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Japa talk-18 January 2021 "ॐ अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै शीगुरवे नमः" आप जानते हैं यह प्रार्थना? जिन्होंने हमारी आंखें खोली या हमारी आंखों में प्रेमांजन अथवा ज्ञानांजन डाला ऐसे श्रील प्रभुपाद की जय। समय तो कम है,यहां तक कि मरने के लिए भी समय नहीं है। आज कुछ समय के उपरांत लगभग 7:00 बजे हम संकीर्तन कहानियाँ,संकीर्तन पुस्तक वितरण की कुल संख्या का स्कोर हमारे मंदिर के भक्तों से सुनने वाले हैं।इसलिए मैं कुछ संक्षिप्त में ही कहूंगा।और मैं जो भी कहूंगा सच ही कहूंगा,सच के अलावा मुझे और कुछ भी कहना नहीं आता।अच्छा होता अगर कुछ और कहना नहीं आता तो,लेकिन हम सब बहुत कुशल होते हैं झूठ बोलने में।और हम जो भी बोलते हैं झूठ ही बोलते हैं झूठ के अलावा और कुछ नहीं बोलते ।संसार में ऐसी ठगाई चलती रहती है।इसलिए श्रील प्रभुपाद जी कहा करते थे ठगने वाला और ठगाने वाला,एक ठगाता है और दूसरा ठग जाता है।ठग को कोई महा-ठग मिलता है,और फिर उसको कोई और। हरि हरि। तो हम ऐसे जगत के लोग हैं। तो मैं जब पहली बार श्रील प्रभुपाद से मिला,मतलब श्रील प्रभुपाद को देखा या सुना सबसे पहली बार।श्रील प्रभुपाद मुंबई में थे,गिरगांव चौपाटी में।और आप जानते है? गिरगांव चौपाटी,मरीन ड्राइव और मारबर हिल्स सब पास में ही है।हमारा राधा गोपीनाथ मंदिर भी वहीं पास में ही है गिरगांव चौपाटी के पास। तो वहां पर श्रील प्रभुपाद एक उत्सव में लोगों को संबोधित कर रहे थे,श्रील प्रभुपाद हरे कृष्ण उत्सव मनाने जा रहे थे मुंबई में।1971 की बात है,यह उत्सव क्रॉस मैदान में होना था चर्चगेट के पास मैदान में,लेकिन इस उत्सव के प्रारंभ में एक शोभायात्रा संपन्न होनी थी।शोभा यात्रा का प्रारंभ गिरगांव चौपाटी से होना था।वहां पर श्रील प्रभुपाद बोल रहे थे तो मैं भी वहां पहुंचा था, उस समय मैं विश्वविद्यालय में विद्यार्थी था।मैं उस विज्ञापन को पढ़कर वहां पहुंचा था कि अमेरिकी साधु या यूरोपीय साधु मुंबई पहुंचे हैं।मैं इस बात से आकृष्ट हुआ था कि अमेरिकी साधु या यूरोपीय साधु मुंबई पहुंचे हैं।क्या सचमुच वह साधु है? या ऐसे ही कुछ नौटंकी चल रही है। खैर,ऐसे कहते-कहते मुझे जो कुछ कहना होता है वह भी रह जाता है। तो श्रील प्रभुपाद से मैंने वहां जो बात सुनी,श्रील प्रभुपाद वैकुंठ की बात कर रहे थे।श्रील प्रभुपाद घर वापस जाने की,भगवद्दर्शन की बात कर रहे थे।वैकुंठ का,भगवद्धाम का परिचय और वहां जाना हमारे जीवन का लक्ष्य है यह बातें सुना रहे थे।तो बिल्कुल पहली ही मुलाकात या दर्शन या श्रवण जो मैंने किया श्रील प्रभुपाद से,उसमें चर्चा,दिव्य जगत की हो रही थी वैकुंठ की हो रही थी।हरि हरि।। वैकुंठ के या गोलोंक के ही वह प्रतिनिधि थे।हम उनको आध्यात्मिक जगत के दूत कहते हैं।आध्यात्मिक जगत के राजदूत। तो जितनी चर्चा श्रील प्रभुपाद ने की वैकुंठ के संबंध में।और लिखा भी वैकुंठ के गोलोंक के,वृंदावन के संदर्भ में और वहां पर जाने के संबंध में।प्रभुपाद इस पर जोर दिया करते थे कि हमें वहां पर जाना है ।और फिर यह जोर इसलिए भी क्योंकि ऐसा जोर भगवान ने भी दिया ही है।हम यह चर्चा हमेशा करते आए हैं कि कैसे भगवान भी गीता में अपने धाम का पुनः पुनः जिक्र किया करते हैं और बार-बार हम सभी को प्रेरित या आमंत्रित करते हैं। न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावक: | यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।।(भगवद गीता-15.6) इन शब्दों में कहते हैं मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु | मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे (भगवदगीता-18.65) इन वचनों के माध्यम से पुनः पुनः श्री कृष्ण ने जैसे वैकुंठ लोक, गोलोक,दिव्यलोक की चर्चा की तो श्रील प्रभुपाद ने इन वचनों का प्रचार यथारूप,इसकी ख्याति यथारूप,भगवान ने जैसा कहा है वैसी ही बात,उतना ही जोर अलग-अलग बातों पर दिया। इसलिए उनके प्रचार को,प्रचार यथारूप कह सकते हैं।