Srimad Bhagavatam 10.52.23
20-05-2024
ISKCON Delhi
हरि हरि! रुक्मिणी मैया की जय!
आज है रुक्मिणी द्वादशी महोत्सव, कल त्रयोदशी और परसों कौन सी चतुर्दशी? नरसिंह चतुर्दशी। फिर कौन सी पूर्णिमा? गौर पूर्णिमा, लाइक दैट, कई सारी या सभी तिथियां कवर हो चुकी हैं, कृष्ण अष्टमी, रामनवमी, इत्यादि इत्यादि। “सम्भवामि युगे युगे”, केवल भगवान ही प्रकट नहीं होते, भगवान की शक्तियां भी प्रकट होती हैं, कई सारे व्यक्तित्व भी प्रकट होते हैं, कई सारे भक्त प्रकट होते हैं। उन सभी भक्तों में, शक्तियों में, रुक्मिणी एक विशेष शक्ति हैं भगवान की आह्लादिनी शक्ति – “प्रणय विकृति आह्लादिनी शक्ति अस्मात।” तो वृंदावन में वो शक्ति है, आह्लादिनी शक्ति है, कौन? जय श्री राधे! राधा रानी भी है, चंद्रावली भी है, अष्ट सखियां हैं।
हरि हरि! और असंख्य गोपियां भी हैं। इन गोपियों ने मिलकर , ये कथा प्रारंभ हो गई वैसे, कात्यायनी से प्रार्थना भी की थी – “नंद गोप सुतं देवि पति मे कुरुते नमः”, प्रार्थनाओं में प्रार्थनाओं में और कई सारी प्रार्थनाएं तो हुई ही। कात्यायनी की गौरव गाथा का गान करती हुई गोपियां प्रार्थना कर रही थीं। उन प्रार्थनाओं का सार कहो , क्या था? “हे देवी कात्यायनी! पति मे कुरुते नमः,हमें पति रूप में प्राप्त हो, कौन ? नंद गोप सुतं ,नंद गोप के जो सुत है/ पुत्र है/ नंदनंदन हमें पति रूप में प्राप्त हों। ऐसी प्रार्थना पूरे एक मार्गशीर्ष मास में कर रही थीं। तो भगवान ये प्रार्थना सुनकर वृंदावन में ही एक प्रकार से उनके पति बने हैं। राधा पति कृष्ण उनको कहा जाता है, राधा पति, गोपी पति। किंतु उनकी यह जो प्रार्थना है भगवान ने सुनी है और वे अभी पति बनने वाले हैं सारी गोपियों के। सारी के तो नहीं, उसमें से 16108 गोपियों के पति बनेंगे, 16108 पत्नियां होंगी द्वारका में, द्वारकाधीश की जय! इन अष्ट सखियों में भी जो श्रेष्ठ सखी, राधा सखी और चंद्रावली इनको भी भगवान की पत्नी होने का या द्वारका में उनकी पत्नी होने का अवसर प्रदान किए द्वारकाधीश। वह तो चंद्रावली थी वो द्वारका लीला में बन जाती है रुक्मिणी, रुक्मिणी मैया की जय! राधा रानी बनती है सत्यभामा, लाइक देट। आठ विशेष रानियां रही, पटरानियां और पटरानियों में वैसे रुक्मिणी का नाम प्रमुख नाम है। रानियों में श्रेष्ठ रानी रुक्मिणी मैया की जय! उनके साथ एक और फिर सेवन मोर, आठ विशेष रानियां द्वारका में रही। और बच गई कितनी? 16100। तो आठ में वैसे जांबवती भी है,कल्याणी भी है, सत्या है, लक्ष्मणा है, छ: तो मैंने नाम कहे ही हैं, टू मोर। रिमेनिंग जो 16100 रानियां जो बनी उन्होंने राजपुत्रियों के रूप में जन्म लिया था अलग-अलग स्थानों पर और भौमासुर ने इन राजपुत्रियों का अपहरण करके उनको कारागार में रखा था, कैदी बनाया था। भगवान जब प्राग़ज्योतिषपुर जाते हैं, जो भौमासुर का कैपिटल टाउन ,जो आसाम स्टेट की ओर था। भगवान वहां जाते हैं और वहां पर मुरारी बनते हैं, मुरारी। मुर नाम का एक असुर जो भौमासुर का बॉडीगार्ड/ राक्षस था भगवान ने उसको गेट आउट करके लिटा दिया और भौमासुर का भी वध किया। तदुपरांत उन सारी राजपुत्रियों को मुक्त किए भगवान। फिर उन सभी ने निवेदन किया अब हमें कौन स्वीकार करेगा आपके अलावा प्रभु? प्रभु! आप हमारा स्वीकार कीजिए। वैसे तो ये सब प्रार्थना कर चुकी थी ‘ “नंद गोपसुतम देवी पतिम मे कुरते नमः” तो वही पुनः निवेदन किया है
16100 राज पुत्रियों ने, तो भगवान ने उनको स्वीकार किया। एंगेजमेंट/ रिंग सेरेमनी कहो, वहां संपन्न होती है, नो फॉर्मेलिटी, पर स्वीकार किए। भगवान में उन सबको पालकियों इत्यादि वाहन/ साधनों से आसाम प्रागज्योतिषपुर से द्वारका के लिए रवाना किया, उनको भेज दिए और भगवान उस समय वैसे स्वर्ग गए थे। आई विल नॉट से मोर। तो इस प्रकार सोलह हजार, हरि हरि बोल! आपको कोई चिंता नहीं है? कृष्ण का जो भी हो, रानियों का जो भी हुआ, हम तो थोड़ा आराम कर लेते हैं, लेट्स रिलैक्स। इन सभी 16,108 के अलग-अलग स्थानों पर जन्म हुए हैं, आ डोंट नो इसका इतिहास/ हिस्ट्री वर्णन कहीं न कहीं होगा ही, इट्स नॉट ऑवर सब्जेक्ट मैटर, ना तो मैं जानता हूं। किंतु उनमें से रुक्मिणी का तो पता है ही जो कुंडलपुर में या विदर्भ से थीं। नागपुर का नाम सुने हो? नागपुर..