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जप चर्चा पंढरपुर धाम से 26 जनवरी 2021

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे । हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।। गौरांग ।

696 जगह से आज जप हो रहा है । आप सब जप कर रहे हो , आप सब का स्वागत है । है कि नहीं ? आप सब का जप करने के लिए स्वागत है । हरि हरि । वैसे आत्मा का काम धंधा जप करना है , आत्मा का काम धंधा है , वैसे काम प्रेम धंधा है , काम धंधा नही (हसते हुये) हरि हरि । आत्मा वैसे करता ही रहता है ,

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे । हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।।

मन के लिए भी जप करते रहना चाहिए या कुछ समय के लिए हम भूल गए थे , कुछ नही बहुत से समय के लिए बहिर्मुखी , अनादि बहिर्मुखी , अनादि काल से बहिर्मुखी होकर हमारा काम धंधा क्या हो गया है ? भोग वांच्छा करें , ऐसे भोग वांच्छा के काम धंधे हम कर रहे थे किंतु अब कृष्ण की विशेष कृपा या कृपा की दृष्टि की वृष्टि हम पर हो रही है और भगवान ने हमारा चयन किया हुआ है जिसके कारण हम अब मरा मरा के बजाय राम राम कर रहे हैं । आपका नाम क्या है ? ऐसा हमने किसी से पूछा तब उन्होंने कहा था , " मेरा नाम करमरकर है ।" कर और फिर मर , आप पुनः जन्म ले सकते और फिर पुनः कर और पुनः मर (हसते हुये) मैंने कहा तुम्हारा बहुत अच्छा नाम है और फिर मैंने यह भी सोचा कि केवल तुम ही करमरकर नही हो , संसार का हर एक व्यक्ति करमरकर है । नाम तो कुछ ही लोगों का करमरकर होता है लेकिन कार्यकलापों के दृष्टि से देखे तो हर कोई कर फिर मर फिर कर फिर मर कर रहे हैं । यह हो ही रहा था अब भगवान ने हम पर कृपा की और दुर्लभ मनुष्य जीवन प्राप्त करवाया ।

भजहुँ रे मन श्रीनन्दनन्दन, अभय चरणारविन्द रे। दुर्लभ मानव-जनम सत्संगे, तरह ए भव सिन्धु रे॥

अर्थ (1) हे मन, तुम केवल नन्दनंदन के अभयप्रदानकारी चरणारविंद का भजन करो। इस दुर्लभ मनुष्य जन्म को पाकर संत जनों के संग द्वारा भवसागर तर जाओ!

और दुर्लभ मानव का सदुपयोग , सदुपयोग और असदुपयोग भी होता है , सदुपयोग तो हो ही रहा था ,

हरि हरि! विफले जनम गोङाइनु। मनुष्य जनम पाइया, राधाकृष्ण ना भजिया, जानिया शुनिया विष खाइनु।।

अर्थ (1) हे भगवान्‌ हरि! मैंने अपना जन्म विफल ही गवाँ दिया। मनुष्य देह प्राप्त करके भी मैंने राधा-कृष्ण का भजन नहीं किया। जानबूझ कर मैंने विषपान कर लिया है।

यह सत्संग और असत्संग काम धंधे चल ही रहे थे किंतु अब भगवान क्या कर रहे हैं ? हमको जगा रहे हैं और हम जग गये हैं । भगवान जगाते तो सबको है , लेकिन सब जगते नही हैं।

जीव जागो, जीव जागो, गोराचाँद बोले। कत निद्रा जाओ माया-पिशाचीर कोले॥

अर्थ (1) श्रीगौर सुन्दर कह रहे हैं- अरे जीव! जाग! सुप्त आत्माओ! जाग जाओ! कितनी देर तक मायारुपी पिशाची की गोद में सोओगे?

जीव जागो जीव जागो गौराचांद बोले , गौरचांद अपना कर्तव्य पुरा करते हैं हमको जगाकर। उनका प्रेम है उनके जिओ के प्रति हम उनके हैं , किनके हैं ? गौरांग महाप्रभु के हैं । हम तो समझ कर बैठे हैं कि हम अपने मां बाप के हैं या हम भारत के हैं । आज 26 जनवरी भी है, प्रजासत्ता का दिन है । 1950 साल में हमारे भारत का कारोबार शुरू हुआ, भारत संविधान के अनुसार चलने लगा यह कुछ अच्छा नहीं हुआ, भारत का कारोबार तो भगवत गीता के अनुसार होना चाहिए था । ऐसा कृष्ण ने कहा है

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदु: |स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ||

(भगवद्गीता 4.2)