तो केवल भगवद्गीता ही यथारूप नहीं है ,श्रील प्रभुपाद की हर बात हर प्रचार यथारूप रहा।जैसे होना चाहिए,जैसे भगवान ने कहा हैं।ऐसी चर्चा,लोग,प्रचारक और धर्म के संस्थापक ही कहो जो अलग ही धर्म की स्थापना करते हैं और धर्म के संस्थापक बनते हैं और फिर स्वर्ग की चर्चा करते हैं,स्वर्ग जाने की बातें होती हैं या फिर ब्रह्म में लीन होने की बातें होती हैं।तुम भगवान हो,मैं भगवान हूं और ऐसे कई सारे भगवान भी हमारे देश में गलियों में घूमते रहते हैं।आओ,मैं भी आप को भगवान बना सकता हूं।ऐसी चर्चा,यह मायावाद का प्रचार है। मायावादी कृष्ण अपराधी जो है वो ऐसा प्रचार करते हैं। तो भगवान तो हमको अपने धाम,उनके धाम बुला रहे हैं।अगर हम वासी हैं तो हम वास्तव में तो वैकुंठ वासी हैं,गोलोक वासी हैं,हम ब्रजवासी हैं।तो कृष्ण और कृष्ण के परंपरा में आने वाले आचार्य,उन्होने तो ऐसा ही आमंत्रण भेजा है ऐसे ही आमंत्रित किया है,प्रेरित किया है,घर वापस आ जाओ घर वापस आ जाओ लेकिन ऐसा प्रचार ओर लोग नहीं करते।वैसे आने जाने का प्रश्न ही नहीं है क्योकि यावत् जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा धृतं पिबेत्। भस्मी भूतस्य देहस्य पुनरागमनंकुत:। (चार्वाक-दर्शन) यह भी समस्या है कि चार्वाक हुए और चार्वाक के चेले भी कुछ कम नहीं है इस संसार में।कोई कह सकता है कि चार्वाक तो हिंदू थे,चार्वाक तो भारतीय थे,हमें तुम्हारे चार्वाक से कोई लेना देना नहीं है।हम चार्वाक को नहीं मानते।नहीं मानते होंगे या नहीं जानते होंगे चार्वाक को ।उसका नाम नहीं सुना होगा या उसके तत्वज्ञान को तुमने नहीं सुना होगा पर तुम हो तो पक्के चार्वाक के चेले।क्योंकि चार्वाक ने जैसा कहा है कि जब इस देह का अंत होता है तो सब कुछ खत्म हो जाता है।कुछ शेष नहीं बचता।यह पुनः जन्म वगैरा है ही नहीं।आत्मा है ही नहीं।आत्मा अमर और न जायते म्रियते वा कदाचि नायं भूत्वा भविता वा न भूय: | अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।(भगवदगीता-2.20) जो कृष्ण ने सुनाया है ऐसा कुछ भी नहीं है।श्रील प्रभुपाद मोस्को पहुंचे तो वहां कोटासकवी नाम के एक विश्वविद्यालय के बड़े प्रोफेसर थे तो उनके साथ भी प्रभुपादजी जब बात कर रहे थे तो उन्होंने भी कहा कि स्वामी जी जब शरीर खत्म हो जाता हैं तो सब कुछ खत्म हो जाता है।जब शरीर का अंत हुआ तो समझो सब कुछ अंत हो गया कुछ बचा ही नहीं। तो आजकल ऐसा प्रचार है।हरि हरि।। तो जब कोई मरता है तो लोग समझते हैं कि वह स्वर्गवासी हो गया। उसका चित्र टांग कर भी लिखते हैं स्वर्गवासी फलाना स्वर्गवासी ।तो पता नहीं कि स्वर्गवासी या नर्क वासी।क्योंकि कृष्ण ने तो कहा है कि यह काम,क्रोध,लोभ यह तीन जो शत्रु है यह बद्ध जीवो को परास्त करके नर्क ले जाते हैं।कृष्ण ने कहा है कि ये तीन द्वार हैं,छह भी हो सकते हैं लेकिन उनमें से तीन और भी प्रमुख है तो इन तीनों का जिक्र करते हुए कृष्ण ने कहा है कि यह तीन नरक के द्वार हैं।"काम ,क्रोध,लोभ" आशापाशशतैर्बद्धा: कामक्रोधपरायणा: | ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्जयान् (भगवदगीता-16.12) ऐसा कृष्ण ने कहा है कि इस संसार के जीव आशा के पाश से बद्ध है। सेंकडो,सौ हजार पाश।पाश मतलब रस्सी,डोरी।ऐसी डोरियों से हम बंधे हैं।और वह कठपुतली वाला हमको नचा रहा है।हमारी डोरिंया उनके हाथ में है और काम,क्रोध परायणा।होने तो भक्ति परायन चाहिए।लेकिन कृष्ण कहते हैं कि कलियुग में बद्ध जीव काम और क्रोध में बहुत कुशल है।उनको प्रमाण पत्र भी मिलता है कामी और क्रोधी होने का।