कुछ तो नाम आपको पता होना चाहिए ताकि उस संबंध में आप फिर सोच सकते हो। नागपुर से ज्यादा दूर नहीं है। वर्धा का नाम आप सुने हो जहाँ विनोबा भावे भी रहते थे एक समय। विनोबा आश्रम में श्री प्रभुपाद गए थे। तो वहां से पास ही यह कुण्डिनपुर नाम की स्थली आज भी है। यहां पर आज के दिन रुक्मिणी मैया का जन्म हुआ था। आप खुश हो?हरि बोल! फिर आप कुछ रुक्मिणी के लगते होंगे और उस कुण्डिनपुर में दैट कनेक्शन है, इस्कॉन कुण्डिनपुर की जय! यह कुण्डिनपुर समझ गए आप की महाराष्ट्र में है, मेरे प्रचार क्षेत्र में भी वह कुण्डिनपुर है और वहां इस्कॉन कुण्डिनपुर भी है। हमने जो भूमि प्राप्त की है इस्कॉन के लिए, उसी स्थान से रुक्मिणी का हरण हुआ होगा। रुक्मिणी का हरण- आज तो जन्म की बात चल रही है, हरण की बात होनी तो चाहिए भी नहीं। लेकिन मैंने रुक्मिणी हरण की बात का उल्लेख भी कर दिया। हमने जो भूमि प्राप्त की कई साल पहले…ज्यादा नहीं कहेंगे पर इतना जरूर कहेंगे कि वहां पांच कदंब के वृक्ष थे जब हमने भूमि को प्राप्त किया। बहुत समय से या प्राचीन काल से या कृष्ण के समय से पांच कदम के वृक्ष वहां हैं। कृष्ण जब रुक्मिणी हरण के लीला के लिए गए थे, तो रुक्मिणी ने वहां मीटिंग पॉइंट भी बताया था। रुक्मिणी ने जो पत्र लिखा था, जो सेवन पैराग्राफ वाला पत्र है, हरि हरि। रुक्मिणी अपने पिताश्री के महल से उस दिन पुनः वहां देवी के दर्शन और प्रार्थना के लिए जाने वाली थी विवाह के दिन और फिर जब वो पुन: लौटेगी, ऑन द वे बैक टू द पैलेस, तो पत्र में लिखे थे वहां पर, देवी के मंदिर और महल के मध्य में आप आ जाना, मैं आपकी प्रतीक्षा करूंगी। जैसे पूर्व नियोजित मीटिंग पॉइंट के अनुसार मीटिंग हुई, रुक्मिणी का अपहरण हुआ और जहां ये अपहरण हुआ वहीं पर संभावना है या निश्चित ही है कि कृष्ण कदम के फूलों की माला पहने हुए थे। उसमें से कुछ फूल वहां गिर गए, तो फूल में जो बीज होते हैं फिर वे उग आए और वही तो है यह कदम के वृक्ष, हरि हरि बोल! भगवान अब मथुरा में ही थे फिर यदुवंशियों को उन्हें ट्रांसफर करना पड़ा द्वारका में, फट से फिर लोकेशन भेजा। एटींथ टाइम्स भगवान जब युद्ध खेल जा रहे थे, जरासंध के साथ खेलने जा रहे थे, तैयारी तो थी ही लेकिन खेले नहीं,भगवान युद्ध नहीं खेले। भगवान युद्ध खेलते हैं, पहले वैसे युद्ध खेले जाते थे। हमने सुना-पढ़ा कि जैसे रेसलिंग मैच जब होती है तो कई सारे लोग देखने के लिए आते हैं, वैसा प्राचीन काल के युद्ध, जो धर्म युद्ध हुआ करते थे उसको देखने के लिए कई सारे लोग एकत्रित होते थे। वे जानते थे कि ये धर्म युद्ध है, हमें पर गोली या फिर बाण नहीं चलाएगा कोई। जस्ट एजॉय द बैटल/ प्ले/ कंपटीशन। वैसे कृष्ण जो भी करते हैं, खेलते हैं वे पास्ट टाइम्स हैं। प्ले फॉर द प्लेजर ऑफ द लॉर्ड। 18वीं टाइम भगवान युद्ध खेलने के बजाय, द्वारका की ओर दौड़ने लगे। उस समय जरासंध कहने लगा,” ए डरपोक कहीं का, रणछोड़ रणछोड़! रण छोड़ रहा है, हमसे डर गया।” भगवान का उस समय द्वारका के लिए प्रस्थान करने के पीछे यह भी उद्देश्य था कि वे जानते थे रुक्मिणी की उम्र बढ़ चुकी है, उसके विवाह का समय आ चुका है, उसका विवाह मेरे साथ ही होना है, तो मैं यहां क्या कर रहा हूं? आई बैटर गो, तो भगवान बलराम के साथ द्वारका के लिए प्रस्थान करते हैं। रुक्मिणी वाज़ ऑन हिज माइंड ,जब मथुरा से द्वारका जा रहे थे। अब तक बड़े भाई का विवाह नहीं हुआ था, कृष्ण तो यहां रामानुज है। कृष्ण कैसे हैं? राम अनुज, ‘अनु’ मतलब पश्चात या बाद में, ’ज’ मतलब जन्म लेना,रामानुज। तो वसुदेव देवकी के सातवें पुत्र बलराम और आठवें कृष्ण, तो कृष्ण हो गए रामानुज।
