Balram Prunima
31-08-2023
ISKCON Pune

जय बलराम !
बलराम पूर्णिमा महोत्सव की जय !
ॐ नमः भगवते वासुदेवाय!

इसी के साथ मतलब किसके साथ? “ॐ नमः भगवते वासुदेवाय” कहने के साथ हम सभी ने बलराम को नमस्कार किया हुआ है , यह कैसे हुआ? कहा तो हमने “ॐ नमः भगवते वासुदेवाय”, और हुआ नमस्कार किसको? बलराम को। यह रहस्यमयी बात तो नहीं है, बात तो सरल है कि मेरा नमस्कार है ऐसा श्रील व्यास देव स्वयं कह रहे हैं। “वासुदेवाय नमः” में वासुदेव कौन है ? वसुदेव के पुत्र, वसुदेवनंदन ही हैं वासुदेव। लेकिन कितने वासुदेव है? एक सातवें पुत्र रहे बलराम वे भी वासुदेव है और आठवें पुत्र कृष्ण, वे भी वासुदेव है कि नहीं? तो कितने वासुदेव हुए ? दो। कृष्ण बलराम की जय! “ओम नमो भगवते वासुदेवाय” कहने से कृष्ण बलराम को नमस्कार और आज विशेष रूप से बलराम को नमस्कार है।

“मन्मना भव मद्भ‍क्तो मद्याजी मां नमस्कुरु” बलराम को नमस्कार करना ही होगा।
“बलराम जिनका नाम है, गोकुल जिनका धाम है, ऐसे श्री बलराम भगवान को मेरे, बारंबार प्रणाम है”

कृष्ण तो गोकुल वासी बन गए , वे जन्म से गोकुल वासी नहीं थे। मथुरा में जन्म लिया और आ गए गोकुल रातों-रात और हो गए गोकुल वासी, किंतु बलराम तो गोकुल निवासी ही रहे जन्म से ही( बाय बर्थ)। गोकुलधाम थी जय ! आज के दिन पूर्णिमा का दिन है। करीब ५२४०-४५ वर्ष पूर्व की बात है, बहुत-बहुत समय पहले की बात है |

“आदि देव भगवन काम पालन नमोस्तुते
नमो अनंताय शेषाय साक्षात् रामायते नमः…“

ये जो प्रार्थना आपने अभी-अभी सुनी वह श्रील व्यासदेव की की हुई प्रार्थना है और उसी दिन की याने बलराम पूर्णिमा के दिन की प्रार्थना है। हरि हरि! बलराम ने जन्म लिया रोहिणी के गर्भ से गोकुल में। ऐसे तो किसी के समझ में नहीं आया कि हुआ क्या? और कैसे हुआ? यह अद्भुत घटना थी, वे रोहिणी के गर्भ में केवल 5 दिन ही रहे । क्योंकि किसी को पता भी नहीं था कि बलराम हैं क्योंकि रोहिणी के पतिदेव तो मथुरा में है और उनकी पत्नी रोहिणी ( वैसे वसुदेव की कई सारी पत्नियां थी) गर्भवती हुई कैसे?और गर्भवती हुई भी तो 5 दिन में कैसे बालक ने जन्म ले लिया? इस रहस्य का उद्घाटन तो नहीं हो रहा था, तो भी गर्गाचार्य उस समय थे जब कृष्ण और बलराम भी जन्मे थे,एक मथुरा में और एक गोकुल में । उन दिनों में गर्गाचार्य मथुरा के निवासी थे, जो यदुवंशियों के पुरोहित थे। उन्होंने कृष्ण बलराम की कथाएं लिखी हैं। एक तो शुकदेव गोस्वामी कहे हैं और अनेक स्थानों पर भी हैं कृष्ण बलराम के जन्म की कथाएं और सारा चरित्र वर्णन आता ही है, अधिकतर विस्तार से तो श्रीमद् भागवत में आता है। किंतु बलराम के जन्म की कथा वैसे शुकदेव गोस्वामी नहीं सुनाए । वैसे कुछ तो बातें उन्होंने जरूर कही थी जैसे,

“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥”