अनुवाद: इस प्रकार यह परम विज्ञान गुरु-परम्परा द्वारा प्राप्त किया गया और राजर्षियों ने इसी विधि से इसे समझा | किन्तु कालक्रम में यह परम्परा छिन्न हो गई, अतः यह विज्ञान यथारूप में लुप्त हो गया लगता है |

राजऋषी सुनेंगे , मैं जो सुना रहा हूं सर्वप्रथम तो राजा सुनेंगे , राजा को कारोभार संभालना है वह राजा सुनेंगे , राजाओं को ऋषी सुनाएंगे तो वैसे राजा कहलाएंगे राजऋषि और फिर वही सुशासन संभाल सकते हैं । शासक दुशासन ही हुए , अधिकतर आजकल के शासक , प्रशासक दुशासन जैसे ही हैं। हरि हरि । भगवान ने गीता सुनाई ,भागवत भी है , कृष्ण कहीला वेद पुराण सभी मनुष्य के कल्याण के लिए भगवान ने वेद पुराणों की रचना की है ऐसा संविधान होना चाहिये । गीता भागवत संविधान, धर्म किसको कहते हैं ? प्रभु बात कहते हैं , "भगवान के दिए हुए नियम , भगवान के नियम ।" हम लोगों ने अपने अपने भूमी के नियम बनाए हैं और वह अधिकतर भगवान के नियम के साथ मेल नहीं खाते उसी को फिर मनोधर्म कहा जाता है । मनोधर्म है , फिर आंबेडकर और उनका संघ , कुछ उनके साथ में थे फिर उन्होंने रचना की है , हरी हरी । अब कुछ बातें तो ठीक हैं , हम देख सकते हैं पर उसके पहले परवानगी नहीं थी लेकिन अब है, सविधान में सुधार करते हैं और उसको अब लीगल बनाते हैं , यह मनोधर्म हुआ। भगवान के दिये हुये धर्म का पालन नहीं हुआ और इसी के साथ फिर जुआ यह सब, हमारे इस्कॉन के जो 4 नियम हैं , वह 4 नियम है उसके अंतर्गत एक नियम है जुआ नहीं खेलना किंतु मनोधर्म की बातें सुनाना भी जुआ ही है और सुनना भी जुआ ही है, इसको श्रील प्रभुपाद चीटर आर चिटेड , कुछ लोग ठगते हैं और कुछ लोग क्या करते हैं ? ठगाते हैं , ठग बन जाते हैं । कोई ठगता है तो कोई ठग कर उसे ले जाता है , जहां गधों की सभा है तो गधा पति कौन होगे ? महागधा , तो इसी तरह हरि हरि ।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे । हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।।

राजा बहुत बड़ी पदवी है और बहुत बड़ी जिम्मेदारी है, राजा भगवान का प्रतिनिधि होता है । हरि हरि । और राजा की होती है प्रजा, राजा का भी अपना खुदका परिवार होता है वह भी प्रजा है किंतु वैसे उस राज्य के जितने भी नागरिक हैं वह भी प्रजा बन जाते हैं । प्रजा उनके बाल बच्चे हैं ऐसे ही समझ के साथ फिर राम ने राज किया था । आज भी यह प्रसिद्ध है कैसा राज हो ? रामराज हो । राजा हो तो राम जैसा , राज्य हो तो राम राज्य जैसा, ऐसा सपना तो महात्मा गांधी ने लिखा था लेकिन मिला क्या है ? राम राज नहीं रावण राज । कुछ साल पहले रावण राज आपने सुना , नहीं ? आप बच्चे थे (हंसते हुये) सच्चे भी थे इसलिए आप ने ना सुना , ना देखा । बुरा मत देखो , बुरा मत सुनो , बुरा मत बोलो , जो छोटे होते तो ऐसे चलता रहता है , बड़े हो जाते हैं तो फिर बदमाश भी हो जाते हैं , चालू हो जाते हैं। हरि हरि। भगवान ने हम पर कृपा दृष्टि की है , भगवान की हम पर कृपा दृष्टि हुई है। कम से कम जो उपस्थित हैं या हमारे साथ जो जप कर रहे थे या इतना ही नहीं जो अंतरराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत इस्कॉन संघ के संपर्क में आए हैं , इस्कॉन के मतलब इस्कॉन के भक्तों के संपर्क में आए हैं वह सभी भाग्यवान हैं । चैतन्य महाप्रभु ने आपको भाग्यवान बनाया है । हरि हरि ।

हरि हरि! विफले जनम गोङाइनु। मनुष्य जनम पाइया, राधाकृष्ण ना भजिया, जानिया शुनिया विष खाइनु॥

अर्थ (1) हे भगवान्‌ हरि! मैंने अपना जन्म विफल ही गवाँ दिया। मनुष्य देह प्राप्त करके भी मैंने राधा-कृष्ण का भजन नहीं किया। जानबूझ कर मैंने विषपान कर लिया है।

