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जप चर्चा दिनांक १३.०१.२०२१ हरि! हरि! आज इस जप कॉन्फ्रेंस में 813 स्थानों से भक्त सम्मिलितत हैं। हरे कृष्ण! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय... सभी कहिए। सखी वृन्द! क्या तुम कह रही हो? सभी कहिए, ॐ नमो भगवते वासुदेवाय... इतना तो समझ में आया ही होगा। हम कई दिनों से कृष्ण को सुन रहे हैं। भगवतगीता को सुन रहे हैं अथवा गीता अमृत का पान कर रहे हैं। बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥ ( श्रीमद् भगवतगीता ७.१९) अनुवाद:- अनेक जन्म-जन्मान्तर के बाद जिसे सचमुच ज्ञान होता है, वह मुझको समस्त कारणों का कारण जानकर मेरी शरण में आता है | ऐसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ होता है । भगवान ही कह रहे हैं कि गीता के ज्ञान अथवा उपदेश को जो सुनते हैं 'ज्ञानवान्मां प्रपद्यते' अर्थात वे ज्ञानवान व्यक्ति ही मेरी शरण में आते है। यदि कोई व्यक्ति शरण नहीं ले रहा है तो उस व्यक्ति का कसूर है, वह अज्ञानी अथवा अनाड़ी है इसलिए तो वह भगवान की शरण में नहीं आ रहा है। हरि! हरि! किन्तु जो ज्ञानवान है अथवा ज्ञानवान बन चुका है। भगवान यहाँ गीता में ज्ञान की बातें कर रहे हैं। वैसे यह भक्तिपूर्वक ज्ञान है। यह अज्ञानियों का ज्ञान नहीं है। भागवत कहता है कि भक्ति योगी को ज्ञान प्राप्त होता है। भक्ति करने से ज्ञान प्राप्त होता है। भागवतम में इस सिद्धान्त का वर्णन है वासुदेवे भगवति भक्तियोग: प्रयोजित:। जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं यदहैतुकम्।। ( श्रीमद् भागवतम १.२.७) अनुवाद:- भगवान् श्रीकृष्ण की भक्ति करने से मनुष्य तुरंत ही अहैतुक ज्ञान तथा संसार से वैराग्य प्राप्त कर लेता है। भक्ति करने से क्या होता है? जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं यदहैतुकम् अर्थात यह भक्ति ही ज्ञान उत्पन्न करती है। भक्ति करने से जीवन में वैराग्य उत्पन्न होता है। इसे उल्टी कहो लेकिन सुलटी बात तो यही है और सही है। भक्त बनने से ज्ञान भी होता है। हम भी उस बात को कई बार पहले कह चुके हैं जो बात भगवान् ने कही है कि तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ ( श्रीमद् भगवतगीता १०.१०) अर्थ: जो प्रेमपूर्वक मेरी सेवा करने में निरन्तर लगे रहते हैं, उन्हें मैं ज्ञान प्रदान करता हूँ, जिसके द्वारा वे मुझ तक आ सकते हैं। भगवान कहते हैं कि जो मेरी सतत् तथा प्रीतिपूर्वक भक्ति करते हैं, मैं उनको ददामि बुद्धियोगं अर्थात बुद्धि देता हूँ। जिससे लोग मेरी अधिक से अधिक शरण लेते हैं। बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते । भगवान की भक्ति ही हमें ज्ञान और बुद्धि देती है और फिर हम भगवान की शरण में आते हैं। हरि! हरि! बुद्धि और ज्ञान देने वाले भगवान ही हैं। उन्होंने गीता के रूप में ज्ञान दे ही दिया है और वही बातें भगवान हमें सुनाते ही रहते हैं। भगवान हमारे ह्रदय प्रांगण में विराजमान हैं। सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥ ( श्रीमद् भगवतगीता १५.१५) अनुवाद:- मैं प्रत्येक जीव के हृदय में आसीन हूँ और मुझ से ही स्मृति, ज्ञान तथा विस्मृति होती है | मैं ही वेदों के द्वारा जानने योग्य हूँ । निस्सन्देह मैं वेदान्त का संकलनकर्ता तथा समस्त वेदों का जानने वाला हूँ। भगवान् कहते हैं कि मैं ही स्मृति देता हूँ।यदि भगवान् की याद आ रही है तो इसका अर्थ है कि भगवान् (स्वयं) याद दिलाते हैं। मैं ही बुद्धि देता हूँ। मैं ह्रदय प्रांगण में विराजमान हूं। मैं ही स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च देता हूँ अर्थात जीव को मुझ परमात्मा से स्मृति, ज्ञान, अस्मृति अथवा भुलावा प्राप्त होता है अर्थात यह व्यवस्था भी भगवान की ही है कि हम भूले भटके जीव हैं। हम भूलने में स्वतंत्र नहीं हैं। भगवान ही हमें भुला देते हैं अथवा भगवान की माया हमें भूला देती है। कोई कहता है कि भगवान् नहीं हैं! नहीं हैं। यह हमकों पहले बताया जाता है और भगवान ही बताते हैं कि मैं नहीं हूं। मैं नहीं हूं। मैं नहीं हूं। हरि !हरि! हरि! हरि! कुन्त्युवाच नमस्ये पुरुषं त्वाद्यमीश्वरं प्रकृते: परम्।अलक्ष्यं सर्वभूतानामन्तर्बहिरवस्थितम्।। ( श्रीमद् भागवतम १.८.१८) अनुवाद:- श्रीमती कुंती ने कहा: हे कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करती हूं, क्योंकि आप ही आदि पुरुष हैं और इस भौतिक जगत के गुणों से निर्लिप्त रहते हैं। आप समस्त वस्तुओं के भीतर तथा बाहर स्थित रहते हुए भी सबों के लिए अदृश्य हैं। भगवान अर्जुन के समक्ष भी हैं। वे गीता का ज्ञान अर्जुन को सुना भी रहे हैं। वही भगवान हमारे ह्रदय प्रांगण में भी हैं। वे भी वही ज्ञान सुना रहे हैं, कोई भेद नहीं है। भगवान हमारे समक्ष प्रत्यक्ष खड़े होकर हमें ज्ञान दे रहे हैं अथवा हमारे ह्रदय प्रांगण में विराजमान हो कर ज्ञान दे रहे हैं। यह एक ही बात है। एक ही कृष्ण हैं। हरि! हरि! ध्रुव महाराज! उन्होंने भी मधुबन में ओम नमो भगवते वासुदेवाय.. का जप किया था लेकिन युग अलग था। वे ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का उच्चारण कर रहे थे।