धर्म की ग्लानि कैसे हुई थी उन दिनों में? इसके पीछे कोई और दूसरा तीसरा व्यक्ति नहीं था,कौन थे? कौन थे कहे या कौन था कहना चाहिए,’थे’ कहेंगे तो सत्कार सम्मान की बात होगी। हमें कहना तो है कंस, तो क्या कहे था या थे? “अमानिना मानदेन” बदमाश थे कि बदमाश था? कई लोग थे, उनके नाम शुकदेव गोस्वामी सुनाए हैं, प्रलंबासुर,चाणूर, तृणावर्त, मुष्टिक,आदि लंबी लिस्ट है। ये सब चांडाल चौकड़ी या मंडली या कंस के सहायक थे जिनको वह सशक्त करके या अधिकार देकर रखा था। सारी जनता ग्रसित- त्रसित थी और पलायन कर रही थी। वे सब पीड़ित होकर जा रहे थे, अलग-अलग स्थान में पहुंच गए। कोई विदर्भ पहुंच गए, कोई कौशल, कोई कुरुजांगल पहुंच गए मतलब पंजाब की ओर पहुंच गए, सर्वत्र गए और शायद ही कोई बचा था। अक्रूर बचे दे,अन्य तो वहां से प्रस्थान कर चुके थे। उस दरमियां कंस ने वासुदेव और देवकी के 6 पुत्रों की हत्या भी की हुई थी। एक वर्ष में एक बालक जन्म लेता था ऐसा वर्णन है। 6 साल बीत गए तो 6 वर्षों में 6 पुत्रों का वध भी किया। अब सातवें पुत्र गर्भ में है उनको धाम कहा है। वैसे वे धाम भी हैं ,धामी भी हैं। बलराम ही धाम बन जाते हैं, इसलिए भी वैष्णव धाम होते हैं। धाम के और भी भावार्थ हैं। आगे इस स्तुति में नाम भी लिया है।

“यम अनंतं प्रत्यक्षते सप्तमों वैष्णव धाम” जिनका नाम है अनंत वे सातवें पुत्र के रूप में देवकी के गर्भ में है।

“हर्ष शोक विवर्धन:” इस बालक के गर्भ में होने से क्या हुआ है? हर्ष और शोक। वसुदेव और देवकी हर्षित भी है, लेकिन साथ ही साथ में चिंतित भी है, शोक भी कर रहे हैं ये सोच कर कि जो हाल उन 6 बालकों का हुआ है, ऐसा इस बालक का भी हो सकता है। ऐसा सोचकर वे हर्ष के साथ-साथ शोक भी कर रहे हैं। भगवान कैसे होते हैं? ज्ञानवान होते हैं। यहां कौन से भगवान की बात हो रही है? कृष्ण भगवान की। वे विश्व के आत्मा या परमात्मा है। उन्होंने जानकर, क्या जान लिया? उत्पन्न हुए भय को। वसुदेव और देवकी के भय को जान गए थे,कौन? भगवान। कंस के कारण उत्पन्न हुआ जो भय है, उसका पता चला भगवान को।

अब कृष्ण कहां है? भगवान कहां है? अपने धाम में ही है, गोलोक में है। और कौन भयभीत है? यदु भी भयभीत हैं जिनके नाथ है भगवान। यह जानकर कि सभी भयभीत हैं है, विशेषकर वसुदेव देवकी भयभीत हैं, तो भगवान ने कुछ कदम उठाया, कुछ कार्य किया। आप लेकिन सोना नहीं, वैसे वह भी एक कार्य है। गौर निताई की जय! योगमाया को आदेश दिए या पुकारे या आव्हान किए हैं। योगमाया आप कहां हैं? योगमाया ने जैसे ही उस पुकार को सुना तो पहुंच गई वहां और कहने लगी,” जी बोलिए सर! मैं क्या कर सकती हूं?”आपकी इच्छा पूरी करना ही मेरा कार्य है। यह कृष्ण का आदेश है। कहां है कृष्ण? “गोलोक नामनि निज धामनि” अभी तक बलराम भी प्रकट नहीं हुए हैं सातवां गर्भ के रूप में। वे कौन से क्रमांक के गर्भ में होने वाले हैं? आठवां। तो वे अभी ऊपर ही है, अपने धाम में ही है। तो योगमाया को आदेश देते हैं ,” कच्छ!” कच्छ मतलब “जाओ”,इसमें वे देवी को संबोधित करके कह रहे हैं। कहां जाऊं, मैं कहां जाऊं ? “ब्रजम गच्छ” वृंदावन जाओ, मथुरा वृंदावन जाओ।

“गच्छ देवि व्रजं भद्रे गोपगोभिरलङ्कृतम् ।
रोहिणी वसुदेवस्य भार्यास्ते नन्दगोकुले ।
अन्याश्च कंससंविग्ना विवरेषु वसन्ति हि ॥ (10.2.7)

योग माया को भद्रा,अति शुभ या भद्रे कहा गया है। कैसा है वृंदावन?” गोपगोपीभी अलंकृतम” केवल ब्रज जाओ ये कह कर फिर रुके नहीं भगवान। उस ब्रज का तुरंत ही कुछ विशेषणों से उल्लेख करते हैं और कहते हैं कैसा ब्रज? वह ब्रज जो अलंकृत है किससे? गोप और गोपियों से। योगमाया बोली,”ठीक है वहां जाकर मुझे क्या करना है?” तो आगे कहते हैं कृष्ण कि वसुदेव की भार्या है रोहिणी। कहां पर है? गोकुल में। गोकुल में क्यों है? इसका भी कारण कृष्ण बता रहे हैं। केवल रोहिणी ही नहीं, अन्य भी जो पत्नियां है वसुदेव की, वे अलग-अलग स्थान पर निवास कर रही है या उनको सुरक्षित रखा है। रोहिणी को गोकुल में नंद महाराज की अध्यक्षता या देखरेख में रखा हुआ है। ठीक है फिर मुझे आगे क्या करना है?