उन्होंने अब जहर पीना बंद किया और अब नामामृत पी रहे हैं । नाम के अमृत का पान कर रहे हैं , धन्यवाद ! किस को धन्यवाद देना चाहिए ? भगवान धन्यवाद , भगवान का आभार मानना चाहिए , आपने भगवान का आभार कभी माना है ? थैंक यू , थैंक यू , धन्यवाद धन्यवाद कृष्ण , हरि हरि । ऐसा नही होना चाहिए लेकिन ऐसे भी धन्यवाद बोला जाता है , जब किसी के पास सिगरेट तो होती है , सिगरेट तैयार है और उसके पास माचिस नहीं है फिर बगल वाले को दया आ जाती है, और वह कहता है , " बेचारे के पास लगता है कि माचिस नहीं है " वह अपना माचिस या लाइटर देकर उसकी मदद करता है , उसकी सिगरेट जलाने में उसकी मदद करता है , उसकी सिगरेट जिसने भी जलाई वह कहता है धन्यवाद , "अब तो तुमने मेरी सिगरेट को जलाया , धीरे-धीरे मेरे फेफड़े भी जल जाएंगे , " (सभी भक्त हंसते हुये ) बाद में मिलेंगे , नहीं मिलेंगे पहले ही मेरा धन्यवाद। से भी धन्यवाद हमारे जगत मे चलते रहते हैं । ऐसी मेहरबानी करने वाले कुछ लोग कम नहीं हैं। भगवान की जो हम पर कृपा हुई है , भगवान हमारा कल्याण करना चाह रहे हैं , कर रहे हैं , भविष्य में आने वाली कई सारी परेशानियों से हमको भगवान बचाने वाले हैं। दुखालय से हमको सुखालय ले जाने की भगवान की योजना है । वही योजना है , वैसे शास्त्रों में इस योजना का वर्णन है और वही संविधान भी है । ऐसे कृष्ण को, ऐसे श्री भगवान को मेरे बारंबार प्रणाम है। हम उनका शुक्रिया अदा कर सकते हैं , केवल कहके ही नहीं , हमारा आभार दिखा भी सकते हैं , मैं आपका आभारी हूं इस भाव का दर्शन भी कर सकते हैं , जब हम प्रणाम करेंगे , साष्टांग दंडवत करेंगे या पंचांग प्रणाम माताएं करेंगी तो यह धन्यवाद ही है। हम भगवान के सामने झुकते हैं , उनके अनुग्रहि बोल ही रहे हैं हम आपके आभारी हैं । हरी हरी । इसी के साथ और भी कुछ कल का विषय आगे बढ़ाना था लेकिन और भी समाचार मैंने पढ़ा तो उसको कहे बिना रहा नहीं जाता, नेपाल में एक नई पदयात्रा का प्रारंभ हो रहा है , हरि बोल । इसी के साथ फिर क्या होगा ? चैतन्य महाप्रभु ने जो भविष्यवाणी की है वह और सच होगी , श्रील प्रभुपाद की पदयात्रा , पदयात्रा के संस्थापक श्रील प्रभुपाद हैं , पदयात्रा संस्थापकाचार्य श्रील प्रभुपाद की जय । तब प्रभुपाद भी थे , श्रीकृष्ण कृपा मूर्ति , कृपा की मूर्ति , कृपा मूर्ति श्रील प्रभुपाद सोच रहे थे कैसे श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु की भविष्यवाणी को सच किया जाये ? चैतन्य महाप्रभु ने कहा है ,

नगर आदि ग्राम सर्वत्र प्रचार होईब मोर नाम

मेरे नाम का प्रचार करो , मेरे नाम का प्रचार करो , भगवान के नाम का प्रचार करो , मेरे नाम का नहीं ।जो कहने वाले हैं , वह कहने वाले श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु हैं , वह कहते हैं मेरे नाम का प्रचार करो । आपका नाम तो कोई कहेगा श्रीकृष्ण चैतन्य है , तो श्रीकृष्ण चैतन्य के नाम का प्रचार होना चाहिए यहाँ प्रचार तो हरे कृष्ण का हो रहा है ?

