeṣeṇa divyā hy ātma-vibhūtayaḥ yābhir vibhūtibhir lokān imāṁs tvaṁ vyāpya tiṣṭhasi Translation Please tell me in detail of Your divine opulences by which You pervade all these worlds. (BG 10.16) Arjuna is asking Kṛṣṇa to speak about Himself and His glorious activities, more about His opulences. Srila Prabhupada writes in the purport that devotees are fully satisfied with the original form of Sri Kṛṣṇa, yet Arjuna is curious to know the omniscient and omnipotent opulences of the Lord. kathaṁ vidyām ahaṁ yogiṁs tvāṁ sadā paricintayan keṣu keṣu ca bhāveṣu cintyo ’si bhagavan mayā Translation O Kṛṣṇa, O supreme mystic, how shall I constantly think of You, and how shall I know You? In what various forms are You to be remembered, O Supreme Personality of Godhead? (BG 10.17) In chapter 10 from 10.19 to 10.42, Krsna is describing His opulences. śrī-bhagavān uvāca hanta te kathayiṣyāmi divyā hy ātma-vibhūtayaḥ prādhānyataḥ kuru-śreṣṭha nāsty anto vistarasya me Translation The Supreme Personality of Godhead said: Yes, I will tell you of My splendorous manifestations, but only of those which are prominent, O Arjuna, for My opulence is limitless. (BG 10.19) I will describe you my prominent opulences as I pervade everywhere, either material or spiritual. It's a display of My different energies. The universe is My part. It cannot be differentiated from Myself; sakti saktimatayo abhedha there is no difference between the energies and the energetic. The whole unlimited universal manifestations are all Sri Kṛṣṇa's energies. As stated in Isopanisad, īśāvāsyam idaḿ sarvaṁ yat kiñca jagatyāṁ jagat tena tyaktena bhuñjīthā mā gṛdhaḥ kasya svid dhanam Translation Everything animate or inanimate that is within the universe is controlled and owned by the Lord. One should therefore accept only those things necessary for himself, which are set aside as his quota, and one should not accept other things, knowing well to whom they belong. (Īśopanisad 1) Kṛṣṇa says, “Listen,” Arjuna was listening attentively, but this instruction was meant for us as our mind is always flickering. Sukadeva Goswami also says to King Pariksit in Srimad Bhagavatam, to listen means to pay attention! In Bhagavad Gita, we note that Kṛṣṇa and Arjuna call each other by different names. Here in this verse Arjuna is addressed as Guḍākeśa, which means “one who has conquered the darkness of sleep." aham ātmā guḍākeśa sarva-bhūtāśaya-sthitaḥ aham ādiś ca madhyaṁ ca bhūtānām anta eva ca Translation I am the Supersoul, O Arjuna, seated in the hearts of all living entities. I am the beginning, the middle and the end of all beings. (BG 10.20) The first opulence stated by the Lord is that He is the soul. Taking this as a reference the Mayavadis preach that Sri Kṛṣṇa is also a soul and we as living entities are also a soul so we are God. But our Vaisnava acaryas defeat this Mayavadi propaganda explaining that the Lord is Paramatma-Supersoul. vadanti tat tattva-vidas tattvaṁ yaj jñānam advayam brahmeti paramātmeti bhagavān iti śabdyate Translation Learned transcendentalists who know the Absolute Truth call this nondual substance Brahman, Paramātmā or Bhagavān. (SB 1.2.11) sarvasya cāhaṁ hṛdi sanniviṣṭo mattaḥ smṛtir jñānam apohanaṁ ca vedaiś ca sarvair aham eva vedyo vedānta-kṛd veda-vid eva cāham Translation I am seated in everyone’s heart, and from Me come remembrance, knowledge and forgetfulness. By all the Vedas, I am to be known. Indeed, I am the compiler of Vedānta, and I am the knower of the Vedas. (BG 15.15) Krsna is seated in everyone's heart as a Supersoul. The next opulence described is, ādityānām ahaṁ viṣṇur jyotiṣāṁ ravir aṁśumān marīcir marutām asmi nakṣatrāṇām