“देवक्या जठरे गर्भ शेषाख्यं धाम मामकम्”

मैं ही अब बलराम के रूप में देवकी के गर्भ में हूं। जो सातवां अब देवकी के गर्भ में है उसका नाम भी कह रहे हैं, “ शेष आख्यम” मतलब इस नाम से प्रसिद्ध है। कैसे नाम से प्रसिद्ध है? शेषख्यम,मतलब अनंत शेष। उस गर्भ को देवकी के गर्भ से कहां पहुंचाओ? रोहिणी के गर्भ में पहुंचाओ। और भी थोड़ा-थोड़ा कहा है वो सब नहीं सुनेंगे हम। किंतु एक बात, और जब यहां गर्भ का स्थानांतरण होगा या गर्भान्तर गर्भान्तर होगा जैसे देशांतर होता है एक देश से दूसरे देश तक ग्रामांतर एक ग्राम से दूसरे ग्राम यहां क्या हो रहा है गर्भान्तर एक गर्भ से दूसरे गर्भ में। ऐसा हुआ इसीलिए भी बलराम का नाम संकर्षण होगा।

गर्भसङ्कर्षणात् तं वै प्राहु: सङ्कर्षणं भुवि ।
रामेति लोकरमणाद् बलभद्रं बलोच्छ्रयात् ॥ (10.2.13)

अब बालक का जन्म भी नहीं हुआ और कृष्ण उसका नामकरण कर रहे हैं,पहले से ही। उसका नाम क्या होगा? एक नाम होगा ‘संकर्षण’ और लोकरमणाद, “रमती रमयती च इति रामः” जो रमते हैं और रमाते है इसलिए इनका नाम होगा ‘ राम’। तीसरा नाम होगा ‘ बलम’ उनके बल के कारण बलवान होंगे इसलिए इनका नाम बल भी होगा और साथ में कहिए राम तो बलराम हुआ और संकर्षण । हरि हरि!

सन्दिष्टैवं भगवता तथेत्योमिति तद्वच: ।
प्रतिगृह्य परिक्रम्य गां गता तत् तथाकरोत् ॥

यह आदेश को जैसे ही योगमाया सुनी ,अब तक वह गोलोक में ही है योगमाया। क्या करती है योगमाया आगे? योगमाया व्यक्ति है, भगवान की शक्ति है योगमाया और महामाया। योगमाया एक व्यक्तित्व है, उन्होंने क्या किया? योगमाया ने परिक्रमा की हुई है, कहां हो रही है परिक्रमा ये? गोलोक में ही हो रही है और वह से प्रस्थान करके “ग्राम गत:” मतलब पृथ्वी पर आई है। वह से गयी और यहाँ आ गयी, वह से गच्छा हुआ और यहाँ आगच्छा। गच्छ जाना आगच्छ आना और फिर योगमाया ने वैसे ही किया जैसे आदेश हुआ, वैसे ही करुँगी जैसा आपने कहा है। तो यहाँ से आगे की बात शुकदेव गोस्वामी बलराम के जन्मा की कथा या उल्लेख इतना ही करते है ,क्युकी वे भग्वारत्त की कथा सुना रहे थे। किन्तु उनके जन्म से संबंधितया उस दिन क्या-क्या हुआ पूर्णिमा के दिन और कौन सा घटनाक्रम घटा इसको गर्गाचार्य अपनी गर्ग संहिता में लिखते हैं| गर्ग संगीता में एक खंड है स्कंद है भागवत का तो एक खंड है गोलोक खंड। नारद और बहुलक इनके मध्य में संवाद हो रहा है। वह पर बलभद्र उनके जन्म की कथा उस गोलोक खंड के दसवें अध्याय में गर्गाचार्य कथा लिख रहे हैं। यह एक खबर है ,ब्रेकिंग द न्यूज़, वे तुरंत ही लिखे होंगे जैसे जन्म हुआ और कल यह यह हुआ।