तो बलराम का पहला विवाह हो जाता है रेवती मैया के साथ, रेवत राजा की पुत्री रेवती से बलराम का विवाह होता है।सो दैट इज़ आउट ऑफ द वे। भगवान के विवाह का मार्ग अब खुल गया बलराम के विवाह होने के उपरांत। तो यहां, आज के दिन जन्मी..आई थिंक आई ऐम नॉट डीलिंग विथ दिस, मार्ग में कही पहुंच जाएंगे वहां तक। यह सारी कथा शुकदेव गोस्वामी राजा परीक्षित को गंगा के तट पर सुना ही रहे थे ,पूर्वार्ध हो चुका है। वृंदावन मथुरा की लीलाएं/ कथाएं यह पूर्वार्ध है, अब उत्तरार्ध में कृष्ण की द्वारका लीलाओं का वर्णन प्रारंभ होने जा रहा है। “राक्षसेन विधानेंन उपायेंम इति श्रुतं” राजा परीक्षित कहे,” हमें सुना है कि द्वारकाधीश ने अपना विवाह कैसे विधान से किया? राक्षसेन विधानेन मतलब अपहरण करना दुल्हन का और फिर विवाह करना। विवाहों की भी कई प्रकार है, यह वैसे विपरीत ही प्रकार है तो उस प्रकार का अवलंबन करना पड़ा कृष्ण को। यह जिज्ञासा जब हुई “ अथातो ब्रह्म जिज्ञासा” राजा परीक्षित को, इसके उत्तर में अब शुक उवाच, शुकदेव गोस्वामी जी अब उत्तर देने वाले हैं। ये उत्तर वैसे तीन एक अध्यायों में इसका उत्तर होगा और उसी के अंतर्गत रुक्मणी के जन्म की कथा अभी है। “राजा आसीत भीष्मको नाम” कथा प्रारंभ हो गई,एक थे राजा, कौन थे? राजा भीष्मक। कहां के राजा थे? विदर्भ पतिर महान। उनके पांच पुत्र थे, पुत्री एक ही थी। कैसी थी? वर आनना, सुंदर मुखमंडल वाली, विशेष सौंदर्य की खान को थी। उनका नाम कहते कहते साथ में हल्का सा वर्णन भी कर रहे हैं। रुक्मणी का आंखें तो “सोपश्रुत्य मुकुंदस्य रूपवीर्य गुणाश्रिय:” ये शुरुआत में ही शुकदेव गोस्वामी ने सुनाया है। यह सारी कथा समरी है, संक्षिप्त में है या पूरा महाभारत विस्तार से है, नाउ रिलैक्स, टेक इट ईज़ी। ऐसा नहीं है यहां, यह संक्षेप में है कथा। तो जन्म भी हुआ, इतने पुत्र थे,एक पुत्री भी थी और पुत्री का वैशिष्ट्य भी सुन रहे हैं। यह पुत्री क्या किया करती थी? मुकुंद के रूप,लीला, गुण, धाम का वर्णन सुना करती थी। किनसे? “गृह आगते “ गृह नहीं उनके महल में आने वाले परिव्राजकाचार्य परिभ्रमण करने हुए पहुंचने वाले महात्मा जो मुकुंद की कथा सुनाया करते थे क्योंकि यह राजा भीष्मक, राजऋषि थे याने राजा और ऋषि जब साथ में होते हैं। ऋषियों और मुनियों के आदेश अनुसार ,उपदेश अनुसार जब राजा कार्यभार संभालते हैं, उनकी टीम बन जाती है, तो ऐसे राजा को राजऋषि कहते हैं, ही वाज़ अ सेंटली किंग। उनके दरबार में सारे सेंट्स , संत ,महात्मा आया करते थे और जब संत महात्मा आते हैं तो वे क्या करते हैं? “सत्ताम प्रसंगात ममवीर्य संविदाे “ शुरूआत हो गई संत आते ही बस “बोधयंतः परस्परम् “ संतों का, भक्तों का परिचय देते हुए कृष्ण ने भी गीता में कहा, मेरे भक्ति ऐसे व्यस्त रहते हैं। तो ऐसे महात्मा जो आया करते थे वे भगवान मुकुंद के रूप ,गुण,लीला का वर्णन किया करते थे। तो वहां पर यह बाल रुक्मणी/ बालिका रुक्मणी भी वहां बैठकर उन कथाओं का बड़ा ध्यानपूर्वक श्रवण किया करती थी। “सा उपश्रुतय” वह सुना करती थी, तो हुआ क्या?
“तम मेने सदृशम पतिम” उसने अपना मन बना लिया कि यदि मेरा विवाह होता है और होगा ही, दैर इज़ नो इफ्स एंड बट्स। मेरा विवाह तो होना ही है, तो “सदृश्य पतिम” मेरे पति वैसे ही होंगे , ऐसे गुण वाले होंगे मतलब वे ही होंगे ऐसा मन बना लिया। हरि हरि! वो थी बालिका अभी धीरे-धीरे वह युवती बन चुकी है। विवाह के लिए पति को खोज भी रहे हैं घरवाले, वे सभी जानते हैं रुक्मणी की मनोकामना क्या है? उसका मनोभीष्ट क्या है? तो भी जो बड़ा भाई रुक्मी, उसका कुछ और ही विचार था। मेरी बहन का विवाह होगा तो शिशुपाल के साथ होगा, व्हाट अ चॉइस? रुक्मणी जिनके साथ विवाह करना है चाहती थी उनके कट्टर शत्रु, एनीमी नंबर १ का चयन इस रुक्मी ने किया रुक्मणी के विवाह हेतु। पिताश्री ऐसा चाहते तो नहीं थे, वे जानते थे कि रुक्मिणी किससे विवाह करना चाहती है। उनकी स्थिति वैसे तुलना तो नहीं की जा सकती, किंतु धृतराष्ट्र भी जानते थे कई बार कि विदुर जी जो कह रहे हैं वह बातें सही है। किंतु वे इतने आसक्त थे दुर्योधन से, दुर्योधन की बातों का विरोध नहीं कर पाते थे। तो इस प्रकार ऐसा ही कुछ यहां हो रहा है, पिताजी को भी मानना पड़ा “अनिच्छन अपि”, राजा भीष्मक स्वयं नहीं चाहते हुए भी, रुक्मी चाहता है इसलिए दे आर गोइंग अलोंग। विवाह की तैयारी भी हो रही है, मैच मेकिंग हो चुका है, घोषणा हो चुकी है चेदी के राजा, दमघोष के पुत्र शिशुपाल के साथ रुक्मणी का विवाह होगा। मैरिज इनविटेशन कार्ड प्रिंटेड एंड सर्कुलेटेड, सर्वत्र प्रमोशन चुका है, तैयारी हो चुकी है। तब रुक्मिणी सोच रही है व्हॉट कुड आई डू नाउ? भगवान ने बुद्धि दी होगी, “ददामि बुद्धि योगं” वो ब्राह्मण है ना, उसको भेजो संदेश के साथ,उसको मेरे पास भेजो। तो फिर रुक्मणी बैठती है एंड शी राइटस अ लेटर, लव लेटर कहो या प्रेम पत्र। 