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3 जून 2019 हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। मैं आप सभी को यह बताना चाहता हूं कि आज हमारी जप चर्चा में प्रतियोगियों की संख्या 600 है। हम लक्ष्य तक पहुंच गए हैं, आज 600 और इस महीने के अंत तक हमारा लक्ष्य 700 प्रतियोगियों को इस कॉन्फ्रेंस में सम्मिलित करने का है। अभी इसमें 100 और प्रतियोगी चाहिए, जो सदैव इस कॉन्फ्रेंस मे जप कर सकें। वो हमारा लक्ष्य रहेगा इस महीने के अंत तक, मैं आप सभी को इस कांफ्रेंस में जप करते देखकर प्रसन्न हूं। जैसा कि मैं समय-समय पर बताता हूं की जो आपके आराध्या हैं राधा कृष्ण, राधा गोपीनाथ, राधा गोपाल जी वे भी आपको जप करते हुए देखते हैं । ऐसा नहीं है कि जब आप जप करते हैं केवल मैं आपको देखकर प्रसन्न होता हूं अपितु भगवान भी आपको देखकर अत्यंत प्रसन्न होते हैं। आपको भी इस प्रकार से सोचना चाहिए कि मैं जप कर हूं भगवान इसके साक्षी हैं, भगवान यह देख रहे हैं तथा मेरा नाम भी एक तरह से नोट कर रहे हैं कि मैं उनके पवित्र नामों का जप कर रहा हूं । निसंदेह भगवान साक्षी हैं, जब आप जप कर रहे हैं, आप उनके पवित्र नामों का जप सुबह कर रहे हैं, हमें ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि भगवान जहां है चाहे वह गोलोक में है या और किसी अन्य स्थान पर भी हैं , वे अपने उस स्थान से हमें देख रहे हैं और वहां से हमारी सूची बना रहे हैं कि हमने जप किया है अथवा नहीं, हमें ऐसा नहीं सोचना चाहिए की भगवान दूर से हमें देख रहे हैं। हमे यह सोचना चाहिए कि जब मैं जप कर रहा हूं, जब मैं भगवान को पुकार रहा हूं भगवान मेरे बहुत समीप हैं, भगवान मेरे आस-पास ही हैं, तथा वहां से वे मुझे देख रहे हैं मेरे और भगवान के मध्य बहुत अधिक दूरी नहीं है। क्योंकि जप करते समय में उन्हें पुकार रहा हूं , और वहां से वे बहुत नजदीक से साक्षी बनते हैं, हमें इस बात का अनुभव करना चाहिए। हमें यहां पर तीन बातों का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए एक तो, जो आत्मा है वही साधक है। जो जप करता है विशेष रूप से आत्मा भक्त है, जो जप करता है। जो भगवान के पवित्र नामों को लेता है और भगवान को पुकारता है वह भक्ति होती है। इस प्रकार से आत्मा भक्त है तथा जो हरि नाम हम लेते हैं भक्ति है। इन तीन बातों में पहली हमने बताई थी आत्मा भक्त है, और हरि नाम के द्वारा वह भक्ति करता है, इसमें जो तीसरी बात है वह है भगवान, जब भगवान वहां उपस्थित होते हैं तो इस प्रकार से यह पद परिपूर्ण होता है। हमारा खुद का संसार जिसे हम बनाते हैं , वह पूर्ण होता है। यंहा पर आत्मा भक्त है, हरिनाम के द्वारा भक्ति करता है। इस प्रकार की भक्ति करने पर भगवान वहां स्वयं उपस्थित होते हैं। तो वहां भक्त है भक्ति है और भगवान हैं। जैसा की श्रील भक्ति विनोद ठाकुर कहते हैं "कृष्णेर संसार कोरो छाड़ि अनाचर" जब हम कृष्ण का संसार कहते हैं तो हमे अनाचार , व्याधि इन सब को छोड़ना होता है। जो भी बुरी आदतें हैं, उन सब को छोड़कर हम कृष्ण का संसार कह सकते हैं। यह जो कृष्ण संसार है अथवा ये संसार जिसे हम मानते हैं वे केवल तभी पूर्ण हो सकता है जब हम ध्यान पूर्वक शुद्धता पूर्वक और नियम अनुसार जप करें। हमे इस बात का ध्यान रखना चाहिए की हम शुद्धता के साथ और ध्यान पूर्वक अपना जप कर रहे हो। दुर्भाग्यवश हम पतित है और हम साधारण जीव हैं तो हमे उन महान अभिभावकों और संतों के पथ पर चलना चाहिए जिन्होंने यह भक्ति पूर्ण की है समय पर । हम बताते हैं और कई भक्तों के चरित्र का वर्णन भी करते हैं, जैसे