पढ़ तो रहे है हम आज, पर जब हम पढ़ते है तो लगता है कि ये क्या है? आज की ताजा खबर। अख़बार में छपने वाली खबरे तो छपते-छपते ही बासी या पुरानी हो जाती है। अगले दिन हम उसे कचरे के डिब्बे में डाल देते है। जो न्यू होता है उसे न्यूज़ कहते है और न्यूज़ कहाँ कहाँ की होती है? नॉर्थ की,ईस्ट की,वेस्ट की और साउथ की, मतलब (NEWS), तो ऐसी सभी दिशाओ की खबरों को न्यूज़ कहते हैं। उस दिन की न्यूज़ ,गर्गाचार्य हम तक आज पहुंचा रहे है। हम पढ़ेंगे या ध्यानपूर्वक/श्रद्धापूर्वक यदि हम सुनते है तो हम देख सकते है उस दृश्य को। यही उदेश्य है वैसे,दिखाना, “श्रावय दर्शय” श्रवण से होता है दर्शन। पढ़ो कहो या सुनो कहो एक ही बात है। जो हम पढ़ते है उसी को हम सुनते है या और कोई पढ़ता है तो उससे हम सुनते है। जब हम ही पढ़ते हैं तब तो हम ही सुनते भी है। इससे होता क्या है? दर्शन होता है। वैसे भी शास्त्रों को क्या कहा गया है? शास्त्र कैसे होते है? चश्मे की तरह। बिना चश्मे के दिखता नहीं है लेकिन चश्मा लगा कर सब दिखता है। वैसे हम अज्ञानी है, अडानी है, इसलिए सभी नहीं समझेंगे। फिर क्या होता है?

“ॐ अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया”

गर्गाचार्य गुरु है, परंपरा में। गुरुजन जब सुनाते है, उसी के साथ ज्ञान का अंजन खोलते है, उससे दिखने लगता है। आप तो वहां नहीं थे और मैं भी नहीं था। यदि हम वहां उस दिन होते तो आज यहाँ नहीं होते अभी। और अगर हम अभी यहाँ है तो इसका मतलब है कि हम वहां नहीं थे कभी, लेकिन हम वहां जाना चाहते तो है। अब हम मिस नहीं करना चाहते वहां का जो भी अनुभव है। जॉर्ज हैरिसन ने कहा, “मै आपको देखना चाहता हूं, मै आपके साथ रहना चाहता हूं” श्रवण के माध्यम से या इस गर्ग संहिता के माध्यम से हम वहां पहुँच सकते है।

ये 5,240-45 वर्ष की जो दूरी बताई गई है, ये 0 हो सकती है। काल की दृष्टि से और स्थान के दृष्टि से काफी दूर है, लेकिन हम वहां तत्क्षण पहुँच सकते है,कैसे? श्रवण से। हम श्रवण के माध्यम से वहाँ पहुँच सकते है। आप पहुंचना चाहते हो वहाँ ? या यही अच्छा है, “जीना यहाँ मरना यहाँ, इसके सिवा अब जाना कहां” हरि हरि! गर्गाचार्य यह भी लिखे है कि औरों को तो पता नहीं चला कि कौन है ये बालक जिसने जन्म लिया है? लेकिन देवता जानते थे, इसलिए सारे देवता पहुँच गए थे मथुरा, जन्म के समय। जैसे वहां भी पहुंचने वाले है कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि को भी। जन्माष्टमी को सारे देवता पहुंचे थे और उन्होंने गर्भस्तुति भी की है, मतलब कृष्ण अभी गर्भ में ही है और उनकी स्तुति की है देवताओं ने। ऐसा ही यहाँ गोकुल के वायुमंडल में हो रहा है।

“सुरेशु वर्षासु सुपुष्पवर्षम“ देवताओं ने वर्षा की पुष्पों की, बादल उमड़ आए इंद्र की ओर से और हल्की सी वर्षा भी हुई । उस समय बलराम स्थानांतरित किए गए। वे कुछ समय मथुरा में थे देवकी के गर्भ में, अभी अभी स्थानांतरण समाप्त हुआ। उस समय देवता भी पहुंचे, वृष्टि हो रही है जैसे ही नंद भवन में बलराम प्रकट हुए है । नंद महाराज एक दृष्टि से समझ भी नहीं रहे थे कि कौन है ये बालक? तो भी इस बालक की स्थिति और प्रभाव से उनका साक्षात्कार हुआ है कि ये जीव नहीं है,ये शिव भी नही है, ये तो विष्णु है । फिर उन्होंने क्या किया? जातकर्म पहला संस्कार होता है जो उन्होंने संपन्न किया तथा लाखो गायें दान में दी और कई सारे गोकुल वासी वहाँ पहुँचे है। “नंद के घर आनंद भयो” वो भी होने वाला है।