और यह सारा फिल्म उद्योग इसी का प्रचार करता है काम और क्रोध का।यह दो ही चीजें चलती है सिनेमा में। काम और क्रोध।कामवासना की तृप्ति जब नहीं होती और वह तो होती ही नहीं है । तो क्या होता है-कामात्क्रोधोऽभिजायते ध्यायतो विषयान्पुंस: सङ्गस्तेषूपजायते | सङ्गात्सञ्जायते काम: कामात्क्रोधोऽभिजायते (भगवदगीता-2.62) तो काम से उत्पन्न होता है क्रोध हरि हरि।। तो इस प्रकार कुछ लोग कहते हैं कि हमारे परिवार के लोग तो स्वर्ग गए या फिर ब्रह्मलीन हुए।मुख्यता इन दो बातों पर जोर दिया जाता है। संसार के लोग समझते हैं और कहते हैं कि फलाने लोग स्वर्गवासी हुए या कुछ कहते हैं कि कैलाश वासी हुए,ब्रह्मलीन हुए।लेकिन हम लोग,गोडिय वैष्णव तो कहते रहते हैं नित्य लीला प्रविष्ठ।गौर किशोर दास बाबाजी महाराज की जय।। जय ओम नित्य लीला प्रविष्ठ।सुन रहे हो?और समझ रहे हो?नित्य लीला प्रविष्ठ।भगवान के नित्य धाम में जो नित्य नीला होती है उस में प्रवेश किया।और प्रवेश करने वाले प्रविष्ठ जो हुए उन श्रील भक्ति विनोद ठाकुर की जय।।गौर किशोर दास बाबा जी महाराज की जय।। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर महाराज की जय।।और जयानंद प्रभु की जय( श्रील प्रभुपादजी के शिष्य)।वह जब नहीं रहे तो श्रील प्रभुपादजी ने कहा कि वह घर वापस चले गए हैं। तो वैकुंठ चलो।। तो श्रील प्रभुपाद ने इस सत्य का प्रचार किया और जब प्रभुपाद ने अपनी पत्रिका प्रारंभ कि 1944 मे तो उसका नाम प्रभुपाद ने दिया "बैक टू गॉड हेड"("भगवत दर्शन") उसको मराठी में हम कहते हैं जाऊ देवा छिया गावा नाम कि पत्रिका। जिसको प्रभुपाद कह रहे हैं कि बैक टू गॉड पत्रिका इस्कॉन कि रीढ की हड्डी है। तो उस पत्रिका को नाम ही दिया प्रभुपाद ने "घर वापसी"। चलो गोलोक चलते हैं।तो ऐसे श्रील प्रभुपाद की जय।क्योंकि जो भगवद्दर्शन है या भगवदगीता है या भागवतम् है या चेतनयचरित्रामृत है या इशोपनिषद है या उपदेशामृत है या भक्ति रसामृत सिंधु है।इतने सारे ग्रंथ प्रभुपाद ने प्रकाशित किए इन सभी में वही संदेश है भगवद्धाम लौटना है,भगवद्धाम लौटना है मतलब भगवत प्राप्ति करनी है और फिर अंततोगत्वा भगवद्धाम लौटना है। हरि हरि।। ठीक है तो अब यहां समाप्त करेंगे। तो ऐसा संदेश जिन ग्रंथों में है "भगवद्धाम लौटने का संदेश"।उसी के संबंधित जो प्रचार है,सत्य है,प्रभुपाद जी ने इन ग्रंथों में सब कुछ भरा है,लिखा है।तो इन ग्रंथों का वितरण होना चाहिए और आपने अभी-अभी इन ग्रंथों का या भगवदगीता का,गीता जयंती होने के कारण खूब प्रचार किया है तो अब हम आपसे सुनना चाहते हैं।

English

18 January 2021 Back to Godhead - the ultimate goal of this life Jai! Around 768 devotees are present today. Hari Hari! om ajnana-timirandhasya jnananjana-salakaya caksur unmilitam yena tasmai shri-gurave namah Translation He who removes darkness of ignorance of the blinded (unenlightened) by applying the ointment(medicine) of (Spiritual) knowledge He Who opens the eyes, salutations unto that holy Guru (Pranam mantra of spiritual master) Do you know this prayer? jnananjana-salakaya. tasmai sri guruve namah. Srila Prabhupada ki Jai ! Prabhupada has opened our eyes by giving us spiritual life. He has kindly applied the medicine (anjan) of knowledge, wisdom and love in our eyes. We are short of time today. Everyone is so busy that they do not even have time to die. Today some time after 7:00am we will hear sankirtana stories , book distribution reports and scores also. Therefore today I will talk in brief, but whatever I say, I will always tell the truth. It would have been nice if we were not able to lie