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे । हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।।

हरे कृष्ण का प्रचार हो रहा है। श्रील प्रभुपाद मुझे कह रहे थे पदयात्रा करो, प्रथम पदयात्रा का उद्घाटन 1976 में 10 सितंबर का दिन था, वृंदावन धाम में प्रभुपाद के क्वार्टर मे एकत्रित हुए थे और श्रील प्रभुपाद हमको वृंदावन से मायापुर भेज रहे थे पदयात्रा। उस पदयात्रा के उद्घाटन समारोह में प्रभुपाद ने कुछ पदयात्रियों को संबोधन किया अंत में हम आगे बढ़ने ही वाले थे, वहां से उठकर जाने ही वाले थे प्रभुपाद कह रहे थे ,

यारे देख , तारे कह ' कृष्ण ' - उपदेश ।आमार आज्ञाय गुरु हजा तार ' एइ देश ।। (चैतन्य चरितामृत 7.128)

अनुवाद " हर एक को उपदेश दो कि वह भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत में दिये गये भगवान् श्रीकृष्ण के आदेशों का पालन करे । इस तरह गुरु बनो और इस देश के हर व्यक्ति का उद्धार करने का प्रयास करो । "

यारे देख , तारे कह ' कृष्ण ' - उपदेश ।आमार आज्ञाय गुरु हजा तार ' एइ देश ।।

प्रभुपाद ने कहा , यारे देख , तारे कह ' हरे कृष्ण ' - उपदेश ।

वैसे चैतन्य महाप्रभु ने कहा है , यारे देख , तारे कह ' कृष्ण ' - उपदेश ।आमार आज्ञाय गुरु हया तार ' एइ देश ।। इस उपदेश के साथ श्रील प्रभुपाद ने कहा यारे देख , तारे कह ' हरे कृष्ण ' - उपदेश ।

श्रील प्रभुपाद की हरे कृष्ण महामंत्र के, इस कलयुग के धर्म के प्रचार के साथ और कई सारी योजनाएं थी उसके अंतर्गत एक विशेष योजना पदयात्रा है। फिर पदयात्रा तब से आज तक चल ही रही है और आज के लिए, आज की ताजा खबर, खुश खबर और विशेष खबर सारे देश में, नेपाल में पहली पदयात्रा है जो बैल गाड़ी से गौर निताई के साथ चल रही है , वो नेपाल के सभी ग्रामों में जाने वाले हैं । यहां ऐसा करने से रामराज फैलेगा, जब हम अपनी भक्ति प्रभु को, भक्ती प्रभु नाम सुने हो ? भक्ति प्रभु की इसमें बड़ी भूमिका है , योगदान है । श्रील प्रभुपाद और गौरांग महाप्रभु की ओर से यह पदयात्रा हो रही है । इस्कॉन के लीडर्से और इस्कॉन नेपाल पदयात्रा की जय और भी समाचार है आज इस्कॉन अरावड़े भी उत्सव मना रहा है , एक विशेष उत्सव है । राधा गोपाल की जय । राधा गोपाल का जन्मदिन उत्सव है, 11 साल पहले वैसे वह दिन नित्यानंद त्रयोदशी का था लेकिन अब इस बार तो 26 जनवरी को मना रहे हैं , छुट्टी का दिन होता है तो सुविधा होती है ।

राधा गोपाल , मेरे जैसे गरीब के गांव में भगवान विद्यमान है । भगवान तो सब कुछ है भगवान क्या नहीं है ? हरि हरि । गोपाल , नंद गोवर्धन रखवाला, नंद महाराज के धन के रखवाले, बृजवासी और नंद महाराज गाय को धन समझते थे । जिसके पास अधिक गाय हैं वह अधिक धनी , जिसके पास अधिक जमीन है वह अधिक धनी यह पेपर मनी है ,कोई किमत नही होती । ऐसे धन के गोधन रखवाले भी गोपाल कहलाते हैं । कृष्ण भगवान की जय । राधा के साथ आए , आज के दिन प्रकट हुए और उस दिन जो उत्सव मनाया गया अरावडे जैसे छोटे गांव में ऐसा उत्सव ना भूतो ना भविष्यति ऐसा उत्सव मनाया गया । एक तो पहले कभी भगवान नहीं आए थे या पहले कभी भगवान की प्राण प्रतिष्ठा नहीं हुई थी। वैसे पहले भगवान वहां आए थे श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु की जय । चैतन्य महाप्रभु जब कोल्हापुर से पंढरपुर आ रहे थे, महाराष्ट्र में कोल्हापुर है दूर देशों के दूसरे राज्यों के भक्तों के लिए महाराष्ट्र में एक नगर में कोल्हापुर और वहां की महालक्ष्मी प्रसिद्ध है , महालक्ष्मी वैसे रुठके वैकुंठ से कोल्हापुर पहुंच गई , जब भृगुुमुनी आए थे और उन्होंने भगवान के वक्षस्थल पर लात मारी थी , परीक्षा हो रही थी ब्रह्मा , विष्णु , महेश में से कौन श्रेष्ठ है ? जो अधिक सहनशील है वह अधिक श्रेष्ठ है । भृगुमुनि आए लक्ष्मी भगवान के चरण कमलों की सेवा कर रही थी और भृगुमुनि आते ही , पहुचते ही, प्रणाम तो दूर ही रहा , भगवान के चरण भी छूये नही उलटे उन्होंने अपने चरणों से भगवान को लात मारी , "हे मृगु मेरा वक्षस्थल तो कठोर है , तुम्हें कुछ चोट आघात तो नहीं पहुंचा ?" ऐसे कहने वाले भगवान कृष्ण यह परीक्षा भी पास हो गए ।