7 पैराग्राफ हैं इस पत्र में या सेवन कांसेप्ट्स/ वाक्य/ कहो, कंपाउंड सेंटेंस हैं जिसमें से पहला है “श्रुत्वा ग़ुणान भुवन सुंदर” वेरी फेमस स्टेटमेंट , इसमें अपने अनुभव की बात बता रही है। रुक्मणी जो सुना करती थी उसी का उस पत्र में उल्लेख कर रही है, आपके संबंध में श्रुत्वा,किसका श्रुत्वा ? गुण को, लीला को, धाम को। हे भुवनसुंदर आपके गुण, लीला, धाम का वर्णन जब से मैंने सुना है, सुनना प्रारंभ किया, तो क्या हुआ? “निर्विष कर्ण विवरै” यह सब वर्णन मेरे कानों से मेरे हृदय प्रांगण में पहुंचा और वही पर आपका मेरा मिलन भी हुआ। वह लीला कथा आप ही हो तो मैं मिली आपसे वहां पर। वह बोली, “हरतो अंग तापम “। “तव कथामृतं तप्त जीवनम” यह जो गोपियों ने कहा है गोपी गीत में ,वही विचार/वही भाव यहां रुक्मणी भी व्यक्त कर रही है। हरतो अंग तपम,
“तप्त जीवनम् श्रवण मंगलम श्रीमदा तत्म भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जाना:”
ऐसे नाम,रूप, गुण, लीला का वर्णन करने वाले जो हैं वे कौन है? भूरिदा ,वे दयालु है दे आर मोस्ट मैग्नेनिमस, ऐसे गोपियों ने कहा जिनका नेतृत्व राधा रानी भी कर रही है। तो वहां पर चंद्रावली भी जरूर थी ही, गोपीगीत जब गाया जा रहा था चंद्रावली भी वहां थी। तो वही चंद्रवली अब बनी है रुक्मणी। वहां के गोपियों के भाव, गोपी गीत के, यहां भी व्यक्त हो रहे हैं/ प्रकट हो रहे हैं। “कर्ण विवरै हरतो अंग तापौ” और जब से आपके नाम रूप गुण लीला का मैंने श्रवण किया है तो क्या हुआ है? “मत चित्त:” मेरा चित्त आपमें लगा हुआ है या चिपका हुआ है,आई ऐम ग्लूड डाउन टू यू माई लॉर्ड। जैसे ग्लू होता है न जो चिपकता है,वैसे ही मेरा चित् आप में लगा हुआ है। यह पत्र की शुरुआत है, यह पत्र लेकर जब ब्राह्मण देवता पहुंच जाते हैं, द्वारका धाम की जय! और द्वारकाधीश से मिलते हैं तो खूब आतिथ्य होता है उस ब्राह्मण का, पाद प्रक्षालन इत्यादि भी होता है। दिस इज़ कृष्णा,दिस इज़ द्वारकाधीश। ऐसे आदर्श सभी के समक्ष भगवान भी रखे हैं। भगवान बोले, “मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूं? सब ठीक-ठाक तो है न कुण्डिनपुर में?” वैसे वे जानते हैं कि ठीक-ठाक नहीं है, दिस इज़ कृष्णा। तो इस ब्राह्मण देवता ने रुक्मणी का पत्र पढ़कर सुनाया कृष्ण को और जैसे ही पत्र पढ़ना समाप्त होता है तो पता है कृष्ण क्या कहे? कृष्ण कहते हैं, “तथा अहम अपि तत्चित्तो निद्राम च न लभे निशि“ क्योंकि रुक्मिणी ने लिखा था अपने पत्र में कि मेरा चित्त बस आप में लगा हुआ है प्रभु। तो अब द्वारकाधीश क्या कह रहे? “ओह मेरा हाल भी वही है, मेरा हाल भी वही है। मेरा चित्त भी रुक्मिणी में लगा हुआ है। तथा अहमपि तत्चित्तो”,
दोनों की बराबरी हो गई। दे आर द मैच, सेम वेवलेंथ विचारों की। कृष्ण आगे कहते हैं, “इतना चित्त लगा हुआ है मेरा रुक्मिणी में कि रात्रि के समय, “निंद्रा न लभे”। मै पलंग पर लेट तो जाता हूं, लेकिन पूरी रात नींद नहीं आती, रुक्मिणी की यादें मुझे सताती हैं। हरि हरि! कृष्ण को ऐसा नहीं कहना चाहिए था। रुक्मिणी ने तो कहा कि अब मैं निर्लज्ज हो चुकी हूं, मुझे कोई लज्जा नहीं है। पहले तो मैं छिपाया करती थी मेरा प्रेम किंतु अब तो ऐसा समय आ चुका है, आई डोंट केयर। उसी प्रकार कृष्ण कह तो नहीं रहे हैं लेकिन जिस प्रकार से वो बात कर रहे हैं मानो उनको भी लज्जा नहीं आ रही है ये कहने में कि मुझे रात्रि के समय नींद नहीं आती, क्यों? रुक्मिणी की यादें सताती है। भगवान ने घोषित किया यहां कहकर। कहीं पर तो कहके भी कहे हैं कि,” प्लीज़ डोंट नोट दिस डाउन, ओके। इट्स बिटवीन यू एंड मी। आप और हम दोनों के बीच की बात है।” ऐसे कुछ यहां नहीं कहे, दैर इज़ नो फुटनोट। वैसे भगवान चाहते थे कि दुनिया को पता लगने दो,मेरा जो रुक्मिणी के जो प्रेम है उसकी घोषणा करो, लेट द वर्ल्ड नो। हरि हरि! हरे कृष्ण ! फिर भगवान तैयार