ahaṁ śaśī Translation Of the Ādityas I am Viṣṇu, of lights I am the radiant sun, of the Maruts I am Marīci, and among the stars I am the moon. (BG 10.21) Among all the bright luminous bodies I am the Sun. Just a small bulb lights our house. Similarly this big bulb (sun) lights the entire creation. Many times we address the sun as surya narayan or surya bhagwan. Among the stars, I am the Moon. vedānāṁ sāma-vedo ’smi devānām asmi vāsavaḥ indriyāṇāṁ manaś cāsmi bhūtānām asmi cetanā Translation Of the Vedas I am the Sāma Veda; of the demigods I am Indra, the king of heaven; of the senses I am the mind; and in living beings I am the living force [consciousness]. (BG 10.22) The mind has a flickering nature, it seems to be very strong and difficult to control. Arjuna says in the 6th chapter, cañcalaṁ hi manaḥ kṛṣṇa pramāthi balavad dṛḍham tasyāhaṁ nigrahaṁ manye vāyor iva su-duṣkaram Translation The mind is restless, turbulent, obstinate and very strong, O Kṛṣṇa, and to subdue it, I think, is more difficult than controlling the wind. (BG 6.34) Krsna says, “I am the consciousness in the living entities.” nityo nityānāṁ cetanaś cetanānām eko yo bahūnāṁ vidadhāti kāmān Translation Amongst all the living entities, both conditioned and liberated, there is one supreme living personality, the Supreme Personality of Godhead, who maintains them and gives them all the facility of enjoyment according to different work. That Supreme Personality of Godhead is situated in everyone’s heart as Paramātmā. [Kaṭha Upaniṣad 2.2.13] rudrāṇāṁ śaṅkaraś cāsmi vitteśo yakṣa-rakṣasām vasūnāṁ pāvakaś cāsmi meruḥ śikhariṇām aham Translation Of all the Rudras I am Lord Śiva, of the Yakṣas and Rākṣasas I am the Lord of wealth [Kuvera], of the Vasus I am fire [Agni], and of mountains I am Meru. (BG 10.23) There are 11 Rudras, among them I am Siva, Siva is one of the powers of Kṛṣṇa. It means auspicious. It's not a different being. He is an expansion of Kṛṣṇa. He is the most renounced, He does not have any special opulences. He has ghost followers. Here Kṛṣṇa is speaking about the entire creation. He is not only speaking about the earth and not only of the present, but also about the past and future. Kṛṣṇa says, among the Yaksas I am Kuvera, the Lord of wealth. Among mountains, I am the Meru Mountain. No other mountain can be equal to Mount Meru. In Bhagavad Gita, Kṛṣṇa says there is no one equal to Me, mattaḥ parataraṁ nānyat kiñcid asti dhanañ-jaya mayi sarvam idaṁ protaṁ sūtre maṇi-gaṇā iva Translation O conqueror of wealth, there is no truth superior to Me. Everything rests upon Me, as pearls are strung on a thread. (BG 7.7) The next opulence is, purodhasāṁ ca mukhyaṁ māṁ viddhi pārtha bṛhaspatim senānīnām ahaṁ skandaḥ sarasām asmi sāgaraḥ Translation Of priests, O Arjuna, know Me to be the chief, Bṛhaspati. Of generals I am Kārttikeya, and of bodies of water I am the ocean. (BG 10.24) Further Kṛṣṇa says, of all the Purohits, (Purohit means one who wishes good for his people) I am the Brhaspati, the spiritual master of the demigods. Of generals, I am the Karttikeya, the brother of Lord Ganesha. We cannot measure the depth or width, the power of the ocean, I am the ocean of all the water bodies. maharṣīṇāṁ bhṛgur ahaṁ girām asmy ekam akṣaram yajñānāṁ japa-yajño ’smi sthāvarāṇāṁ himālayaḥ Translation : Of the great sages I am Bhṛgu; of vibrations I am the transcendental oṁ. Of sacrifices I am the chanting of the holy names [japa], and of immovable things I am the Himalayas. (BG 10.25) Among all the sages, I am Bhrgu Muni. The Muni was elected to check who is supreme from the three prime gods Brahma, Visnu, Siva. To ascertain, he went and