और फिर भृगुमुनि आए, वहाँ कई सारे ऋषि मुनि ऊनकी राह देख रहे थे । वह परीक्षक थे , कौन उत्तीर्ण हुआ। फिर उन्होंने घोषित किया था जय श्रीकृष्ण । उस समय लक्ष्मी नाराज क्यों नहीं होगी ? अपने पति से नाराज हुई , पति को जो किसी ने अपमानित किया और उलटे पति कहते हैं कि , "आप को चोट तो नहीं लगी?" वह लक्ष्मी वैकुंठ को छोड़कर इस ब्रह्मांड में आई और कही स्थान ढूंढ रही थी जहां उतरेगी, तब कोल्हापुर का चयन हुआ और वह कोल्हापुर में रहने लगी, अब तक वह कोल्हापुर में ही है । हरी हरी । श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु दक्षिण भारत की यात्रा में जब जा रहे थे तो दक्षिण भारत की यात्रा करते हुए महाराष्ट्र या मध्य भारत कहो , महाराष्ट्र में आए तो पहला बड़ा नगर कोल्हापुर ही था, कोल्हापुर में उन्होंने महालक्ष्मी को दर्शन दिया, यह मैं कहता रहता हूं , हम लोग कोल्हापूर महालक्ष्मी का दर्शन करने जाते हैं लेकिन जब उनके प्रभु आएंगे कृष्ण भगवान, जब कृष्ण भगवान आए हैं तो कौन किसका दर्शन करेगा ? महालक्ष्मी अपने प्रभु का दर्शन करेगी । वैसे एक दूसरे का दर्शन उन्होंने किया और फिर वहां से श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु को पंढरपुर आना था विट्ठल दर्शन के लिए, विट्ठल ही आ रहे थे चैतन्य महाप्रभु के रूप में कोल्हापुर से पंढरपुर तब रास्ते में आ गया हमारा गांव अरावडे, अरावडे गांव से चैतन्य महाप्रभु ,

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण हे ..... कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण पाहिमाम ...... कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण रक्षमाम......

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे । हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।।

करते हुए श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु कोल्हापुर से सांगली, सांगली से तासगांव और तासगांव से 10 किलोमीटर दूरी पर अरावडे गांव है । वहा छोटा सा पहाड़ है , दिखता भी नहीं है उतना ऊंचा नही है वहा चैतन्य महाप्रभु चढे होंगे और रहे होंगे , मैं ऐसे स्मरण करता रहता हूं । चैतन्य महाप्रभु अरावडे में ,

आजानुलम्बित - भुजौ कनकावदातौ सङ्कीर्तनैक - पितरौ कमलायताक्षौ । विश्वम्भरौ द्विजवरौ युगधर्मपालौ वन्दे जगत्प्रियकरौ करुणावतारौ ॥ (चैतन्य भागवत 1.1)

अनुवाद: मैं भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु और भगवान् श्री नित्यानन्द प्रभु की आराधना करता हूँ , जिनकी लम्बी भुजाएं उनके घुटनों तक पहुँचती हैं , जिनकी सुन्दर अंगकान्ती पिघले हुए स्वर्ण की तरह चमकीले पीत वर्ण की है , जिनके लम्बाकार नेत्र रक्तवर्ण के कमलपुष्पों के समान हैं । वे सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण , इस युग के धर्मतत्त्वों के रक्षक , सभी जीवात्माओं के लिए दानशील हितैषी और भगवान् के सर्वदयालु अवतार हैं । उन्होंने भगवान् कृष्ण के पवित्र नामों के सामूहिक कीर्तन का शुभारम्भ किया ।