आनंद तो हुआ था नवमी के दिन, नंदोत्सव भी मनाया गया । लेकिन यहाँ इस बालक ने जन्म लिया पूर्णिमा के दिन,तो नंद महाराज ने उत्सव मनाया और अब देखिए कौन आने वाले है? सभी के मन में, स्पेशली नंद महाराज के मन में एक बहुत बड़ा प्रश्न चल रहा था कि कौन है ये बालक? तो अब वहां पहुँच गए,” नारायण नारायण”। कौन पहुंच गए ? नारद पहुँच गए लेकिन अकेले नहीं, व्यासदेव भी पहुंचे। इनके अलावा कई देव पहुंचे, वशिष्ठ,बृहस्पति आदि सब महानुभाव जब वहाँ पहुंचे है तो इन सबका स्वागत/सत्कार/सम्मान, पाद प्रक्षालन, माल्यार्पण, चंदनलेपन,आसन आदि के साथ आतिथ्य हुआ है। जिसके कारण नंद महाराज सबको तथा श्रील व्यास देव को भी प्रसन्न किए है । उसके तुरंत बाद नंद महाराज (उनके मन में बहुत बड़ा प्रश्न था) ने कुछ कहा । यह सब उस दिन की रिकॉर्डिंग है , इसलिए इसको इतिहास कहते है। इतिहास मतलब? इति+अ+ हास, ये ऐसे हुआ है, यह मिथ्या नहीं है, यह इतिहास है।

नंद महाराज ने पूछा ? “कौन है ये ऐसा बालक सुंदर बालक? केवल बालक कह कर नहीं छोड़ा, सुंदर बालक भी कहा। आगे ये भी कह रहे हैं कि ऐसा सौंदर्य हमने किसी और का भी नहीं देखा। अद्वितीय सौंदर्य वाला यह बालक है कौन है? यह ५ दिन ही रोहिणी के गर्भ में था और फिर कैसे इसने ले लिया जन्म? मुझे तो १० महीने और ऊपर से 10 दिन और लगे थे, आपको अचरज लग रहा है क्या? सामान्यतौर पर इतना टाइम लगना चाहिए। लेकिन ये बस 5 दिन ,’ इन एंड आउट’, अभी अभी पहुँचा और अभी जन्म भी ले लिया। नन्द महाराज बोले, “ हे व्यास मुनि! आप मुझे इस रहस्य को सुनाइए”। व्यासदेव ने कहा,” तुम भाग्यवान हो हे नंद महाराज! यह बालक शेष है”। दे दिया परिचय। एक समय सारी सृष्टि समाप्त होती है,महाप्रलय होता है तो जो बचते है वे अनंतशेष ही होते है, सारे ब्रह्मांडो को वे धारण करते हैं। शेष मतलब: बैलेंस, बचा हुआ। “शिशु शेष: सनातन”

आगे बता रहे हैं हुआ कि यह बालक देवकी के गर्भ में प्रकट हुआ था। किसकी इच्छा से ? कृष्ण की इच्छा से। व्यासदेव जानते हैं ये सब क्या हुआ, कैसे हुआ, क्यों हुआ? रोहिणी के गर्भ में इसका गर्भान्तरण हुआ। जो दर्शन योगियों के लिए भी दुर्लभ है, वह दर्शन तुम्हें प्राप्त हुआ,तुम्हारे घर में आकर दर्शन दिए भगवान ने छप्पर फाड़ के। आपको कहीं जाना भी नहीं पड़ा, होम डिलीवरी, लार्ड डेलीवर्ड हिमसेल्फ। सीधा आपके पास आए और कहा मुझे लेलो । और हम जो यहाँ पहुंचे है इसी बालक के दर्शन के लिए बड़े दूर से आए है। नन्द महाराज तुमको तो कही जाना नहीं पड़ा लेकिन हम बड़ी दूर से आए है और बालक के दर्शन के लिए उत्कंठित है। आप सभी उत्कंठित हो कि नहीं? वैसे तभी दर्शन होता है,वरना उत्कंठा के बिना दर्शन नहीं होता। ये उत्कंठा नामक जो मूल्य चुकाता है वही दर्शन पाता है। उत्कंठा कहो या लालसा कहो या उत्साह भी है ही।

“उत्साह निश्चय धैर्यात.” वेदव्यास ने कहा कि,” हमें दर्शन कराओ, कहाँ है ये बालक? जहाँ चर्चा हो रही थी वहाँ बालक नहीं था, वह अंदर घर में है। ये जो पढ़कर सुना रहे है यह सब नारद मुनि ही सुना रहे है । ये रनिंग कमेंट्री किनकी है? नारद जी की है। नारद और बहुलाश्व का संवाद चल रहा है। नारद जी ने बहुलाश्व को बलराम जन्म की कथा सुनाई है। नंद महाराज सभी को अंदर ले गए । आप भी जाना चाहते हो अंदर? तो आइए हम भी पीछे पीछे चलते है अंदर। लेकिन जो सोएगा वो खोएगा, सो डोंट मिस द बस। हम जा रहे हैं, वी आर गोइंग बैंक टु होम। तो ये सब जो वहां पहुंचे हैं इस सारे मंडल का नेतृत्त्व श्रील व्यास देव ही कर रहे है। जैसे ही वे पधारे तो उन्होंने एक पालना देखा जो अति सुंदर था, समलंकृत था आभूषणों से। जैसे यहाँ हम मंदिर में सजाते है उससे तो अधिक अच्छा होगा न? तो उस पालने में शिशु को देखा। कौन से बालक को? स्वयं अनंतशेष बलराम को और उनको देखते ही सब आश्चर्यचकित हुए,वह कुछ बोल ही नहीं पाए, स्पीचलेस हो गए, इट्स अ वाओ फैक्टर, गला गदगद हो उठा उनका। देखते ही सभी ने साष्टांग दण्डवत प्रणाम किया।