kicked Lord Viṣṇu on his chest. You can clearly see the foot mark on Lord Vitthala's chest. Of all the vibrations, I am the transcendental sound aum. Among all the Yajnas, sacrifices I am the Japa Yajna, the chanting of the holy name. Hare Kṛṣṇa Hare Kṛṣṇa Kṛṣṇa Kṛṣṇa Hare Hare Hare Rama Hare Rama Rama Rama Hare Hare This is japa yajna, sankirtan Yajna. We perform our sacrifice yajna simply by taking Tulasi beads in our hand and chanting (yajna). There is no need of a Purohit or fire. Most prominent of all the yajnas is japa yajna and I am the Japa Yajna, whether it be Ashvameda yajna, Gomedha Yajna, Rajasuya Yajna. aśvatthaḥ sarva-vṛkṣāṇāṁ devarṣīṇāṁ ca nāradaḥ gandharvāṇāṁ citrarathaḥ siddhānāṁ kapilo muniḥ Translation Of all trees I am the banyan tree, and of the sages among the demigods I am Nārada. Of the Gandharvas I am Citraratha, and among perfected beings I am the sage Kapila. (BG 10.26) uccaiḥśravasam aśvānāṁ viddhi mām amṛtodbhavam airāvataṁ gajendrāṇāṁ narāṇāṁ ca narādhipam Translation Of horses know Me to be Uccaiḥśravā, produced during the churning of the ocean for nectar. Of lordly elephants I am Airāvata, and among men I am the monarch. (BG 10.27) While churning the ocean, 14 gems appeared, one of them is the horse Uccaiḥśra and I am that Uccaiḥśrva. āyudhānām ahaṁ vajraṁ dhenūnām asmi kāma-dhuk prajanaś cāsmi kandarpaḥ sarpāṇām asmi vāsukiḥ Translation Of weapons I am the thunderbolt; among cows I am the surabhi. Of causes for procreation I am Kandarpa, the god of love, and of serpents I am Vāsuki. (BG 10.28) I am the Vajra, the strongest weapon among all the weapons and Surabhi among the cows. While churning the ocean, the 33 crore demigods needed ropes to churn so they made Vasuki serpent a rope to churn the Mandarachala Mountain. How lengthy and strong must Vasuki be to hold that mountain. The Lord says I am Vasuki. anantaś cāsmi nāgānāṁ varuṇo yādasām aham pitṝṇām aryamā cāsmi yamaḥ saṁyamatām aham Translation Of the many-hooded Nāgas I am Ananta, and among the aquatics I am the demigod Varuṇa. Of departed ancestors I am Aryamā, and among the dispensers of law I am Yama, the lord of death. (BG 10.29) prahlādaś cāsmi daityānāṁ kālaḥ kalayatām aham mṛgāṇāṁ ca mṛgendro ’haṁ vainateyaś ca pakṣiṇām Translation Among the Daitya demons I am the devoted Prahlāda, among subduers I am time, among beasts I am the lion, and among birds I am Garuḍa. (BG 10.30) pavanaḥ pavatām asmi rāmaḥ śastra-bhṛtām aham jhaṣāṇāṁ makaraś cāsmi srotasām asmi jāhnavī Translation Of purifiers I am the wind, of the wielders of weapons I am Rāma, of fishes I am the shark, and of flowing rivers I am the Ganges. (BG 10.31) Once in Padayatra, while going to Badrikasrama from Haridwar, we were surrounded by the gigantic Himalayas. The sun was over head and the pleasant pure Ganges was flowing by. This enhances Kṛṣṇa conscious spirits. All these are the opulences of Kṛṣṇa. Someone asked Srila Prabhupada, "Can we see the beautiful sunset?" In reply he said, "If you see it with the vision that the sun is an opulence of Kṛṣṇa, then it not considered maya." Another time, Srila Prabhupada was giving a lecture and he wanted to explain raso ’ham apsu kaunteya - Krsna says, "I am the taste of water." In demonstrating he drank a sip of water and showed the content saying, "This satisfaction is Krsna." This is Kṛṣṇa Consciousness, very practical. There is no end to the opulences of Krsna and at the end of the chapter Krsna says, "These opulences are a small part of all My opulences". Here, in this chapter the Lord is speaking, but in the next chapter He will show His Virat Rupa to Arjuna. Nitai Gaur Premanande Hari Haribol!

Russian