तुकाराम महाराज, ध्रुव महाराज, प्रहलाद महाराज आदि । हमें उनके चरित्र को सीखकर उनके पथ पर चलना चाहिए जिस प्रकार उन्होंने भक्ति की। एक समय तुकाराम महाराज एक पहाड़ी के ऊपर बैठे थे उन्होंने वहां से दो पत्थर उठाएं उनको बजाते हुए कीर्तन करने लगे "जय जय राम कृष्ण हरि" जब ऐसा कर रहे थे तो भगवान स्वयं वहां प्रकट हो गए । हमने जो तीन बातें बताई हैं भक्त, भक्ति और भगवान , शुरुआत में वहां भक्त तुकाराम थे और वे भक्ति कर रहे थे परंतु भगवान वहां पर अनुपस्थित थे। परंतु जैसे ही उन्होंने भक्ति संपन्न की तो वहां पर भगवान प्रकट हो गये। इससे तुकाराम महाराज का संसार पूर्ण हो गया जो उन्होंने बनाया था। पंढरपुर के जो भगवान हैं , भगवान विट्ठल स्वयं को तुकाराम महाराज से दूर नहीं रख सके और जब इस प्रकार से तुकाराम महाराज भाव विभोर होकर कीर्तन कर रहे थे भगवान स्वयं उनके सम्मुख प्रकट हो गए। भगवान विट्ठल उनके समक्ष प्रत्यक्ष आकर प्रकट हुये। क्या ऐसा द्रोपदी के साथ नहीं हुआ और द्रौपदी ने भी भगवान को पुकारा। और जैसा कहते हैं भगवान आते नहीं क्योंकि हम द्रोपदी की तरह पुकारते नहीं। हम द्रोपदी के समान भाव से नहीं पुकारते हैं। जब द्रोपदी ने भावपूर्ण होकर कृष्ण को पुकारा, कृष्ण ने उन्हें असीमित साड़ी प्रधान की, उस समय कृष्ण गोलोक अथवा द्वारिकाधीश में उपलब्ध नहीं थे, क्योंकि वे द्रोपदी के समक्ष थे और वे उन्हें असीमित साड़ी प्रदान कर रहे थे जिससे उनकी लज्जा बच सके। प्रहलाद महाराज के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ उन्होंने बताया कि मेरे भगवान तो हर जगह हैं, तो उन्होंने कहा कि क्या इस खंभे में तेरे भगवान हैं, हाँ इसमें भी मेरे भगवान हैं जब उन्होंने ऐसा कहा उस खंभे में से खूंखार गर्जना करते हुए नरसिंह देव प्रकट हुए। उस समय वो भगवान जो वैकुंठ के स्वामी हैं वह उस खंभे में से प्रकट हुए। भगवान बिल्कुल उनके सामने थे, निसंदेह भगवान अपने धाम में रहते हैं परंतु भगवान सीमित नहीं हैं, वे असीमित हैं। वे अपने धाम में रहते हुए भी हमारे साथ रह सकते हैं। जब हम जप करते हैं तो हमारा उद्देश्य यह होता कि हम उन भगवान से प्रार्थना करें अथवा यह चाहे कि वह हमारे समक्ष अपना प्राकट्य अथवा हमें अपने दर्शन दें इस प्रकार से जो नाम और नामी हैं उनमें भेद नहीं है । जब हम जप करते हैं हमारी भगवान से यही प्रार्थना होनी चाहिए की कब भगवान अपने को हमारे समक्ष प्रकट करेंगे। भगवान हमेशा स्वयं को आंशिक रूप से हमारे समक्ष प्रकट करते हैं, जब हम आराधना करते हैं। उस समय दिन भर दिन, सप्ताह के बाद सप्ताह, वर्ष के बाद वर्ष, हर दिन भगवान के प्राकट्य में हमारे समक्ष धीरे-धीरे वृद्धि होती है परंतु भगवान स्वयं भी इंतजार कर रहे हैं, प्रतीक्षा कर रहे हैं। जब हम उस धरातल पर आकर जप करेंगे भगवान पूर्णरूपेण, स्वयं पूर्ण रूपेण से स्वयं को हमारे समक्ष प्रकट कर सकेंगे । हमें अंततः उस स्थिति पर जाना है जहां हम ऐसा जप कर सके कि भगवान पूर्ण रूपेण हमारे समक्ष प्रकट हो सकें। हमें ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि भगवान अभी, इसी क्षण हमारे समक्ष प्रकट हो जाएंगे अथवा हमें भगवान को यह आदेश नहीं देना चाहिए कि अभी हमारे समक्ष प्रकट हो क्योंकि वह स्वतंत्र है। परंतु हमें धैर्य पूर्वक इसकी प्रतीक्षा करनी चाहिए , हमें धैर्य पूर्वक जप करना चाहिए कभी ना कभी भगवान स्वयं को हमारे समक्ष प्रकट करेंगे। इसमे जो पहली बात है वो थी कि हमें अपना जप अच्छे प्रकार से करना चाहिए और दूसरा धैर्यता के साथ करना चाहिए इसके अलावा जो राधा रानी का भाव है, जो महाप्रभु