जमाना बदल गया है और अब कलियुग आ गया। कलियुग का महामंत्र है हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।। ध्रुव महाराज ने भगवत प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या की। ध्यानपूर्वक जप भी किया। वैराग्य का प्रदर्शन हुआ। हरि! हरि! भगवान् उनकी भक्ति से प्रसन्न हुए। भगवान ने प्रसन्नता के फलस्वरूप उनको दर्शन दिया। भगवान् सामने आकर खड़े हो दर्शन दे रहे थे लेकिन ध्रुव महाराज दर्शन नहीं ले रहे थे। भगवान् तब सोच रहे थे कि 'ए तुम तो मुझ से मिलना चाहते थे।' मैं आ चुका हूं, ए उठो, मैं यहाँ हूँ लेकिन भगवान फिर समझ गए। यह मुझे मिल तो रहा है, मेरा दर्शन तो कर रहा है लेकिन वह अपने ह्रदय प्रांगण में मेरा दर्शन कर रहा है। उस दर्शन और सामने जो भगवान् उपस्थित थे, उसमें कोई भेद तो है नहीं। भगवान अंदर से स्मरण अथवा दर्शन दिलवा रहे थे।वे उस दर्शन को मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च अर्थात मत्त मुझसे परमात्मा से जोकि हमारे ह्रदय प्रांगण में है, दिलवा रहे थे। प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्तिविलोचनेन सन्तः सदैव हरदयेषु विलोकयन्ति। यं श्यामसुन्दरमचिन्तयगुणस्वरूपं गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि।। ( ब्रह्म- संहिता श्लोक ५.३८) अनुवाद:- जो स्वयं श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण हैं, जिनके अनेकानेक अचिन्त्य गुण हैं तथा जिनका शुद्ध भक्त प्रेम के अंजन से रञ्जित भक्ति के नेत्रों द्वारा अपने अन्तर्हृदय में दर्शन करते हैं, उन आदिपुरुष भगवान् गोविंद का मैं भजन करता हूँ। ध्रुव महाराज, प्रह्लाद महाराज जैसे संत महात्मा अपने ह्रदय प्रांगण में सदैव भगवान का दर्शन करते हैं। इनके मन की स्थिति क्या होती है, हरि हरि! प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्तिविलोचनेन उनके आखों की शोभा अर्थात वे प्रेम का अंजन लगाए होते हैं। अर्थात उनके नेत्रों से प्रेमाश्रु बहते हैं। ऐसे महात्मा भगवान् का दर्शन करते हैं। ध्रुव महाराज वैसा ही दर्शन कर रहे थे। तब भगवान् ने उनके ह्रदय प्रांगण वाले दर्शन को बंद किया। तत्पश्चात ध्रुव महाराज ने झट से आंख खोली। उनको लगा कि मैंने अपने भगवान को खो दिया। क्या मैं खो बैठा या कृष्ण अंतर्ध्यान हो गए? जबकि ऐसा तो नहीं हुआ था लेकिन जब उन्होंने आंख खोलकर देखा तो वही भगवान समक्ष थे। उसी प्रकार जब हम गीता का श्रवण करते हैं। कहना कठिन है कि कौन से भगवान हमसे गीता कह रहे हैं अथवा सुना रहे हैं अथवा हमको उपदेश कर रहे हैं। परमात्मा कर रहे हैं या कृष्ण बाहर से कर रहे हैं। भगवान एक ही है। वे भिन्न नहीं है। उनको यह भी लगता है कि उनको महात्मा भगवत गीता का उपदेश सुना रहे हैं अथवा गुरुजन उपदेश कर रहे हैं। भगवान ने भी कहा ही है कि एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥ (श्री मद् भगवतगीता ४.२) अनुवाद:- इस प्रकार यह परम विज्ञान गुरु-परम्परा द्वारा प्राप्त किया गया और राजर्षियों ने इसी विधि से इसे समझा | किन्तु कालक्रम में यह परम्परा छिन्न हो गई, अतः यह विज्ञान यथारूप में लुप्त हो गया लगता है। भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! इस ज्ञान को जो मैं तुम्हें अब सुना रहा हूं, भगवान यह चौथे अध्याय में कह चुके हैं। हमें भूलना नहीं चाहिए, वंहा भगवान कहते हैं कि मैंने यह ज्ञान विवस्वान को सुनाया, विवस्वान विवस्वान ने मनु को सुनाया और मनु ने इसे इक्ष्वाकु को सुनाया। इस प्रकार 'एवं परम्पराप्राप्तम्' अर्थात इस ज्ञान को परंपरा में प्राप्त करना होता है। हम भी जब ऐसे ही ज्ञान को प्राप्त करते रहते हैं तो हमें लगता है इस ज्ञान का स्त्रोत्र अलग है। नहीं! नहीं! यह अलग नहीं है। ज्ञान वही है और ज्ञान देने वाले भी वही हैं अथवा कहा जाए साक्षात हरि ही हैं साक्षात हरि हैं। भगवान हैं या भगवान की ओर से कोई प्रतिनिधित्व कर रहा है व हमें सुना रहा है लेकिन बात तो वही है, उपदेश तो वही है। यह उपदेश उस व्यक्ति का नहीं है जो हमें सुना रहे हैं। सुनाने वाला हमें कृष्ण की बात सुना रहे हैं। इसलिए हमें समझना चाहिए कि कृष्ण ही सुना रहे हैं। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।। आपको श्रीरंगम के ब्राह्मण याद हैं जो कि गीता का पाठ किया करते थे और उनका उच्चारण ठीक भी नहीं हुआ करता था। वहां के और अन्य पंडे, प्रकांड विद्वान जब भी इस ब्राह्मण को देखते कि वह टूटा फूटा उच्चारण कर रहा है, उनका हंसी मजाक करते लेकिन वह ब्राह्मण उसकी परवाह नहीं करता और उसको पता भी नहीं चलता कि कौन क्या कह रहा है। लेकिन जिस भाव भक्ति, प्रेम तथा ध्यानपूर्वक वे अध्ययन करते थे, उसी बात ने चैतन्य महाप्रभु का ध्यान आकृष्ट किया था। तब स्वयं वे इस ब्राह्मण की और आगे बढ़े और पूछा कि 'हे ब्राह्मण! क्या कर रहे हो? भगवतगीता पढ़ रहे हो?' ब्राह्मण ने उत्तर दिया, 'गीता पढ़ रहा हूं।' महाप्रभु ने पूछा कि ' तुम गीता पढ़ते या अध्ययन हुए, इतने भाव भक्ति का प्रदर्शन कर रहे हो जैसा कि मैं देख रहा हूं, तो तुम्हारा क्या अनुभव है?' वैसे अध्ययन करने को सुनना भी कहते हैं। जब हम गीता का अध्ययन करते हैं तो हम गीता को सुनते हैं। शास्त्र को सुनते हैं। जब हम गीता, भागवतम का श्रवण करते हैं अथवा पढ़ते हैं तब हम सुनते हैं। जिन्होंने यह गीता सुनाई है, उन्हीं को सुनते हैं। सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ ( श्रीमद् भगवतगीता १८.