अब श्रील व्यासदेव कहे, बाल बलराम। वैसे ऐसा हमने ये पहले कभी नहीं कहा होगा,क्योंकि बालकृष्ण तो हम कहते रहते हैं। लेकिन बाल बलराम हमने नहीं सुना कभी। मुझे प्रसन्न करने के लिए आप हां में हां मिलाना तो चाहोगे ही। लेकिन नॉर्मली हम लोग ऐसा कहते नहीं है। लेकिन यहाँ बालक बलराम,शिशु बलराम की स्तुति कर रहे है श्रील व्यासदेव। उन्होंने कहा :“देवाधिदेव भगवन!” उन्होंने भगवान नहीं कहा क्योंकि भगवान को जब हम सम्बोधित करते है तो भगवन’ कहते है – राधा का संबोधन राधे’ होता है।

इसको संबोधन कहते हैं। भगवान को संबोधन में ‘ हे भगवान!’ नहीं कह सकते, ‘ हे भगवन’ कहना होगा।

“देवाधिदेव भगवन कामपाल नमोस्तुते।” आपको नमस्कार। नमस्कार ही नमस्कार करने वाले हैं।

“नमो अनंताय शेषाय” किसको नमस्कार है?अनंताय शेषाय, ये एक विशेष विशेषण है। “साक्षात् रामायते नमः” आप कौन हो? साक्षात् राम को, बलराम को। आप हमारे प्रणाम को, नमस्कार को स्वीकार कीजिए, प्लीज एक्सेप्ट। “धराधराय पूर्णाय स्वधामने सीरपाण्ये” धरा मतलब पृथ्वी, केवल पृथ्वी नहीं वैसे सारे ब्रह्मांड को धारण करते हैं अपने फ़णो के ऊपर। इसीलिए एक ऑर्बिट में उनका जो संक्रमण या भ्रमण होता है, बलराम के कारण होता है। लॉ ऑफ़ द ग्रेविटेशन भी कौन हैं? गुरुत्वाकर्षण। गुरु कौन है यहां? बलराम। यह बलराम भी एक गुरु की भूमिका निभाते हैं या फिर वे सेवक भगवान बन जाते हैं। कृष्णा है सेव्यभगवान और बलराम है सेवक भगवान। बलराम कई प्रकार से सेवा करते हैं। “ईश्वर एकला कृष्ण आर सब भ्रत्य” केवल जीवात्मा ही नहीं बाकी और सब भी जो देवता हैं वो भी सेवक है। भगवान के सारे विस्तार-अवतार भी कृष्ण की सेवा करते हैं। कृष्ण भी उनकी सेवा करते हैं, उनका सत्कार सम्मान करते हैं। वे अलग से भी वैसे साक्षात भगवान या अवतार होते ही है लेकिन सेवाभाव भी होता है। हरि हरि! गुरुत्वाकर्षण या लाॅ ऑफ ग्रेविटेशन , लॉ-मेकर तो भगवान हैं।

साइंटिस्ट क्या करते हैं? उस लॉ का थोड़ा पता लगवाते हैं, दे डिस्कवर, दे डोंट क्रिएट द लॉज बट दे फाइंड आउट। और वह भी भगवान जब तक पता नहीं लगवाने देंगे, तब तक पता भी नहीं लग सकता । भगवान के हाथ में चाबी है। लॉ-मेकर का पता लगावाना चाहिए, लॉ का पता लगाने से पहले। लॉ मतलब भगवान के बनाए हुए नियम। “अथातो ब्रह्म जिज्ञासा” ब्रह्म/ परब्रह्म/अनंत इसका पता लगवाने के लिए मनुष्य जीवन है। जय बलराम! ‘ सीरपाणी’ मतलब हलधर। पाणी मतलब हाथ जैसे चक्रपाणी होता है न जिनके हाथ में सुदर्शन चक्र है। हलपाणी मतलब आपके हाथ में क्या होता है? हल होता है। बलराम है हलधर तो कृष्ण है मुरलीधर। ऐसे भी समझ है कि बलराम आदि गुरु है। हमारे हृदय प्रांगण में भगवान को प्रकट करना होता है या उनका अनुभव करना होता है तो हमारा जो क्षेत्र है, हमारा कार्य क्षेत्र क्या है? हृदय प्रांगण। बलराम आदि गुरु/ओरिजिनल गुरु के रूप में हैं। उनकी ओर से ही फिर प्रेजेंट गुरु/ वर्तमान गुरु होते हैं। ऐसे आचार्य बलराम की ओर से क्या करते हैं? उस क्षेत्र को तैयार करते हैं। कल्टीवेशन ऑफ़ द फील्ड। ‘ मशागत’ शब्द सुना आपने? किसान जो कल्टीवेशन करता है; बीज बोने के पहले और बीज से फिर पौधा, वृक्ष तथा उसमें फल लगने से पहले, खेत को तैयार किया जाता है।