ने बताया , वे कहते हैं कि आप चाहे मुझे आलिंगन दीजिए अथवा चाहे आप मेरा तिरस्कार कीजिए अथवा मुझे लात मारकर भगा दीजिए आप जो चाहे वह कर सकते हैं, क्योंकि आप स्वतंत्र हैं । परंतु हर परिस्थिति में मेरे जो प्राणनाथ हैं वह सदैव आप ही रहेंगे। इसके अलावा अन्य कोई और नहीं हो सकता। हमें हरिनाम में पूर्ण विश्वास के साथ जप करते रहना चाहिए और हमें यह भी विश्वास होना चाहिए की हरिनाम में तथा हरी में भेद नहीं है। यदि हम ऐसा नहीं करते हैं, यदि हमें ऐसा विश्वास नहीं होता है तो यह भी एक अपराध है । जो 10 नाम अपराध हैं उनमें से एक अपराध यह भी है कि हमें हरिनाम में पूर्ण विश्वास ना होना। जब हम प्रतिदिन जप प्रारंभ करने से पहले इन अपराधों को पढ़ते हैं तो हमारा उद्देश्य यही होता है शनै शनै हमारा हरिनाम में विश्वास बढ़े। की हरिनाम और हरी दोनों अभिन्न हैं। अभी हमने जो कहा वह एक प्रकार से हरिनाम का महत्व है अथवा हरिनाम का महिमा अमृत है। इसके अलावा यह जो हरिनाम की महिमा है यह भी अतिशयोक्ति है यह कोई वास्तविकता नहीं है ये भी एक अपराध है, ऐसा नहीं है कि हरिनाम की महिमा काल्पनिक है अपितु वास्तविक है और ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि यह एक अतिशयोक्ति है। इस प्रकार से हमने अभी दो नाम अपराधों के विषय में चर्चा की इस प्रकार 10 नाम अपराध होते हैं। जब भी हम मंदिर में सुबह के समय जप करते हैं तो प्रत्येक मंदिर में जप प्रारंभ होने से पहले 10 नाम अपराधों के विषय में बताया जाता है ,हमें जप करते समय इन नाम अपराधों से बचना ही चाहिए । अभी तो पूरे दिन भर इन नाम अपराधों से हमें बचने का प्रयास करना चाहिए। यदि हम ऐसा करने में सक्षम होते हैं तो अगले दिन प्रातः जब जप करने बैठते हैं तो हम कम अपराध के साथ जप कर पाएंगे। जप उन्नत स्थिति पर होगा। मैं आपका और अधिक समय नहीं लेना चाहता हूं क्योंकि हमारा ऑलरेडी समय हो चुका है तो आप प्रयास करते रहिए । कल सुबह पुनः आपके साथ में जप करेंगे । लॉस एंजेलिस से वृंदावन माताजी हमारे साथ जप कर रही हैं और वह विशेष रूप से मेरा और आपका आभार प्रकट कर रही हैं। हरि हरि।।

English

3rd June 2019 YAMARAJ'S INSTRUCTIONS TO YAMADUTAS Congratulations to all of you chanters as the score has increased. Yesterday I had said, today's talk will be by Yamaraja. Have you ever met him? Many times, many many times, but you have forgotten. So, today we will hear from Yamaraja. We will listen to his thoughts. Due to time constraints we can't make it like storytelling, but some of his thoughts we will present. This talk of Yamaraj comes in the beginning of sixth canto of Bhagavatam, chapter 3. At end of fifth canto there is description of hellish planets. So, Parikshit Maharaj inquired, whether there is any way, so that suffering could be avoided. In response to that inquiry by King Parikshit, Sukadeva Goswami narrates the glory of the holy name & hence he described this story of Ajamila. Another way he said, "The way you could avoid going to hell is chanting of the holy names." Harer nama eva kevalam. (CC Adi 7.76) Yesterday, we talked about how first time Yamadutas returned empty handed & they couldn't bring Ajamila. When Yamadutas returned to Yamaraja their first question was: yamadūtā ūcuḥ kati santīha śāstāro, jīva-lokasya vai prabho trai-vidhyaṁ kurvataḥ karma,phalābhivyakti-hetavaḥ (SB. 6.3.4) Their question was 'How many controllers are there? We thought you were the only one. But today we had some other experience. Someone intervened & stopped us from bringing Ajamila to you.’ Yamaraja explained, no! no ! I am not the supreme controller.’ yama uvāca paro mad-anyo jagatas tasthuṣaś ca otaṁ protaṁ paṭavad yatra viśvam yad-amśato 'sya sthiti-janma-nāśā nasy otavad yasya vaśe ca lokaḥ (SB 6.3.12) He admitted. Iam not the supreme controller. He is the Supreme Lord. Yamaraja explains & reveals the fact that, Supreme Lord is superior to him. Then there is long talk in great detail about how He controls. ahaṁ mahendro nirṛtiḥ pracetāḥ somo 'gnir īśaḥ pavano viriñciḥ āditya-viśve vasavo 'tha sādhyā marud-gaṇā rudra-gaṇāḥ sasiddhāḥ. ( SB 6.3.14) All these parties are governed by the Lord. We may be Ishwara, but Lord is Supreme controller - Parameshwar. īśvaraḥ paramaḥ kṛṣṇaḥ sac-cid-ānanda-vigrahaḥ anādir ādir govindaḥ sarva-kāraṇa-kāraṇam (BS. 5.1) Like that Brahma also has said that, Parameshwar is Krishna. dharmaṁ tu sākṣād bhagavat-praṇītaṁ na vai vidur ṛṣayo nāpi devāḥ na siddha-mukhyā asurā manuṣyāḥ kuto nu vidyādhara-cāraṇādayaḥ (SB. 6 3.19) Yamaraja explained, that dharma is given by the Lord. Dharma means laws of the Lord, which governs the world. This dharma is given by the Lord. Yamaraja says, all of you my dutas should understand, that dharma which you follow, that laws are not given by me. They are given by Param niyamak - Parameshwar. We follow, we abide by the laws given by the Lord, in the form of codes of dharma. Yamaraja is a kind of giving his ID, or introduction. He says there are twelve persons called 'Bhagvats'. They are the knowers of that dharma given by the Lord. Swayambhuva, Naradha, Shambhu, Kumaro Kapilo Manu Balir Vaiyasaki vayam. He gives the list of 'Dwadash - Bhagvats' or Mahajans. He explains, I am included in those Mahajans & we know dharma & we practice that dharma. Yamaraja is kind of big judge or supreme Court judge, when it comes to judgement. He is not only strict punisher but he is knowledgeable. He has to make so many decisions, about each living entities’ destination. It's a big responsibility. But he doesn't take those decisions, whimsically. He follows, the code of conduct given by the Lord. śrī-bhagavān uvāca karmaṇā daiva-netreṇa jantur dehopapattaye striyāḥ praviṣṭa udaraṁ puṁso retaḥ-kaṇāśrayaḥ (SB 3.31.1) He analyses whether someone has done 'karma', or 'akarma' means devotional service or vikarma - sinful activities, & taking all that into consideration, he gives the judgement. So, now Yamaraja is giving some special instructions or even warning to Yamadutas, his messengers. Please take note of this, Beware! Yamaraja was giving them job description, or reminding them of do's & don'ts. You do this! & don't do this ! Bring such person to me but don't touch or even look at that person. Then Yamaraj tells tān ānayadhvam asato vimukhān mukunda- pādāravinda-makaranda-rasād ajasram niṣkiñcanaiḥ paramahaṁsa-kulair asaṅgair juṣṭād gṛhe niraya-vartmani baddha-tṛṣṇān ( S.B.6.3.28) Bring those people to me who are vimukha, those who are against Lord. Whom you should bring, mukund padaravind makarandam Also those who have not developed attraction for the holy name. But others for whom the holy name has become ‘makarand’ or nectar. Those who are relishing the ‘makarand ‘of holy name, those who are offenselessly chanting so they are relishing the nectarine holy name, those who are attentive, don't bring them. Those who have not developed attraction for holy name or Krishna or Krishna's dham or devotees , they have not developed love for them, to all those ‘vimukhan, tan anayadhwam’. Bring those. Then he also says jihvā na vakti bhagavad-guṇa-nāmadheyaṁ cetaś ca na smarati tac-caraṇāravindam kṛṣṇāya no namati yac-chira ekadāpi tān ānayadhvam asato 'kṛta-viṣṇu-kṛtyān ( S.B. 6.3.29) Yamaraj says one whose tongue doesn't utter the holy name, tan anayadhwam….. who else cetaś ca na smarati tac-caraṇāravindam Those who doesn't remember Lord's lotus feet, tan anayadhwam…… Krishnay yo na namati Shir ekadapi…. Those who had never bowed down in front of Krishna - tan anayadhwam…… akrit Vishnukrtyan……. Those who are not performing devotional service unto the Lord, bring them. Then towards the end he says tasmāt saṅkīrtanaṁ viṣṇor jagan-maṅgalam aṁhasām mahatām api kauravya viddhy aikāntika-niṣkṛtam (SB. 6.3.31) Therefore it is advised, conclusion or instructions to us for our knowledge. Yamaraja says ‘tasmat’therefore, ‘sankirtanam vishnum’ - Vishnu's sankirtan or Krishna's sankirtan. ‘Jagan-mangalam’ - it is all auspicious for the world. ‘Ambhasam’ those who are sinful, their lives will become auspicious if they go for sankirtan of Vishnu or Krishnasya sankirtanam, Chaitanya's sankirtanam so ambhasam, those sinful souls in this world there lives will also receive auspiciousness. Shreyaha kairav chandruka vitaranam Vidya vadhu jivanam. ( Shikshastakam verse 1) Sri Krishna Chaitanya Mahaprabhu also has said, that this sankirtan will spread the rays of moon in lives of those sinful folks. śṛṇvatāṁ gṛṇatāṁ vīryāṇy uddāmāni harer muhuḥ yathā sujātayā bhaktyā śuddhyen nātmā vratādibhiḥ (SB. 6.3.32) Yamaraj continues by saying we should always hear, chant, glorify the powers of the Lord, pastimes of the Lord, powers of the Lord, beauty of the Lord, names of the Lord. muhuhu - again & again & again. So to summarise, you could study this talk by Yamaraja. Now you know where to find. Sixth canto, chapter 3. There is Yamadutas talk. Then Yamaraja has revealed the facts, including the glories of the holy name. This is a homework. By accepting holy name also, one will not have to go through the ‘Yam-yatana’ or punarapi jananam punarapi maranam punarapi janani jathare shayanam iha sansare khalu dustare krpaya pahi pahi murare. Pahi pahi murare. (‘Bhaja Govindam' prayers by Adi Shankaracharya) Hey Murari please protect me. Hare Krishna!

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