६६) अनुवाद्:- समस्त प्रकार के धर्मों का परित्याग करो और मेरी शरण में आओ । मैं समस्त पापों से तुम्हारा उद्धार कर दूँगा । डरो मत । यह भगवान उवाच ही है। इसे ग्रंथ में पढ़ कर या हमें कोई व्यक्ति आचार्य या गुरू या या़रे देख, तारे कह ' कृष्ण'- उपदेश करने वाला सुना दे। उसके स्त्रोत में अंतर नहीं है। गीता का स्त्रोत तो कृष्ण ही हैं। गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः। या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्मादि्वनिः सृता।। ( गीता महात्मय ४) अनुवाद:- चूंकि भगवतगीता भगवान् के मुख से निकली है, अतएव किसी अन्य वैदिक साहित्य को पढ़ने की आवश्यकता नहीं रहती। इसमें कोई परिवर्तन नहीं होता। गीता के वचन तो भगवान के मुखारविंद से ही निकले हुए हैं किन्तु हमें लगता है कि यह ग्रंथों के पृष्ठों से निकल रहे हैं या हमारे समक्ष कोई व्यक्ति बैठा है, उसके मुख से निकल रहे हैं। यह कुछ माध्यम हो सकते हैं। जैसा कि प्रभुपाद कहा करते थे कि जो प्रचारक अथवा परंपरा के आचार्य अथवा शिक्षा गुरु हैं, इनका कार्य पोस्टमैन के जैसा होता है। मान लो जैसे आपको किसी रिश्तेदार अथवा मित्र ने पत्र भेजा है। पोस्टमैन का कार्य है कि आपके पास उस पत्र को पहुंचा दे। पोस्टमैन का कार्य यह नहीं होता है कि वह उस पत्र को खोल कर स्वयं पढ़े अथवा उसमें कुछ काट छांट करें या कुछ अतिरिक्त बात लिखे। एक आदर्श पोस्ट मैन जो होता है उसका यह कार्य नहीं होता। उसे ऐसा नहीं करना होता है। अगर वह ऐसा करेगा तो वह अपनी नौकरी खो देगा। पोस्टमैन हमारे द्वारा भेजे हुए पत्र को यथावत पहुंचाता है। पोस्टमैन( डाकिया) अपना फर्ज निभाता है। हमें जब वह पत्र प्राप्त होता है तब हम वास्तविक संदेश पढ़ते हैं। पोस्टमैन ओरिजिनल संदेश में कोई बदलाव नहीं करता। इस प्रकार सीधा स्तोत्र अर्थात प्रेषक वही बना रहता है, जिसने इस पत्र को भेजा है। हम गीता का उपदेश सुन रहे हैं, पढ़ रहे हैं। उस ब्राह्मण ने भी यही कहा था मैं जब गीता को पढ़ता हूं, तब मुझे दर्शन होता है। अर्जुन उवाच सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत । यावदेतान्निरिक्षेऽहं योद्‌धुकामानवस्थितान् ॥ कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ॥ ( श्री मद् भगवतगीता १.२१-२२) अनुवाद:-अर्जुन ने कहा - हे अच्युत! कृपा करके मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच में ले चलें जिससे मैं यहाँ युद्ध की अभिलाषा रखने वालों को और शस्त्रों कि इस महान परीक्षा में, जिनसे मुझे संघर्ष करना है, उन्हें देख सकूं। कृष्ण ने अर्जुन के रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में रोका और वह स्थान कुरुक्षेत्र में ज्योतिर्सर कहलाता है। कृष्ण, अर्जुन को उपदेश सुना रहे हैं। वह रथ जिसका वर्णन पहले भी किया जा चुका है। ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ । माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥ ( श्रीमद् भगवतगीता१.१४) अनुवाद:- दूसरी ओर से श्र्वेत घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले विशाल रथ पर आसीन कृष्ण तथा अर्जुन ने अपने-अपने दिव्य शंख बजाये। इस रथ के घोड़े सफेद हैं। यह एक विशेष समालृकत रथ है। उस ब्राह्मण ने कहा मैं उन सब को देखता हूं मुझे दर्शन होता है। मैं देखता हूँ कि मैं उस रथ में माधव और पांडव विराजमान हैं। माधव पार्थ सारथी कृष्ण हैं, पांडव अर्जुन है। कृष्ण अर्जुन को उपदेश सुना रहे हैं। मैं जब जब गीता पढ़ता हूं तो ऐसा ही मैं दर्शन करता हूं। लेकिन जब हम गीता पढ़ते हैं तो निश्चित ही कृष्ण का स्मरण दिलाने के लिए कि यह गीता है , मैं कैसा हूं, कहां रहता हूं इत्यादि इत्यादि, परंतु तब हम इन बातों को माया के प्रभाव से भूल जाते हैं। हम इस संसार के अनादि काल से रहते हुए और भ्रमण कर करके भोग वांञ्छा में लिप्त होकर बहिर्मुखी होकर भ्रमण ही कर रहे थे। ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोन भाग्यवान् जीव। -गुरु- कृष्ण- प्रसादे पाय भक्ति-लता-बीज।। ( श्री चैतन्य चरितामृत मध्य लीला १९. १५१) अनुवाद:- सारे जीव अपने अपने कर्मों के अनुसार समूचे ब्रह्मांड में घूम रहे हैं। इनमें से कुछ उच्च ग्रह मंडलों को जाते हैं और कुछ निम्न ग्रह मंडलों को। ऐसे करोड़ों भटक रहे जीवों में से कोई एक अत्यंत भाग्यशाली होता है, जिसे कृष्ण की कृपा से अधिकृत गुरु का सानिध्य प्राप्त करने का अवसर मिलता है। कृष्ण तथा गुरु दोनों की कृपा से ऐसा व्यक्ति भक्ति रूपी लता के बीज को प्राप्त करता है। कृष्ण की कृपा से पहले हमारा संबंध किसी भक्त के साथ स्थापित हुआ। कोई व्यक्ति हमारा पथ प्रदर्शक गुरु बना। ऐसा भी हुआ होगा। इस्कॉन का बुक मैराथन चल रहा था। हरे कृष्ण वाले मैराथन कर रहे थे। मैं बस स्टेशन पर ही था, वहां हरे कृष्ण वाले लोग आए, उन्होंने मुझे भगवत गीता दी और थोड़े ही समय के बाद मैं कन्विंस्ड (विश्वस्त) हो गया। वे कन्विंस्ड करने में बड़े कुशल भी थे। मैंने भगवत गीता ले ली। वह क्षण जिस में मुझे किसी ने भगवत गीता दी और मैंने इस गीता का स्पर्श किया, वह भगवत गीता यथारूप, वह क्षण मेरी लाइफ का टर्निंग प्वाइंट था। मेरे भाग्य का उदय वहां हुआ।ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोन भाग्यवान् जीव। हम भाग्यवान बनें। भगवान ने हमें भाग्यवान बनाया, हमें हरे कृष्ण भक्तों के संपर्क में लाए। वे हमें गौड़ीय वैष्णवों के संपर्क में लाए। उन्होंने हमें भगवत गीता का उपदेश सुनाया। हमें भगवत गीता ही दी। फिर यह किया , वह किया और प्रसाद भी खिलाया। हमें यात्रा में भी ले गए। कहीं ना कहीं शुरुआत हो जाती है। इसके पीछे भगवान होते हैं। सर्व कारण कारणं। हरि! हरि! वही प्रमुख कारण हैं। हम तो सेकेंडरी कारण हैं। हम भी निमित्त हैं। तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् । मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥ ( श्री मद् भगवतगीता ११.३३) अर्थ:- अतःउठो! लड़ने के लिए तैयार होओ और यश अर्जित करो | अपने शत्रुओं को जीतकर सम्पन्न राज्य का भोग करो | ये सब मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं और हे सव्यसाची! तुम तो युद्ध में केवल निमित्तमात्र हो सकते हो | कृष्ण ने यह सब दिखाया। अभी युद्ध प्रारंभ नहीं हुआ था लेकिन भगवान ने दिखाया। देखो! युद्ध हो रहा है। देखो! क्या क्या हो रहा है? देखो! शत्रु के सैनिक सारे मेरे मुख में प्रवेश कर रहे हैं। देख रहे हो या नहीं? जल कर खाक हो रहे हैं, उनके अंतिम संस्कार हो रहे हैं। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ ( श्रीमद् भगवतगीता ४.८) अनुवाद:- भक्तों का उद्धार करने, दुष्टों का विनाश करने तथा धर्म की फिर से स्थापना करने के लिए मैं हर युग में प्रकट होता हूँ । दुष्टों का विनाश हो रहा है और करने वाला तो मैं ही हूं। मैं ही परित्राणाय साधूनां ही करता हूं और धर्म की स्थापना भी मैं ही करता हूं, सब कुछ करने वाला तो मैं ही हूं, केवल तुम निमित्त बनो। करने वाला तो मैं हूं। तुम सिर्फ क्रेडिट लो। हे अर्जुन! यदि तुम युद्ध नहीं करने वाले हो तो ऐसा नहीं कि युद्ध नहीं होगा। यह तो होकर ही रहेगा। यह मेरी इच्छा है कि तुम जीतो। यह जो युद्ध की योजना बनी है इसके पीछे भगवान ही हैं। भगवान चाहते हैं कि धर्म युद्ध हो और धर्म की स्थापना हो। धर्मराज युधिष्ठिर महाराज इस संसार को प्राप्त हो। यदि अर्जुन युद्ध नहीं करता है तो कोई और करेगा। भगवान किसी और से करवाएंगे। युद्ध तो होकर ही रहेगा लेकिन अर्जुन यदि निमित बनता है तो बढ़िया है। उसको क्रेडिट मिलेगा, उसकी वाह-वाह होगी। उसका गौरव बढ़ेगा। भगवान अपने भक्तों को भी गौरवान्वित देखना चाहते हैं। हरि! हरि! भगवान ने किसी को निमित्त बनाया। वे हमें भगवान के साथ जोड़ रहे हैं। पूरी टीम ही है। अंतरराष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ के कई सारे भक्त है। यह टीम का ही प्रयास है। प्रदर्शक गुरु, शिक्षा गुरु, दीक्षा गुरु, चैत्य गुरु जो कि परमात्मा है। भगवान भी गुरु हैं। वे सारे टीम प्रयास के साथ हमें भक्त बना रहे हैं और भगवान के चरणों में ला रहे हैं। लाए भी हैं और आगे बढ़ा रहे हैं। हरि! हरि! हम इन्हीं प्रयासों के अंतर्गत लगभग पिछले एक महीने से गीता का वितरण कर रहे हैं, गीता का प्रचार कर रहे हैं और गीता पर ही जपा टॉक सुन रहे हैं। भगवान हमें भगवत गीता देने के लिए निमित्त बना रहे हैं कि तुम इसको भगवत गीता दो, तुम उसको भगवत गीता दो अथवा तुम भगवतगीता स्पॉन्सर करो। ऑनलाइन प्रचार हो रहा है। माताएं सर्वत्र जाकर ग्रंथों का बैग लेकर घर घर जा रही हैं, घंटी बजा रही हैं। लोग कुत्तों को उनके पीछे लगा रहे हैं। लेकिन वे उनकी परवाह नहीं कर रही हैं। कहीं कहीं ठंडी है बर्फ गिर रही है। शीत आतप, वात वरिषण, ए दिन यामिनी जागि’रे। विफले सेविनु कृपण दुर्जन, चपल सुख-लव लागि’रे॥ ( वैष्णव भजन) अनुवाद:- मैं दिन-रात जागकर सर्दी-गर्मी, आँधी-तूफान, वर्षा में पीड़ित होता रहा। क्षणभर के सुख हेतु मैंने वयर्थ ही दुष्ट तथा कृपण लोगों की सेवा की। यह सब चिंता नहीं है। शीतोष्ण से परे पहुंचकर भक्त गीता का वितरण कर रहे हैं। गीता का प्रचार- प्रसार कर रहे हैं। भगवान आपको भक्त बना कर निमित्त बना रहे हैं। भगवान यह गीता का संदेश अन्य लोगों अथवा जीवों तक पहुंचाने का कार्य आप से करवा रहे हैं और आप कर भी रहे हो। जब आप ऐसा कार्य करते हो तब आपका कृष्ण के साथ कनेक्शन (संबंध) जुड़ गया। यह भक्ति का कार्य है। हरि! हरि! यह सब करने के लिए, भगवान के लिए भी, कीर्तन के लिए भी धन्यवाद! कीर्तन अर्थात कहना। जो सुना है, उसको समझ के ह्रदयंगम व चिंतन करना अर्थात श्रवण के पश्चात जो साक्षात्कार हुए ,उनको अपने शब्दों में कहना यह कीर्तन है प्रचार है। सुनी हुई बातों का अनुभव किया, साक्षात्कार हुआ। श्रद्धा बढ़ गई। तत्पश्चात श्रद्धा के साथ हम प्रचार करते हैं। वह कीर्तन कहलाता है। कीर्तन से हम और लाभान्वित होते हैं। ओके अब मैं यही विराम देता हूं। हरिबोल! वैसे कई दिन पहले हमने यह तय किया था कि मकर सक्रांति जोकि कल है, तक बुक डिस्ट्रीब्यूशन होता रहेगा ग्रंथ वितरण मैराथन चलता रहेगा और अंतिम जो कुछ दिन हैं अर्थात आज के दिन को सम्मिलित करते हुए दो-तीन दिन आप अपने साक्षात्कार कथाएं या गीता का अध्धयन करते हुए अथवा गीता वितरण करते हुए हुए साक्षात्कारों के विषय में बताएंगे। वैसे हर भक्त का अपना अनुभव होता है। अच्छे, भले, बुरे कैसे कैसे लोग मिलते हैं, आपने उन चुनौतियों का कैसे सामना किया। आप को कैसे सफलता मिली इत्यादि बातें आपको कहनी है। वैसे यह पदमाली को कहना चाहिए था लेकिन मैं ही कह रहा हूं कि आप बीच-बीच में स्कोर भी भेजा करते थे, लिखा करते थे लेकिन अब आप अंतिम रूप से एंड ऑफ द् मैराथन हम आप का फाइनल स्कोर भी सुनना चाहेंगे। आप लिखिए। हम चैट सेशन खोलेंगे। आप उसमें अपने ग्रंथ वितरण का स्कोर लिख सकते हैं। 