तो बलराम आदि गुरु के रूप में हमारे हृदय प्रांगण का, हमारी भावना चेतना का कल्टीवेशन/ प्यूरीफिकेशन इत्यादि इत्यादि करते हैं। बलराम को संकर्षण भी कहते हैं, ‘कर्षण’ का संबंध वैसे कृषि के साथ भी है। हल तो उनके पास है ही , तो उस हल से वे हमारे हृदय प्रांगण के खेत/ क्षेत्र को तैयार करते हैं। कर्षण से उसको तैयार करते हैं, कल्टीवेटिंग द फील्ड और फिर कृष्ण मुरली बजाते हैं। कर्षण के बाद आकर्षण, कृष्ण आकर्षित करते हैं। यह कल्टीवेशन मतलब “चेतोदर्पण मार्जनं” आदि भी करते हैं गुरुजन कुछ विधि विधान और डू धिस डोंट डू धिस के साथ। मार्जन के बाद फिर भक्ति लता बीज, फिर फल लगते हैं,फिर मुरली की नाद को मुरलीधर। सो लाइक धिस कृष्ण और बलराम के टीम एफर्ट से है हमको अंततोगत्वा वे तक पहुंचा देते हैं भगवत धाम। गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल! इसलिए तो आते हैं। कृष्ण बलराम क्यों आते हैं?

“परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च दुष्कृताम्
धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे”

धर्म की स्थापना हेतु,” धर्मस्य तत्वं नियताम गुहायाम्” धर्म के तत्वों की स्थापना के लिए आते हैं। गुहा मतलब हमारे हृदय को गुफा भी कहते हैं, इसमें जब स्थापना होगी तत्वों की, सिद्धांतों की,फिर क्या होगा?

“महाजन येन गत्: स पंथ” फिर हम महात्माओं के पीछे पीछे लौट जाते हैं। लगता है कि हम सबके लौटने का समय आ चुका है, हरि हरि! फिर कहा है “नायमात्मा बलहीनेन लभ्य: न प्रवचनेन बहुना श्रुतेन” आत्मा का साक्षात्कार/ परमात्मा प्राप्त नहीं होगा, किसको? जो बलहीन है। या फिर दूसरे शब्दों में बल चाहिए, तभी हम उस बल के साथ परमात्मा या उनके धाम को लौट सकते हैं। एक प्रसिद्ध स्वामीजी भी हुए है, जब वे इस वचन पर भाष्य करते हैं तो उन्होंने लिखा भी है,” नायमात्मा बलहीन न लभ्य:” जो बलहीन है उसको भगवत साक्षात्कार नहीं होगा, तो बलवान बनो। उसके लिए क्या करो? दंड, कसरत करो, फुटबॉल खेलो, बलवान बनो, तभी फिर आत्मा का साक्षात्कार होगा। यही है “मंद: सुमंद मतयो” हमारी बुद्धि भी मंद है और हमें आसानी से गुमराह किया जा सकता है,तो यह गुमराह ही करना है इस प्रकार के जो भाष्य है या समझ है। यह सही नहीं कहा गया है। वास्तव में बलवान कौन है? किसके बल से, बुद्धि से हम भगवान को प्राप्त कर सकते हैं? बलराम के। ऐसे आत्मा को परमात्मा की प्राप्ति होगी लेकिन किसकी मदद से? गुरु की। ”कृष्ण प्राप्ति होय जहां होइते”। यहां बलराम आदि गुरु है, उनके बल और बुद्धि से कृष्ण प्राप्ति होगी। इस वचन में आगे कहा है ‘वृणुते’ जिसका अर्थ है चयन । व्यक्ति का उद्धार / कल्याण होगा, लेकिन केवल प्रवचन सुनने से नहीं होगा। भगवान जब चयन करते हैं, सिलेक्शन-इलेक्शन होता है, तब गारंटी है कि आत्मा, परमात्मा का साक्षात्कार/अनुभव, उनके धाम की प्राप्ति होगी। मैंने कुछ क्षण पहले कहा लगता है कि हमारी भी भगवत धाम लौटने की बारी आ चुकी है, क्योंकि कुछ दृष्टि से हमारा सिलेक्शन भगवान ने कर लिया है। उस लिस्ट में हमारा भी नाम आ गया,स्पेशली जो इस “एवं परंपरा प्राप्तम “ इस परंपरा से जिनका संबंध स्थापित हो चुका है, तो फिर आदिगुरु बलराम का बल और बुद्धि इस परंपरा के माध्यम से हम तक पहुंचने वाला है। “ददामि बुद्धियोगं तं येन माम् उपयान्ति ते“ भगवान ही बुद्धि देते हैं तो फिर हम उस बुद्धि और बल को प्राप्त किए हुए साधक क्या करते हैं? कृष्ण प्राप्ति के लिए उस बुद्धि का उपयोग करते हैं ,मुझे खोजने के लिए। चंद्रमा पर जाकर खोज करने के लिए नहीं , वह दूसरे प्रकार की बुद्धि है। वह तो “विनाशकाले विपरीत बुद्धि” है।