चैतन्य महाप्रभु या भगवान मेरे गांव में आए थे । हरि हरि । ऐसे हैं भगवान फिर विग्रह के रूप में 11 साल पहले प्रकट हुए , 12? 1 साल बढ़ गया, 12 साल पहले महोत्सव हुआ तो उस दिन का जो दर्शन और उस दिन इतने लोग अरावडे मे बिखरे हुये थे । वह लोग कभी अरावडे में नहीं आए थे । अरावडे के इतिहास में जब से अरावडे गिणती में आया और फिर इतना ही नहीं नेता भी आए , महाराष्ट्र के मंत्रिमंडल के कई सारे मंत्री भी आए । हरी हरी। आर आर पाटिल गृह मंत्री थे, उप मुख्यमंत्री थे , ऐसे कई कई आए, हेलीकॉप्टर से आए । हेलीकॉप्टर का लैंडिंग भी हुआ, जैसे देवता आते है (हसते हुये) रुरल डेवलपमेंट मिनिस्टर भी आए थे, उन्होंने घोषित किया था इस्कॉन अरावड़े मंदिर के विकास के लिए महाराष्ट्र की ओर से एक करोड़ का अनुदान। यह मुख्य उपस्थिति तो वैसे मेरे गुरू बंधु , गुरु भ्राता , गुरु बहने 42 ऐसी संख्या बनी थी, प्रभुपाद के अनुयायी इसमे कई जीबीसी, सन्यासी और फिर दूसरी पीढ़ी के इस्कॉन के लीडर कई सारे मंदिर के अध्यक्ष और इसी तरह बडी संख्या मे इस्कॉन के साधु महात्मा आये थे , अविस्मरणीय उत्सव था, इसलिए आज भी अविस्मरणीय, भूला नहीं जा सकता उसकी आज याद आ रही है और आज के दिन अरावडे मे मनाया जा रहा है। कोविंड 19 की परिस्थितियां है, हर वर्ष वैसे बडा उत्सव मनाया जाता है अभी साधारण छोटा होगा , गांव की दृष्टी से मोटा होगा। वैसे मैं भक्तों से यही से संबोधित करने वाला हूं, ऑनलाइन 2:30 बजे मराठी में होगा, यथासंभव आप भी निमंत्रित हो, कार्यक्रम लाइव होगा आप सब देख सकते हो , ठीक है ।

गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल ।।

English

26 January 2021

The Real Constitution of a Republic is Bhagavad Gita & Srimad Bhagavatam

Hare Krsna! Welcome to this Japa session. Devotees from 696 locations are chanting with us right now. Welcome! It is the business of the soul to chant and hear. It is the loving business of the soul. It’s not work business.

The atma keeps on chanting.

Hare Krsna Hare Krsna Krsna Krsna Hare Hare Hare Rama Hare Rama Rama Rama Hare Hare

The sound keeps on chanting. It’s not new for the soul. We have forgotten for a long time, since we have been engaged in material satisfaction. For the past many births, we were only engaged in sense gratification activities. But now by the mercy of Krsna we have the right engagement. His kind sight is now falling on us. We have been chosen and selected by the Lord.

hari hari! bifale janama gonainu manushya-janama paiya, radha-krishna na bhajiya, janiya suniya visha khainu

Translation 0 Lord Hari, I have spent my life uselessly. Having obtained a human birth and having not worshiped Radha and Krishna, I have knowingly drunk poison. (Narottama Das Thakur)

Earlier we were saying, “mara mara” now we are saying “Rama Rama”. First we were in the dying business and now we are in the chanting business. I once met a person whose name was Karmarkar. Kar means do and mar means die. Do, then die and then take birth again. This is not only his story. Everyone is Karmarkar. Every person is taking birth and then death. By Krsna’s mercy we have got to know the truth. We have woken up. Krsna wishes to wake everyone up, but everyone doesn't wake up. We have got this rare human birth.

bhajahū re mana śrī-nanda-nandana abhaya-caraṇāravinda re durlabha mānava-janama sat-sańge taroho e bhava-sindhu re

Translation O mind just worship the lotus feet of the son of Nanda, which make one fearless. Having obtained this rare human birth, cross over this ocean of worldly existence through the association of saintly persons.

We must make the right use of this rare human birth.

kṛṣṇa bhuliya jīva bhoga vāñchā kare pāśate māyā tāre jāpaṭiyā dhare

Translation Māyā means the illusory energy, where we want to enjoy, but it is not actual enjoyment; it is illusion. So the sex life in this material world is the centre of this attraction. (Prema-vivarta)

Krsna has woken us up. He keeps on waking us up, but many of us do not wake up. It’s His love for us. We belong to Gauranga. We presume we belong to our parents, to the country. We knowingly drink the poison.