3 दिन हैं, तत्पश्चात इसके विजेता इत्यादि की घोषणा भी होगी। साथ ही साथ कुछ भक्त संक्षिप्त में अपने अनुभव भी लिख सकते हैं। बोल भी सकते हैं संक्षिप्त में स्पीच दे भी सकते हैं, साक्षात्कार कर सकते हैं। गीता के अध्ययन या श्रवण के समय हुए साक्षात्कार और साथ में गीता वितरण के समय हुए आपके साक्षात्कार का वर्णन करना है। इस प्रकार साक्षात्कारों के दो प्रकार हो सकते हैं। आपमें से कुछ भक्त सुना सकते हैं और कुछ लिख भी सकते हैं। साथ-साथ आपको स्कोर भी लिखना है। ठीक है। हरे कृष्ण! कल से यह जपा टॉक मैं थोड़ा छोटा करूंगा ताकि आपको बोलने का अधिक समय मिले। वैसे थोड़ा समय आज भी है। आज हम आरंभ करते हैं यह कल परसों भी चलेगा। ओके! हरे कृष्ण!

English

13 January 2021 Bhagavad Gita - Krsna’s message to us through a devotee postman Hare Krishna ! Welcome to this Japa Talk. Devotees are chanting with us from 813 locations. Om Namo Bhagavate Vasudevaya ! We must say this at least since because for so many days we are listening to Krsna - Bhagavad Gita. Actually we are relishing Bhagavad Gita. bahūnāṁ janmanām ante jñānavān māṁ prapadyate vāsudevaḥ sarvam iti sa mahātmā su-durlabhaḥ Translation After many births and deaths, he who is actually in knowledge surrenders unto Me, knowing Me to be the cause of all causes and all that is. Such a great soul is very rare. [BG 7.19] Krsna says, “The knowledgeable come to Me.” If he doesn’t come to Krsna then he is full of ignorance. Those who are amateurish don’t take shelter of Krsna, but those who are knowledgeable take shelter of Krsna. This knowledge is full of Bhakti, not the knowledge of the speculators. Knowledge comes from Bhakti or devotional service. This principle is given in Bhagavat. vāsudeve bhagavati bhakti-yogaḥ prayojitaḥ janayaty āśu vairāgyaṁ jñānaṁ ca yad ahaitukam Translation By rendering devotional service unto the Personality of Godhead, Śrī Kṛṣṇa, one immediately acquires causeless knowledge and detachment from the world. [SB1.2.7] Those who render devotional service acquire knowledge and then develop detachment from material attachments. It is said so many times. teṣāṁ satata-yuktānāṁ bhajatāṁ prīti-pūrvakam dadāmi buddhi-yogaṁ taṁ yena mām upayānti te Translation To those who are constantly devoted to serving Me with love, I give the understanding by which they can come to Me. [BG 10.10] • teṣāṁ satata-yuktānāṁ - those who are always engaged serving Me • prīti-pūrvakam - serving Me with love • dadāmi buddhi-yogaṁ taṁ - I give them intelligence • yena mām upayānti te - by which they can come to Me Krsna says, “ One who is engaged in serving Me with love, I give them the intelligence or knowledge to know Me.” And that is very rare. That is why, Krsna says, bahūnāṁ janmanām ante jñānavān māṁ prapadyate When we render devotional service then Krsna gives us intelligence so that we can take His shelter. All knowledge and intelligence comes from Krsna. He gives us knowledge in the form of Bhagavad Gita. In the courtyard of our heart, Krsna is always present. sarvasya cāhaṁ hṛdi sanniviṣṭo mattaḥ smṛtir jñānam apohanaṁ ca vedaiś ca sarvair aham eva vedyo vedānta-kṛd veda-vid eva cāham Translation I am seated in everyone’s heart, and from Me come remembrance, knowledge and forgetfulness. By all the Vedas, I am to be known. Indeed, I am the compiler of Vedānta, and I am the knower of the Vedas. [BG 15.15] He gives us the remembrance to remember Him. If you are remembering the Lord, then it is only by Krsna’s mercy. jñānam apohanaṁ ca means the soul gets remembrance, knowledge and forgetfulness from the Lord. All these living entities who have forgotten the Lord in this material world is actually an arrangement of Krsna. We are not even free to forget the Lord. Only the Lord can make us forget about Him or His Maya does so. Someone says, “ God does not exist”. So the Lord helps one to believe that He doesn’t exist. He makes them believe, “Yes, I do not exist”. antar bahir avasthitam [ŚB 1.8.18] Krsna