होते हैं, लेट्स गो,चलते हैं कुण्डिनपुर के लिए, रथ तैयार होता है, स्वयं बैठे हैं। ये ब्राह्मण देवता पता नहीं कैसे, पदयात्रा करते हुए गए होंगे द्वारका। लेकिन जाते वक्त, अब तो रथ मै आरूढ़ है द्वारकाधीश के साथ। तूफान की तरह सायंकाल को प्रस्थान किए द्वारका से, नेक्स्ट मॉर्निंग पहुंच गए कुण्डिनपुर, वैसे एक मेल भी है तूफान मेल,तेजी से दौड़ने वाली तूफान मेल। नेक्स्ट मॉर्निंग जब बलराम जग जाते है द्वारका में तो पहुंचे होंगे द्वारकाधीश के महल पर, बेल बजाई। नो-रिस्पॉन्स, द्वारकाधीश… नो रिस्पॉन्स। तब बलराम सोचे “ आह वे गए होंगे, कुण्डिनपुर ही गए होंगे”, सब जानते है बलराम और वहां मैरिज किनके साथ होना है, यह बलराम को पता है। वहाँ युद्ध होने के संभावना है, यह भी जानते है बलराम और उन्हें ही पता लगवाया कि कृष्ण तो अकेले ही है। बलराम क्या करते है? छोटी सी सेना लेके, ही रशड। कुण्डिनपुर के लिए प्रस्थान किए और वहां राजा भीष्मक ने कृष्ण और बलराम की अगवानी की और भव्य- दिव्य स्वागत किया हुआ है। कृष्ण बलराम की है! कृष्ण बलराम इन कुण्डिनपुर और वहां बाराती बनके कहो, ऑन इनविटेशन। राजा भीष्म की पुत्री का विवाह होना है तो सारे विदर्भ देश की, प्रदेश की जनता वहां एकत्रित हुई, कई सारे और भी राजा-महाराजा आज वहां पहुंचे है। शुकदेव गोस्वामी वर्णन करते है, “कृष्ण आगमनम आकरण्य”, कृष्ण और बलराम आए हुए है इस बात का पता चला तो वैसे विवाह के लिए तो उनको आना था ही और कृष्ण बलराम भी आए है, तो बड़ी संख्या में मे लोग वहां पहुंचे है और वे क्या करते हैं? “विदर्भपुर वासिन: आगत नेत्रांजलिभी: वपुस्तन मुखपंकजम” क्या करने लगे? कृष्ण बलराम के सौंदर्य का सभी पान करने लगे या जिस प्रकार से वर्णन किया है वहां के लोगों ने अपने आंखों के प्याले बनाए, प्याला समझते हो? जैसे आप लोग प्याले भर-भर के खीर, प्याले के बाद प्याला खाली कर देते हो, परोसने वाला को, “ए मोरे”। तो ये विदर्भ वासी कृष्ण-बलराम के सौंदर्य का पान व प्याले भर-भर के कर रहे थे,पी रहे थे, तृप्त हो रहे थे,अपने जीवन को सफल बना रहे थे। ओके! अब तो वैसे रुक्मिणी को पता चला है,थोड़ा विस्तार से वर्णन है। वह प्रतीक्षा कर रही थी कि क्यों नहीं आ रहे ?क्यों नहीं आ रहे कृष्ण? क्योंकि ब्राह्मण देवता नहीं पहुंचे। अंततोगत्वा ब्राह्मण देवता के साथ उसकी मुलाकात हुई, तो फिर तैयार करती हैं वहां जाने के लिए, कहां? देवी की पूजा के लिए जायेगी। कई सारे पुरोहित है, मंत्रों का उच्चारण हो रहा है, रुक्मिणी इज़ इन फॉर फ्रंट,अपनी थाली वगैरह साथ में लेकर धूप, दीप, नैवेद्य, चंदन। पुन: शुकदेव गोस्वामी वर्णन करते हैं,
“पद्मघ्याम किनी ययो दृष्टं भवान्या पाद पल्लव
मुकुंद पान चरणम भुजं सा च अनु ध्यायति सम्यक”
शुकदेव कह रहे हैं कि रुक्मिणी अपने चरणों से चलती हुई, कहां जा रही थी? देवी के चरणों की ओर,अपने चरणों से चलती हुई जा रही थी, तब कृष्ण के चरण कमलों का ध्यान कर रही थी। तीन चरण कमल, जा रही है देवी के चरणों की ओर, कैसे जा रही है? अपने चरणों से चलती हुई जा रही है, तब कौन से चरणों का स्मरण कर रही है? कृष्ण के चरणों का स्मरण कर रही है, द्वारकाधीश के चरणों का स्मरण कर रही है। देवी के मंदिर में पहुंच कर, सेम प्रेयर हैज बीन रिपीटेड ल, जो प्रार्थनाएं गोपियों ने कात्यानी देवी को की थी चीरघाट पर, यमुना के तट पर। वैसे कुण्डिनपुर में भी नदी है, जिसे वरदायिनी कहते हैं, वर देने वाली। वहां रुक्मिणी को वर प्राप्त हुआ, तो उस नदी का नाम पड़ा ,वर देने वाली नदी के तट पर।
“भूयात पतिर में भगवान कृष्ण तद अनुमोदताम” पतिर में भगवान, मुझे वो भगवान पति रूप में प्राप्त हो, तो पुन:प्रार्थना यहां कुंडीनपुर में भी हुई है और रुक्मिणी पुन:महल की और जाने के लिए तैयार हो जाती हैं। उसको पता है कि इस बार मैं महल की और तो जाऊंगी, लेकिन महल में मुझे जाना नहीं है, मार्ग में कृष्ण मिलने वाले है। मीटिंगपाउंट इज़ ऑलरेडी फिक्सड ,कृष्ण इज़ इन टाउन। तो जा रही है मंदिर की ओर से महल की ओर जा रही है तो। कैसी है रुक्मिणी? “तामदेव मायाम इव”, देव माया जैसी है। “ वीर मोहिनी”, जब रुक्मिणी जा रही हैं तो दोनों तरफ कई सारे राजा- महाराजा वहां विराजमान हैं। कोई हो सकता है जमीन पर खड़े है, कोई घोड़ों पर सवार है,कोई रथों में है,कोई कली हाथी के पीठ पर आरूढ़ है। ये रुक्मिणी “सुमध्यमा” शुकदेव गोस्वामी वर्णन कर रहे हैं, सुमध्यमा मतलब पतली कमर वाली, स्त्रियों के सौंदर्य का वैशिष्ट्य माना जाता है।