Today is 26 January, Indian Republic day. Today the constitution of India was implemented. This was not very good news then. The constitution must be based on Bhagavad Gita. Krsna has said,

evam parampara-praptam imam rajarsayo viduh sa kaleneha mahata yogo nastah parantapa

Translation This supreme science was thus received through the chain of disciplic succession, and the saintly kings understood it in that way. But in course of time the succession was broken, and therefore the science as it is appears to be lost. (BG 4.2)

First the King who has to run the business must listen to the saints. The saints would advise the king who would then become known as a saintly king. The government should be a good government. There is also Dushasan - bad government. Religion means the laws of the Lord. The Lord has made the Veda and Purana for the welfare of all. There should be a constitution based on Gita and Bhagavat. Gita Bhagavat Constitution! What is religion? Prabhupada would say, “Laws of the Lord”. Dharma is the laws given by the Lord. There are laws of the Lord and laws of the land. These people have made the laws of the land and mostly what they do, is against the laws of the Lord. They are not in sync with the Lord’s laws. This is called mano dharma, or laws of your own mind. The constitution was framed by Dr. Ambedkar and others in the assembly. They created the constitution.

Some things are good, but then in many places there are some actions which are offensive according to the laws of the Lord but they are allowed and legalised. Abortion is legalised. Gambling is legalised. If certain things were not allowed, they make amends and allow it. This is Mano dharma, it contradicts the laws of the Lord. The 4 principles of Bhagavat Dharma and also of ISKCON are the same. One of the principles is not to gamble. But here there are cheaters and the cheated. This is the assembly of donkeys, so the greatest donkey will preside.

It is a very big responsibility to be a king. The king is the representative of the people and the people belong to the king. The king also has a family. The citizens of the nation are also his children. It becomes the duty of the king to take care of the citizens and their welfare. The entire empire is the family of the King. People have the right to preach what they feel is right. Everyone has different opinions. They don't necessarily follow what Krsna or the Acaryas say. They preach their own speculations and interpretations.

Mahatma Gandhi had a dream that India will have Rama Rajya - rule of King Rama post independence. But that didn't happen. Rather it became the rule of Ravana. However all those who have come in contact with ISKCON, Srila Prabhupada are made fortunate by Sri Krsna Caitanya Mahaprabhu. We are all relishing the nectarean holy name. This is all by the mercy of the Lord. Did we ever express our gratitude for this? We must thank the Lord for this.

A person has a cigarette. He desires to smoke, but he does not have a light. A person near him helps him light the cigarette. In return he gets a thank you for lighting “my cigarette which will soon burn up along with my lungs.” So many such thank yous for small and big help are given away during our lifetime. Those who help us in such destructive ways are not few.

The Lord has mercifully brought to us great fortune which will free us from the cycle of birth and death. Krsna is trying to save us. For future problems the Lord is trying to save us once and for all. Lord has His plan to take us from this place of miseries to a place where there are no miseries. There is mention about the Lord’s plans in the scriptures to save us. We must certainly express our gratitude to the Lord. We must offer our obeisances. When we bow down in front of the Lord and offer our gratitude, we must say to Him that we are extremely thankful to Him, that we are forever grateful.

māyā-mugdha jīvera nāhi svataḥ kṛṣṇa-jñāna jīvere kṛpāya kailā kṛṣṇa veda-purāṇa

Translation “When a living entity is enchanted by the external energy, he cannot revive his original Kṛṣṇa consciousness independently. Due to such circumstances, Kṛṣṇa has kindly given him the Vedic literatures, such as the four Vedas and eighteen Purāṇas.” Every human being should therefore take advantage of the Vedic instructions; otherwise one will be bound by his whimsical activities and will be without any guide. (CC Madhya 20.122)

I also wanted to continue with yesterday's topic, but then I just read the news and am unable to stop myself from sharing it. A new Padayatra has started in Nepal. This is another milestone crossed in the fulfilment of the forecast by Sri Krsna Caitanya Mahaprabhu. Srila Prabhupada is the founder acarya of Nepal Padayatra also. Lord Sri Krsna Caitanya Mahaprabhu said, “My name will be preached all over the world.” He said, “My name.” But we are preaching the Hare Krishna maha-mantra. Once Srila Prabhupada told me - Hare Krishna upadesa It was during the first Padayatra, 10 September 1976. It was our first Padayatra from Vrindavan to Mayapur. Srila Prabhupada addressed us and in the end he said, “Whoever you see or may come across, speak and preach Hare Krsna to them. This was a little different from what Mahaprabhu said. He said, “Preach about Krsna,” whereas Srila Prabhupada specified to simply preach the Hare Krishna maha-mantra.