or cheat others. We are all very expert in lying. Whatever we say, is a lie and we do not say anything else other than lies. This type of cheating continuously goes on in this world. Prabhupada said that this world is full of cheaters and the cheated. One person cheats another and the other person is cheated. And then a cheater meets a super cheater. People are like this in this world. I saw Prabhupada for the first time during the Hare Krsna festival in Girgaon Chowpatty, Mumbai. You all know Marine drive and Girgaon Chowpatty Hills are close to it. Our Sri Radha Gopinatha temple is also there near Girgaon Chowpatty. Srila Prabhupada was addressing people during this festival. In 1971 Prabhupada was planning to arrange the 'Hare Krsna Festival' in Mumbai . This festival was arranged at Cross Maidan near Churchgate. Before that a big procession was arranged which started from Girgaon Chowpatty. Srila Prabhupada was speaking at that place. I was a college student at that time. I also reached there after reading an advertisement which said, ‘ American Sadhus are in town. European sadhus have reached Mumbai’. I was attracted by this advertisement. American sadhus and European sadhus are in Mumbai. What does this mean ? I wanted to check whether they are really sadhus or some gimmick is going on. Anyway I will forget what I want to say. I heard something new there. Srila Prabhupada was speaking about Vaikuntha. He was talking about ‘going back home’ ‘back to Godhead.’ He was introducing Vaikuntha and the abode of the Lord to everyone. He was telling everyone that going back to the Lord’s abode should be the goal of our life. The first thing I heard from Prabhupada was about the divine planet of the Lord, Vaikuntha. He was a representative of Goloka Dhama or Vaikuntha. We call him an Ambassador of the spiritual world. Prabhupada has discussed and written a lot about Vaikuntha, the spiritual abode of the Lord, Vrindavan and he gave information on how to go back to Godhead. He emphasised going back to Godhead. This emphasis was because the Lord has also emphasised this. In Bhagavad Gita the Lord has repeatedly mentioned it. The Lord inspires us again and again to go back to Him. na tad bhasayate suryo na sasanko na pavakah yad gatva na nivartante tad dhama paramam mama Translation That abode of Mine is not illumined by the sun or moon, nor by electricity. One who reaches it never returns to this material world. (BG 15.6) The Lord has also said mām evaiṣyasi satyaṁ te man-manā bhava mad-bhakto mad-yājī māṁ namaskuru mām evaiṣyasi satyaṁ te pratijāne priyo ’si me Translation Always think of Me, become My devotee, worship Me and offer your homage unto Me. Thus you will come to Me without fail. I promise you this because you are My very dear friend.