is situated in Arjuna’s heart as well as present in front of him. He is speaking Bhagavad Gita by standing in front of him and also in his heart. There is no difference. Whether Krsna instructs us by standing in front or from the courtyard of our heart. It is same. Krsna is the same in both the cases. Dhruva Maharaja was reciting om namo bhagavate vasudevaya while performing austerities in Madhuvana in Satyayuga. It was a different age. Now in the age of Kali, the mantra we have to chant, is the Hare Krsna maha-mantra. Hare Krsna Hare Krsna Krsna Krsna Hare Hare Hare Rama Hare Rama Rama Rama Hare Hare He performed severe austerity and showed great renunciation. Krsna was happy with Dhruva’s devotional service. When the Lord appeared in front of Dhruva, he did not open his eyes to see the Lord. He was concentrating on the Paramatma feature of the Lord in his heart. He was not seeing the Lord, so the Lord felt, “Why is he not looking at Me?” The Lord was thinking,“You wanted to meet Me and now I am here”. Then Krsna understood. He is seeing Me, but in the courtyard of his heart. There is no difference between these two situations. The Lord disappeared from the inside. premāñjana-cchurita-bhakti-vilocanena santaḥ sadaiva hṛdayeṣu vilokayanti yaṁ śyāmasundaram acintya-guṇa-svarūpaṁ govindam ādi-puruṣaṁ tam ahaṁ bhajāmi Translation I worship Govinda, the primeval Lord, who is Śyāmasundara, Kṛṣṇa Himself with inconceivable innumerable attributes, whom the pure devotees see in their heart of hearts with the eye of devotion tinged with the salve of love. [BS 5.38] Pure devotees can see the Lord in the courtyard of their hearts. Pure devotees like Dhruva Maharaja, Prahlada Maharaja etc. What is the state of a pure devotee? They see the Lord with the eyes of devotion. Dhruva Maharaja was shedding tears of love for Krsna. When he stopped seeing the Lord in his heart due to Krsna’s will, Dhruva Maharaja immediately opened his eyes,”Where is my Lord? Did I lose my Lord?” And then he saw the beautiful form of the Lord in front of him. It is one and the same thing. When we hear Bhagavad Gita, it's difficult to say who is guiding us - the paramatma in our heart or the Guru in front of us. Yes, this knowledge is heard through disciplic succession. It’s one and the same. As the guru is narrating exactly what Krsna narrated to Arjuna. evaṁ paramparā-prāptam imaṁ rājarṣayo viduḥ sa kāleneha mahatā yogo naṣṭaḥ paran-tapa Translation This supreme science was thus received through the chain of disciplic succession, and the saintly kings understood it in that way. But in course of time the succession was broken, and therefore the science as it is appears to be lost. [BG 4.2] Krsna says, “I instructed this imperishable science of yoga to the sun-god, Vivasvān, and Vivasvān instructed it to Manu, the father of mankind, and Manu in turn instructed it to Ikṣvāku.” It is coming through disciplic succession. The knowledge is the same and the one who is giving this knowledge is also same. The instructions are the same. The one who is imparting this knowledge is not saying something different. He is giving the same instructions which are given by the Lord. We should accept it as ultimately the Lord is instructing us. Do you remember the illiterate brahman of Sri Rangam? Everyone was making fun of him while he would read the Bhagavad Gita in a faulty way. The brāhmaṇa regularly read the eighteen chapters of the Bhagavad Gītā in great transcendental ecstasy, but because he could not pronounce the words correctly, people joked about him. Due to his incorrect pronunciation, people sometimes criticized him and laughed at him, but he did not care. He was full of ecstasy by reading the Bhagavad Gītā and was personally very happy. While reading the book, the brāhmaṇa experienced transcendental bodily transformations. The hairs on his body stood on end, tears welled up in his eyes, and his body trembled and perspired as he read. Seeing this, Śrī Caitanya Mahāprabhu became very happy. Śrī Caitanya Mahāprabhu asked the brāhmaṇ, “My dear sir, why are you in such ecstatic love? Which portion of the Bhagavad Gītā gives you such transcendental pleasure?” Reading is also hearing in a manner of speaking. The transcendental words of Gita emanate from the lotus lips of Krsna only. The medium can be different. sarva-dharmān parityajya -mām ekaṁ śaraṇaṁ vraja_ ahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ Translation Abandon all varieties of religion and just surrender unto Me. I shall deliver you from all sinful reactions. Do not fear. [BG 18.66] This verse is said by the Supreme Personality of Godhead. Then we are reading this in a printed form or we are hearing this from our spiritual masters who are always preaching. yāre dekha, tāre kaha 'kṛṣṇa'-upadeśa āmāra ājñāya guru hañā tāra' ei deśa Translation "Instruct everyone to follow the orders of Lord Śrī Kṛṣṇa as they are given in the Bhagavad-gītā and Śrīmad-Bhāgavatam. In this way become a spiritual master and try to liberate everyone in this land." [CC Madhya 7.128] There is no difference between the source of Bhagavad Gita. The speaker is always Krsna whether you hear it from someone or read it in the book. gītā sugītā kartavyā kim anyaiḥ śāstra-vistaraiḥ yā svayaḿ padmanābhasya mukha-padmād viniḥsṛtā Translation Because Bhagavad Gītā is spoken by the Supreme Personality of Godhead, one need not read any other Vedic literature. One need only attentively and regularly hear and read Bhagavad Gītā. In the present age, people are so absorbed in mundane activities that it is not possible for them to read all the Vedic literatures. But this is not necessary. This one book, Bhagavad Gītā, will suffice, because it is the essence of all Vedic literatures and especially because it is spoken by the Supreme Personality of Godhead. [Gita Mahatmya verse 4] The instructions of the Gita are coming from Lord Krsna only. We may think that this person sitting on the vyasa asana is saying this or someone else is speaking this, but they are just a medium. Like Srila Prabhupada would say,”preachers, siksa gurus, diksa gurus are like postmen.” They deliver the letter as it is from the sender. The postman is there in between, but the letter is still given by the sender only. The message written in that letter is given by the sender and not the postman. The ideal postman never alters or changes the content of the letter as doing so may cost him his job. Then he will not be a good postman. His job is to give that letter as it is. Then we receive it and read it. When the postman doesn’t make any changes in the message of that letter then the source of that letter was, is and always will be the sender. Similarly we are hearing this message of Bhagavad Gita and the siksa gurus never change the message of Bhagavad Gita. The Brahman of Sri Rangam told Caitanya Mahaprabhu that whenever he reads in the Bhagavad Gītā, he can visualise the scene in Kurukshetra where Madhava and Pandava (Krsna and Arjuna) are present on a chariot. senayor ubhayor madhye rathaṁ sthāpaya me ’cyuta yāvad etān nirīkṣe ’haṁ yoddhu-kāmān avasthitān Translation Arjuna said: O infallible one, please draw my chariot between the two armies so that I may see those present here. [BG 1.21] Krsna stops the chariot in between the armies. The scene is mentioned in the first chapter, tataḥ śvetair hayair yukte mahati syandane sthitau mādhavaḥ pāṇḍavaś caiva divyau śaṅkhau pradadhmatuḥ Translation On the other side, both Lord Kṛṣṇa and Arjuna, stationed on a great chariot drawn by white horses, sounded their transcendental conchshells. [BG 1.14] A very special chariot is there which is driven by white horses. Lord Krsna and Arjuna are sitting on that chariot. The brahman is seeing Lord Krsna seated on that chariot and Krsna is giving Arjuna instructions. As long as I read the Bhagavad Gita, I simply see the Lord’s beautiful features. We also read Bhagavad Gita and it is only to remind us of Krsna where Krsna speaks about Himself, like where He resides and all that which we have forgotten about Him. Forgetting Kṛṣṇa, the living entity has been attracted by the external feature from time immemorial. Therefore the illusory energy [māyā] gives him all kinds of miseries in his material existence. The living entity is going from one species to another for so many births. After wandering throughout the entire universe, we came here by Krsna’s mercy. brahmāṇḍa bhramite kona bhāgyavān jīva guru-kṛṣṇa-prasāde pāya bhakti-latā-bīja Translation “According to their karma, all living entities are wandering throughout the entire universe. Some of them are being elevated to the upper planetary systems, and some are going down into the lower planetary systems. Out of