This beginning of the Nepal Padayatra is good morning news. It is their desire to go to every village and town of Nepal. Ram Rajya can be established by such activities. Atri Patri Prabhu from Nepal has a big commitment in this. There is a full arrangement. We are grateful to them on behalf of Prabhupada and Mahaprabhu. We thank them and the ISKCON leaders in Nepal. ISKCON Nepal Padayatra ki Jaya !

pṛthivīte āche yata nagarādi grāma sarvatra pracāra hoibe mora nāma

Translation Lord Caitanya desired that "In all the towns, in as many towns and villages as they are on the surface of the globe, My name will be broadcast." He is Kṛṣṇa Himself, svayaṁ kṛṣṇa, kṛṣṇa caitanya-nāmine, simply changing His name as Kṛṣṇa Caitanya. So His prediction will never go in vain. That's a fact. (CB Antya-khaṇḍa 4.126)

We also have more news. ISKCON Aravade is having a celebration. It is the 12th birthday anniversary of Sri Radha Gopal. Time literally flies. It has already been 12 years. The Lord is merciful and agreed to appear and stay in the village of poor people like us. The Lord is very rich. He has everything. But for Krsna, wealth is not paper money. The Brajavasis' wealth was calculated according to the cows they had. They considered the cows their wealth. The one who had more cows had more wealth and the one who had more land, had more wealth.

Krsna was the caretaker of such cows. Today ISKCON Aravade has a special celebration. The celebration 12 years ago was unparalleled. Never in the past nor in the future, was such a celebration undertaken. It is not that the Lord never came to Aravade. Lord Sri Krsna Caitanya Mahaprabhu came to Aravade 500 years ago when He was on Padayatra. He came to a nearby place called Kolhapur from Pandharpur where there is a famous temple of Sri Mahalakshmi. She came there when she was upset with the Lord. She left Vaikuntha and came to Kolhapur. Bhrgu Muni was testing the three Lords - Brahma, Vishnu and Shiva. When he came to Vaikuntha he immediately kicked the Lord on the chest. Instead of offering obeisances he kicked the Lord. Despite that the Lord said, “ O Bhrgu, My chest is as hard as Vajra, and your feet are so soft, I fear you have hurt your feet.” Upon seeing this reaction of her husband, the Lord of the Lord's, Mahalakshmi was upset and she left Vaikuntha and came to Kolhapur. Lord Caitanya came to Kolhapur to give Darshan to Mahalakshmi.

During His visit to South India and to middle India, Mahaprabhu came to Kolhapur. We all go to receive darshan, but Lord Caitanya is the Master of Mahalaksmi so He went to give darshan to her. From there He headed towards Pandharpur to have darshan of Sri Vitthala. On the way He came to Aravade chanting the names of Krsna.

kṛṣṇa! kṛṣṇa! kṛṣṇa! kṛṣṇa! kṛṣṇa! kṛṣṇa! kṛṣṇa! he kṛṣṇa! kṛṣṇa! kṛṣṇa! kṛṣṇa! kṛṣṇa! kṛṣṇa! kṛṣṇa! he kṛṣṇa! kṛṣṇa! kṛṣṇa! kṛṣṇa! kṛṣṇa! kṛṣṇa! rakṣa mām kṛṣṇa! kṛṣṇa! kṛṣṇa! kṛṣṇa! kṛṣṇa! kṛṣṇa! pāhi mām rāma! rāghava! rāma! rāghava! rāma! rāghava! rakṣa mām kṛṣṇa! keśava! kṛṣṇa! keśava! kṛṣṇa! keśava! pāhi mām (CC Madhya 7.96)

Sri Krsna Caitanya Mahaprabhu walked towards Sangli then to Tasgaon and 10 kms further from there to Aravade. There is a small hill. He must have climbed it. I usually visualise this. This happened 500 years ago and 12 years ago He appeared in the Deity form of Sri Radha Gopal.

ājānu-lambita-bhujau kanakāvadātau saṅkīrtanaika-pitarau kamalāyatākṣau viśvambharau dvija-varau yuga-dharma-pālau vande jagat priya-karau karuṇāvatārau

Translation I offer my respectful obeisance’s unto my spiritual master, who with the torchlight of knowledge has opened my eyes, which were blinded by the darkness of ignorance. (CB Ādi-khaṇḍa 1.1)

The Lord had come to my village. He appeared in the form of a Deity 12 years back. Prana prathistha ceremony was conducted. It was such a grand temple opening celebration. So many people arrived in Aravade. It was the first time in the history of Aravade that so many people arrived. So many ministers of Maharashtra had arrived. PR Patil, who I think was the Deputy Chief Minister, also came.

Some even arrived in helicopters like the demigods. Rural development minister had also come and he pledged a donation of INR ₹10 million for the development of ISKCON Aravade. 32 Prabhupada disciples had arrived. Many second generation leaders and Gurus of ISKCON were also present. These are unforgettable memories. Temple Presidents, GBCs , many saints of ISKCON came. They cannot be forgotten. Today the 12th anniversary is being celebrated. This year it is restricted due the current pandemic. I will also be giving a class in Marathi which will be telecast online around 2.30 pm IST today. You're all welcome to that session as well.

Hare Krishna Gaura premanande Hari Haribol

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