(BG 18.65) Being asked various questions, the Lord discussed Vaikuntha and Goloka Dhama. Just like Sri Kṛṣṇa described Vaikuntha and Goloka Dhama , Srila Prabhupada also preached it as it is. Exactly what the Lord has said Srila Prabhupada has repeated with the same emphasis. Therefore Prabhupada’s preaching is as it is. Not only Bhagavad Gita, but every talk of Prabhupada’s or preaching was as it is. It should always be like this. Everything remains the same as told by the Lord. The other preachers or self declared God men establish dharma on their own philosophies.They discuss heaven and inform them how to go to heaven. In other words they discuss about merging into brahma. They say, ‘You are also god’. Such types of so-called self declared God men are wandering the streets in our country. They claim that they can make anybody God. These are impersonalists (Mayavadi). They are Mayavadi Krsna aparadhi and they preach like this. The Lord is always calling us back to His abode. In reality we are Vaikuntha-vasis, Goloka-vasis or Vrindavan-vasis. Hence Kṛṣṇa and His followers have always preached about Vaikuntha and they inspire and motivate others to go back home to Godhead. Other people do not preach like this. They do not have this philosophy of going back to Goloka. ṛṇaṁ kṛtvā ghṛtaṁ pibet  yavaj jīvet sukhaṁ jīvet bhasmī-bhūtasya dehasya  kutah punar āgamano bhavet Translation This theory was that as long as one lives one should eat as much ghee as possible.As soon as your body is burned to ashes after death, everything is finished. (Theory given by Charvak Muni taken from the purport of CC Ādi 7.119) This is known as Charvak theory. There are many followers of Charvak in the world. It is said that Charvak was Hindu or Indian, but now we have nothing to do with Charvak. We do not agree with him. We do not know him. We have never heard his name nor his philosophies. There are many strong believers of his theory. He said that when a person dies everything is finished with death. Rebirth theory and the eternal soul are not existing. The soul is not eternal. na jāyate mriyate vā kadāchin nāyaṁ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ ajo nityaḥ śhāśhvato ’yaṁ purāṇo na hanyate hanyamāne śharīre Translation For the soul there is neither birth nor death at any time. He has not come into being, does not come into being, and will not come into being. He is unborn, eternal, ever-existing and primeval. He is not slain when the body is slain. (BG 2.20) Kṛṣṇa has said this about the soul, but Charvak propagated that this does not exist. When Prabhupada was discussing this with a renowned professor from Moscow, he also said to Prabhupada, ‘Swamiji, when the body is finished everything is finished.’ Nothing remains after the body is dead. This was preached everywhere. When someone dies, people make a frame of his photograph and below they write swargvasi (now residing in heaven). No one knows whether he is residing in heaven or hell. Kṛṣṇa has said that our three enemies lust, anger and greed defeat the conditioned souls and take them to hell. These three are the main entrance gates for hell. In total there are six. The other three are also important. But as Kṛṣṇa has said these three are the main entrance to hell. cintām aparimeyāṁ ca pralayāntām upāśritāḥ kāmopabhoga-paramā etāvad iti niścitāḥ āśā-pāśa-śatair baddhāḥ kāma-krodha-parāyaṇāḥ īhante kāma-bhogārtham anyāyenārtha-sañcayān Translation They believe that to gratify the senses is there prime necessity of human civilization. Thus until the end of life their anxiety is immeasurable. Bound by a network of hundreds of thousands of desires and absorbed in lust and anger, they secure money by illegal means for sense gratification. (BG 16.11 and 16.12) There are hundreds of desires in human life, hundreds and thousands of bindings. We are tied by these bindings like a puppet and the ropes of these are in the hands of the puppeteer. We are supposed to be always mentally situated in devotional service to the Lord, but Kṛṣṇa says that specially in Kaliyuga people are always situated in thoughts of lust and anger. They are experts in lust and anger. They get certificates for being lusty and greedy. The film industry is always propagating lust and anger. These two topics goes on in the movies. dhyayato visayan pumsah sangas tesupajayate sangat sanjayate kamah kamat krodho 'bhijayate Translation While contemplating the objects of the senses, a person develops attachment for them, and from such attachment lust develops, and from lust anger arises. (BG 2.62) Lust is never satisfied and then develops anger. Some people always say that a family member of our family has gone to heaven or merged in Brahman after death. Basically these two principles are accepted everywhere. The people of this world say that a person in our family is now residing in heaven or a few say that he is now residing in Kailasa (abode of Mahadev ) or a few say that he is merged in Brahman. But we Gaudiya Vaisnavas always keep on saying jai om visnupad nitya lila pravishta — Gaur Kishore Das Babaji Maharaj ki Jai. ! jai om nitya lila pravishta — are you understanding this ? What does this mean ? We say all glories to those who have entered in the eternal pastimes of the Lord. Nitya Lila Pravishta Bhakti Vinod Thakua Maharaja ki Jai ! Gaur Kishore Das Babaji Maharaja ki Jai ! Srila Bhakti Sidhant Saraswati Thakura ki Jai ! Jayanand Prabhu ki Jai !! He was a disciple of Srila Prabhupada. When he left his body Prabhupada had said that he had gone back to God. Srila Prabhupada has preached the truth ‘let us go to Vaikuntha’. When Prabhupada started printing his journal in 1944 he named it Back to Godhead. In Marathi we say 'jau devachiya gava' journal. This is published. Prabhupada said Back to Godhead magazine is back home. Prabhupada named that magazine Back to Home. Let us go to Vaikuntha or Goloka. Srila Prabhupada ki Jai ! Prabhupada has published many scriptures like Bhagavad Gita, Bhagavatam, Caitanya-caritamrta, Isopanisad, Updeshamrita , Nectar of Devotion along with Back to Godhead magazine. All these books give the same message that we should return to Godhead. It means we should achieve the love for the Lord in our lifetime and at the end of our life we should go back to Godhead. We should stop here. We should distribute the books which give this message of the abode of the Lord and information related to this. Just now you have preached about Bhagavad Gita on the occasion of Gita Jayanti. Now I want to hear from all of you your experiences and realisations and scores. We will hear from the full time devotees of our temples.

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