“कुंडल मंडित आननाम” कुंडलम से मंडित जिनका आनन है और “श्यामाम्”और उनके बाल कैसे है? काले। “सुस्मिताम“ उसके मुख मंडल पर हास्य है। “चलंती कलहंस गामिनी” हंस की जैसी चाल चलती हुई, हंस जैसे चलता है हंस की चाल चलती हुई रुक्मिणी आगे बढ़ रही हैं,अपने बालों को हटाकर देख भी रही है। किसको देखती होगी? कहां है कृष्ण? कहां है उनका रथ? कहां है?कहां है? वो राजाओं को देखना चाहती होगी क्या? ऑफकोर्स नोट। लेकिन रुक्मिणी को देखकर इन राजाओं का जो हाल हुआ है, इसका वर्णन यहां शुकदेव गोस्वामी करते हैं। वे तो सब मंत्रमुग्ध, मोहित थे और उनको तो अपनी खुद की सुधबुध नहीं रही, रुक्मिणी के सौंदर्य का दर्शन करते हुए उनके हाथों से हथियार छूट रहे हैं। कुछ लोग ऐसे गिर रहे है उनको पता नहीं कि वे हाथी के पीठ पर है, कि घोड़े के पीठ पर है, कि जमीन में है, कहां है? तो जैसे वो आगे बढ़ रही है तो राजा-महाराजा गिर रहे है। इतने में “ विलोक्य” रुक्मिणी ने देखा, कृष्ण के रथ के ऊपर वाली जो ध्वजा थी, उसको देखा, “ आह दैटस द वन!” तो रुक्मिणी आगे बढ़ रही उस रथ की और कृष्ण भी अपने रथ को रुक्मिणी की और आगे बढ़ा रहे हैं। तो एक दूसरे की ओर आगे बढ़ते-बढ़ते जब रुक्मिणी पास में पहुंची है तो थोड़ा सा / हल्का सा हेल्पिंग हैंड कृष्ण ने दिया है। उसी कै साथ रुक्मिणी छलांग मारके रथ में विराजमान होती हैं और ऐसे होते कृष्ण प्रचण्ड वेग के साथ वहां से प्रस्थान करते हैं। हरि बोल! और बाकी खरगोश ये बस देखते ही रहे कि,”व्हाट हैपेंड?व्हाट हैपेंड?” और फिर थोड़ा जग गए और समझ गए, “ओह दैट वाज़ कृष्ण”, कृष्ण ही होंगे तो पीछा करते हैं। और युद्ध भी होता। रुक्मिणी को वैसे बलराम तो, “विनाशाय च दुष्कृताम” उस दुष्ट का संहार कर देना चाहते थे लेकिन कृष्ण ने समझा- बुझा दिया, “नो! नो! नो!” उसका थोड़ा मुंडन ही कराए, उसके बाल उतार दिए। जैसे अश्वत्थामा के बाल उतारे थे, हत्या नहीं की थी। तो वहां से कृष्ण, बलराम, रुक्मिणी और सेना के साथ बैक टू द्वारका धाम की जय! और वहां,” शुभ मंगल सावधान” विवाह संपन्न हुआ।
महाराष्ट्र में ऐसा होता है,”शुभ मंगल सावधान”,
गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!,
रुक्मिणी जन्मोत्सव की जय!
रुक्मिणी हरण की जय!
रुक्मिणी विवाह महोत्सव की जय !
सब कुछ कर दिया हमने, जन्म भी हुआ, हरण भी हुआ, विवाह भी हुआ और अब बहुत सारी द्वारका लीला का प्रारंभ होगा। औरों के साथ विवाह होंगे, आठ विशेष रानियों के साथ। फिर और कितनी? 16100 के साथ भी होंगे, वे पहुंचने वाली है, उनके भी विवाह होते है। और एक ही साथ वैसे सारे विवाह हुए। 16108, आई डोंट नो अबाउट आठ का सो आई कांट से। लेकिन 16100 विवाह एक साथ उतने सारे महलों में हुए और उतने सारे महलों में द्वारकाधीश थे। हर महल में द्वारकाधीश, ऑफ कोर्स ही वाज़ देयर। बस इतना नहीं, हर विवाह में वसुदेव और देवकी भी थे।
सभी ने विटनेस किया ये सब, बस यशोदा नहीं थी। यशोदा कहां थी? वृंदावन में थी। इसीलिए बाला जी को यशोदा ने निवेदन किया था,” हे पुत्र! हे बेटा! तुम्हारा विवाह देखने का मुझे सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ, तो मैं देखना चाहती हूं तुम्हारा विवाह। फिर बाला जी ने और एक विवाह की व्यवस्था की और बालाजी मंदिर में वैसे वकुला? जो किचन है, रसोई घर, वहां यशोदा..क्या नाम? वकुला.. यस वकुला वकुला,आप गए होंगे? वहां का रसोईघर का भी, शी इज़ पर्सनली ओवर सींइंग द कुकिंग। फिर वो विवाह भी संपन्न हुआ। भगवान ने ऐसी मैरिज करके दिखाई, कितनी महंगी मैरिज थी। मैरिज लोन.. आप कार लोन, दिस लोन, दैट लोन लेते हैं। भगवान ने लोन लिया..किस के लिए? मैरिज के लिए लोन लिया। वहां एक वन है, नारायण वन या ऐसा कोई वन है, जहां पर विवाह संपन्न हुआ और यशोदा उस विवाह में थी। यशोदा द्वारका में नहीं थीं। हरि हरि!
आई विल से दिस क्विकली, कि भगवान के संबंध में सुनकर श्रुत्वा श्रुत्वा श्रुत्वा…
“श्रुत्वा गुणान् भुवनसुन्दर शृण्वतां ते
निर्विश्य कर्णविवरैर्हरतोऽङ्गतापम्।
रूपं दृशां दृशिमतामखिलार्थलाभं
त्वय्यच्युताविशति चित्तमपत्रपं मे” ॥
ये जो हुआ है, रुक्मिणी का प्रेम कृष्ण से, कैसे हुआ? किस कारण से हुआ? श्रुत्वा, श्रवण से हुआ.. राइट। और फिर उसने, मैने सदृशम पतिम… मेरे पति होंगे तो… कृष्ण, मुकुंद, द्वारकाधीश ही होंगे। और मैने ये भी कहा था कि रुक्मिणी भगवान की शक्ति है। व्हाट अबाउट अस? हम लोग कौन हैं? हम भी भगवान की शक्ति ही हैं। भगवान हैं शक्तिमान और रुक्मिणी,गोपी, अंतरंगा शक्ति, फिर बहिरंगा शक्ति, तटस्थ शक्ति, हम लोग तटस्थ शक्ति हैं। भगवान की ही तो शक्ति हम हैं और पुरुष तो एक ही है। “गोविंदम आदिपुरुषम” – ही इज़ द ओनली वन पुरुष और बाकी सब प्रकृति है या स्त्रियां है, शक्तियां है, इनक्लूडिंग ऑल ऑफ अस। हम भी भगवान की शक्ति ही हैं। हमारे पुरुष… हम प्रकृति है मतलब हम स्त्री है। केवल स्त्रियां ही स्त्रियां नही है, पुरुष भी स्त्री ही है। वैसे पुरुष बनने का प्रयास चलता रहता है हमारा। पुरुष मतलब एंजॉयर। तो वैसे स्त्रियां भी पुरुष की भूमिका निभाना चाहती है। जब एंजॉयमेंट का स्पिरिट होता है तो वो स्पिरिट वाला पुरुष बनना चाहता है। पुरुष समझता है कि मैं पुरुष हूं लेकिन स्त्रियां भी पुरुष की भूमिका निभाना चाहती हैं- दे वांट टू बी एंजॉयर, लेकिन ये तो फॉल्स पोजीशन है। हम पुरुष हैं नहीं,एंजॉयर हम हैं नहीं- “भोक्ताराम यज्ञतपसां”, भगवान भोक्ता हैं, भगवान इज़ द एंजॉयर हैं और एक ही पुरुष है वैसे। जीव गोस्वामी कहे थे ,”ओह आई एम स्वामी,आई एम अ संन्यासी, मैं स्त्रियों को नहीं मिलता”, जब.. कौन थी वो?.. मीराबाई मिलना चाहती थी। तो ऑफ कोर्स संन्यासियों को कुछ नीति-नियम इत्यादि, विधि-विधान भी है, तो उसके अनुसार वो कहे कि,”नो नो नो! मैं स्त्रियों को नहीं मिलूंगा” या चैतन्य महाप्रभु थोड़ा दूर रहते थे। किंतु जब ये बात सुनी मीरा बाई ने तो कहा,” मैने तो सुना थे कि एक ही पुरुष है “गोविंदम आदि पुरुष”, ये और कौन है? कौन बना है पुरुष? जीव गोस्वामी, जो स्त्री को नहीं मिलना चाहते, कौन बने है ऐसे पुरुष?” एनीवे ये फिलोसॉफिकल बात है। तो कहने का तात्पर्य ये है कि हम सब प्रकृतियां हैं और हम सब के पुरुष है,”गोविंदम आदिपुरुषम् तमहं भजामि”। तो हमारा विवाह भी, हमे भी मन बनाना चाहिए। हम स्त्रियों का, हम स्त्रियों का, हम जो प्रकृति है तो विवाह किनके साथ हम करना चाहेंगे? “मुकुंदस्य” ,मुकुंद के साथ, कृष्ण के साथ, पार्थसारथी के साथ। जय श्री राम! ये सारे पुरुष है, उनको हम पुरुष बनाना चाहेंगे। वे ही हैं हमारे पुरुष या स्वामी, एंजॉयर। वी आर मैंट टु बी एन्जॉयड। तो इस स्पिरिट का रिवाइवल कैसे होता है कि मैं स्त्री हूं/ मैं प्रकृति हूं/ मैं आत्मा हूं? मैं तटस्था शक्ति हूं और मेरा संबंध मुझे पुनः स्थापित करना है l “संबंध,अभिधेय,प्रयोजन” तो मेरा सम्बन्ध भगवान के साथ ही हो सकता है। आई वांट टू बी एन्जॉयड बाय द लॉर्ड ऑनली। ये जो विचार रुक्मिणी का बना, जिसके कारण बना, श्रवण से बना, श्रुत्वा, सुनते सुनते..साधु/ शास्त्र/ आचार्यों को सुना पढ़ा उसने, तो उसने मन बना लिया। यदि हमारा भी मन बनाना है तो कैसे बनेगा मन? कैसे बनेगा मन? सेम प्रोसेस,वही विधि है,वही कारण है जो कारण रुक्मिणी के लिए बना। हमारे लिए भी और कोई कारण नहीं बन सकता, ये श्रवण,कीर्तन,अध्ययन, पठन,पाठन से ही,
“श्रवण आदि शुद्धचित्त कराय उदय,
नित्य सिद्ध कृष्णप्रेम साध्य कभु नय”
हमारा प्रेम भगवान से है, हमारे प्रियकर भी कौन है? कृष्ण हैं। हम कृष्ण की प्रेयासी भी है,छोटी मोटी। जितनी राधा प्रेयसी है या रुक्मिणी प्रेयसी है, लेकिन है तो हम..कौन है? हम प्रेयसी हैं,हम प्रिया हैं। हम जो जीव हैं/ आत्मा हैं,हम भी प्रिया हैं,भगवान के प्रिय है। तो हमारा प्रेम भगवान से पुनः जागृत वैसे ही होगा जैसे रुक्मिणी का प्रेम कृष्ण के प्रति हुआ। लीला में ऐसा सुनते हैं वह प्रेम नहीं था, वे बालिका ही थी और सुनते सुनते फिर उसका प्रेम जाग्रत हुआ, ये बात वैसे सही नहीं है। रुक्मिणी नित्य पार्षद/ नित्य मुक्त है, तो कभी आच्छादित नहीं होती माया से, इत्यादि। लीला के लिए ये सब ऐसा दर्शाया जाता है। ऐसी घटनाएं घटती हैं। उसने सुना है भगवान के विषय में, ये हमको समझाने के लिए भी ये सब लीला रचते हैं भगवान। तो.. हरि हरि! ..