many millions of wandering living entities, one who is very fortunate gets an opportunity to associate with a bona fide spiritual master by the grace of Kṛṣṇa. By the mercy of both Kṛṣṇa and the spiritual master, such a person receives the seed of the creeper of devotional service. [CC Madhya 19.151] First Krsna established our relationship with a devotee. He sends a path pradarshak guru (anyone who shows us the path to self realization) in our life. We met devotees. We establish our relationship with the devotee of Krsna somehow, during the book distribution marathon. When one buys a Bhagavad Gita from the devotee that is the turning point in ones life. After a little discussion, I was convinced and I bought it. Devotees are also very expert in persuading people to purchase a Bhagavad Gita. That moment changed my destiny and my good fortune began. Krsna made us fortunate by connecting us with a Hare Krsna devotee or a Gaudiya Vaisnava devotee. Then the sequence of events start to hasten the devotional life of someone like participation in Ratha-yatra, honouring prasada and so on. Krsna does the arrangement. He is behind everything. sarva-kāraṇa-kāraṇam [Bs 5.1] - He is the cause of all causes. We are secondary reasons. We are just instruments. nimitta-matram bhava savya-sacin [BG 11.33] Translation You, O Savyasacin, can be but an Instrument in the fight. Even before the battle started Krsna showed Arjuna how everyone was already being killed. Krsna said, “ See all the sons of Dhṛtarāṣṭra, along with their allied kings, and Bhīṣma, Droṇa, Karṇa – and our chief soldiers also – are already rushing into my fearful mouths. Some are trapped with their heads smashed between My teeth. These great warriors enter blazing into My mouths. It is I who is going to kill everyone. I am the one who protects the devotees and re-establishes the principles of religion. Everything is already done by My arrangement, but you, O Savyasācī, can be but an instrument in the fight. You just take the credit. Although it is I who is the cause of all causes.” Arjuna, you just become the medium and get all the fame by My will. If Arjuna didn’t fight, someone else would’ve fought as the war was inevitable. It is Krsna’s will to make the war happen and establish religion. He wants to establish Yudhishthira as king, but Krsna selected Arjuna as he was Krsna’s pure devotee. If Arjuna fights then he will get all the credit, all the glories. Krsna wants to glorify His devotees. Similarly Krsna makes us the medium to spread His holy names, the entire team of ISKCON - the spiritual master, the preacher, the initiating spiritual master, caitya guru (the paramatma residing in each jiva's heart). Everyone is trying to make devotees. It’s a team effort. They are bringing everyone to the lotus feet of the Lord. In between all these efforts, one effort that we are all making for the past month is book distribution. We are preaching Bhagavad Gita and hearing japa talks on Bhagavad Gita. Every one is engaged in distribution of Bhagavad Gita -no matter what. Krsna has selected you as the medium to spread His message to other conditioned souls. Krsna is inspiring us “Give Bhagavad Gita to some person.” We are just instruments. He inspires others to sponsor Bhagavad Gita. We are going everywhere. Even matajis with book bags are going to each and every home to distribute Bhagavad Gita. People release their dogs who run behind the devotees, but they don’t care and keep on distributing. Somewhere it is too cold, but still they don’t worry and go on their distribution. śīta ātapa bāta bariṣaṇa e dina jāminī jāgi re Translation Both in the day and at night , the heat and cold, the wind and the rain. [Bhajahu re mana verse 2] They are transcendental by rising above all the dualities of the material world and distribute books. The Lord is making you an instrument so that you can distribute this message to more and more people. You are connecting everyone to Krsna. This is devotional service. Thank you for kirtan - hearing, preaching the glories of Bhagavad Gītā. Kirtan means to speak whatever you have heard, you meditate on it and then you absorb it in your heart. Then there is realization. It also increases and deepens our faith and then when you preach or speak, it is called Kirtan. So I will stop here.

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