ओके! गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल! इसलिए बुक डाइट्रीब्यूशन इज़ वेरी इंपॉर्टेंट। बुक डिस्ट्रीब्यूशन बहुत महत्वपूर्ण है। बुक डिस्ट्रीब्यूशन क्या करता है? बुक्स लोगों को मिलते हैं तो उनको अवसर प्राप्त होता है, किसका? श्रुत्वा, सुनने का,पढ़ने का। बुक्स ही नहीं है तो कैसे होगा? रुक्मिणी जो सुन रही थी, पढ़ भी रही होगी। इसलिए प्रभुपाद कहे, “बुक्स आर द बेसिस” और श्रील भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर जो आदेश दिये, भक्तिवेदांत स्वामी श्रील प्रभुपाद को क्या आदेश था? मेन आदेश क्या था? “इफ यू एवर गेट मनी, क्या करो? प्रिंट बुक्स। तुम को यदि कभी धन राशि प्राप्त होती है तो उसका उपयोग तुम ग्रन्थ के निर्माण/ प्रकाशन/ वितरण के लिए करो।” उनसे कहा था कि,” प्रीच इन इंग्लिश लेंग्वेज”, तो प्रभुपाद अंग्रेजी भाषा में ग्रंथों की रचना, संकलन किये लेकिन एक समय प्रभुपाद कहे थे,” यू प्रिंट माई बुक्स इन एज़ मेनी लैंग्वेजेस एज़ पाॅसिबल”। कहोगे श्रील प्रभुपाद व्यास बन गये। व्यास मतलब एक्सपेंडर, जो विस्तार करते हैं। तो अंग्रेजी भाषा में कहा था, भक्तिसिद्धांत कहे अंग्रेजी भाषा में प्रचार करो। लेकिन भक्तिवेदांत श्रील प्रभुपाद कहे,” प्रिंट बुक्स इन एज़ मेनी लैंग्वेजैज़ एज़ पाॅसिबल”। और इसके प्रकाशन के लिये श्रील प्रभुपाद अलग से भी भक्तिवेदांत बुक ट्रस्ट की स्थापना किए, “बीकॉज प्रिंटिंग इज़ वेरी वेरी इंपॉर्टेंट और इंस्ट्रक्शन ही थी। वेरी वेरी इंपॉर्टेंट, द मेन इंस्ट्रक्शन भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर की भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद को प्रिंट बुक्स, डिस्ट्रीब्यूट बुक्स, ही थी। मुझे ये भी कहना था ही, लेकिन और बातें कहते कहते कहना लगभग बच रहा था तो उसको मैं अभी कहने का प्रयास कर रहा हूं। फिर आगे भक्तिवेदांत बुक ट्रस्ट की स्थापना की और गोपाल कृष्ण गोस्वामी महाराज को बी. बी. टी. का ट्रस्टी भी बनाए और दिल्ली से ही प्रभुपाद गोपाल कृष्ण महाराज को मास्को भेजे थे। बी.बी.टी के बुक स्टॉल, एक्जीबिशन-कम-सेल्स वहां होने थे और उस बी.बी.टी. स्टॉल का बहुत सारा एप्रीसिएशन वहां मास्को में हुआ, ग्रंथों का वितरण हुआ ,कई सारे कॉन्टैक्ट्स मिले। गोपाल कृष्ण महाराज पुनः लौटे और जब मिले प्रभुपाद से तो प्रभुपाद बहुत प्रसन्न थे, बहुत प्रसन्न थे गोपाल कृष्ण महाराज से। और फिर महाराज केवल बी बी टी ,जिसकी जिम्मेदारी है प्रिंटिंग, तो केवल प्रिंटिंग को ही नहीं संभाले महाराज, डिस्ट्रीब्यूशन को भी संभाले। डिस्ट्रीब्यूशन का प्रमोशन किये और इतने सारे ग्रंथों का वे वितरण करते रहे, ऑल ओवर थे वर्ल्ड, ऑल ओवर हिज़ जोन,ऑल ओवर इंडिया,ऑल ओवर एन.सी.आर, ऑल ओवर दिल्ली टेम्पल। ग्रन्थ वितरण में महाराज वाज़ नंबर वन बुक डिस्ट्रीब्यूटर इन द वर्ल्ड। मैं ये भी सोच रहा था कि भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर जो भक्तिवेदांत स्वामी श्रील प्रभुपाद को आदेश दिये, मेन आदेश/ मुख्य आदेश, प्रिंट बुक्स,डिस्ट्रीब्यूट बुक्स। तो उस आदेश को वैसे हम सभी को कहे प्रभुपाद ,अपने सारे शिष्यों को कहे, डिस्ट्रीब्यूट बुक्स, डिस्ट्रीब्यूट बुक्स, डिस्ट्रीब्यूट बुक्स या बुक्स आर द बेसिस। लेकिन हम सब शिष्यों में गोपाल कृष्ण महाराज ने लीडरशिप ली और ही बीकेम द नंबर वन बुक डिस्ट्रीब्यूटर इन द वर्ल्ड। श्रील प्रभुपाद को अपने गुरु महाराज का विल का एग्जीक्यूशन करना था, उसका एग्जीक्यूशन श्रील प्रभुपाद अपने शिष्यों के माध्यम से अपने गुरु महाराज के विल का एग्जीक्यूशन/ अमल किये। उसमें भी गोपाल कृष्ण महाराज को निमित्त बना के,”निमित्त मात्रम भव सव्यसाचिन”, निमित्त बनाके गोपाल कृष्ण महाराज को निमित्त बनाके अपने गुरु महाराज के इच्छा या विल पर अमल श्रील प्रभुपाद किये।
श्रील प्रभुपाद की जय!
गोपाल कृष्ण गोस्वामी महाराज की जय!
और आप सब की भी जय! क्योंकि आप फिर गोपाल कृष्ण महाराज की इच्छा जो ग्रन्थ वितरण की इच्छा और भी कई सारी इच्छाएं (मुख्य इच्छा तो ग्रन्थ वितरण अधिकाधिक हो) उस इच्छापूर्ति के लिये आप व्यस्त रहते हो और आप कई सारे मैराथन के विनर्स बन जाते हो जैसे “न्यू दिल्ली वन” और “एन. सी. आर. नंबर वन इन द वर्ल्ड”। इसके लिए भी आप का अभिनंदन! कांग्रेचुलेशन!
अभिनंदन अभिनंदन अभिनंदन!
गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!
Leave A Comment