चंद्रमा पर क्यों जाना है? भगवान कहे मेरे धाम लौट के आओ। चंद्रमा, जो देवलोक में है, अगर वहां जाना है तो उसकी भी विधि है। आप स्पुतनिक या अपोलो से नहीं जा सकते। हरि हरि! ऐसे प्रयास तो रावण के भी हो रहे थे,उसको स्वर्ग जाना था तो सीढ़ी लेकर के आया। सीढ़ी चढ़ रहा है,लेकिन वहां रहने के लिए जो गुणवत्ता चाहिए, वह उसने अब तक प्राप्त नहीं की है। हमने वहां ऐसे नहीं जा सकते हैं। ये भी बुद्धि बुद्धि का ही प्रकार है। मामला बड़ा महंगा भी है, वहां मनुष्य को भेजना भी है तो सुन लो आप। अगर 100 मनुष्य को चंद्रमा पर पहुंचना है तो क्या खर्चा होगा? एयरफेयर कितना होगा? सवा रुपया नहीं, सवा लाख करोड़ रुपया लगेगा। फिर वहां जाने पर ऑक्सीजन नहीं है। ये निश्चित ही “विनाश काले विपरीत बुद्धि” वाली बात है। जो भी जा रहे हैं या यान को वहां पर भेजें है या चंद्रयान को सॉफ्ट लैंडिंग करवाये है, तो उसके पीछे कितने लोग हैं? हंड्रेडस ऑफ दैम। एक-दो टन का बोझ वहां पहुंचने के लिए कितने साइंटिस्ट दिमाग लड़ा रहे है? लेकिन सारे संसार को जो भगवान चला रहे हैं, कितने ग्रह कितने नक्षत्र कितनी आकाशगंगा? ये सब अपने आप चल रहा है क्या? लोग ऐसा कहते हैं कि ये सब नेचुरल है।

लेकिन किसका है ये नेचर ? कृष्ण ने तो कहा, “मया अध्यक्षेण प्रकृति सूयते सचराचरम” व्हाय नॉट अप्रिशिएट? छोटा सा,न जाने कितना वेट था उसका, उतना वेट वाला चंद्रयान को वहां पहुंचने के लिए कितनी सराहना कितना सम्मान सत्कार किया जा रहा है, अच्छा है होने दो। लेकिन उस प्रयास की तुलना में तो भगवान को प्रयास भी नहीं करना पड़ता, कृष्ण के लिए ये तो बाएं हाथ का खेल है। बलराम जब धारण करते हैं अलग अलग ब्रह्मांडो को, तो बलराम को पता भी नहीं चलता कि उन्होंने कोई बोझ उठाया भी है या नहीं उठाया है? साथ ही साथ वे भगवान के गुण भी गाते रहते हैं अपने सहस्त्र बदन, अपने हजारों वदनो से। क्यों हम सराहना नहीं करते? भगवान की स्तुति- संस्तुति होनी चाहिए, मनुष्यो को करनी चाहिए। यह कृष्णभावनामृत का अभाव है, जिसके कारण दुनिया मिसगाइडेड, मिसडायरेक्टेड है। हमारे नेता भी, बल्कि संसार ही सारा कामान्ध है। किसने बनाया अंधा दुनिया को? कामान्ध। और किसने? धनांध। और किसने? क्रोधांध। ऐसी कितनी पार्टीज़ है? कम से कम 6 तो हैं। ये 6 बड़े-बड़े शत्रु जिन्होंने सारे संसार के जीवों को, मनुष्यों को भी अंधा बनाया। लेकिन उपदेश तो क्या है?

“तमसो मा ज्योतिर्गमय”। अंधेरे में मत रहो, प्रकाश की ओर जाओ। वह प्रकाश क्या है?” कृष्ण सूर्यसम माया है अंधकार “ वह कृष्ण है, बलराम भी है। “कृष्ण सूर्यसम बलराम सूर्यसम, माया है अंधकार” “तमसो मा ज्योतिर्गमय” और क्या है? “मृत्युरमय अमृतम ग़मय” यह मारने का धंधा छोड़ दो, क्लोज धिस बिजनेस। तो क्या करो? “अमृतम ग़मय” अमर बनो, सदा के लिए भगवान के भक्त बनो और भगवत धाम लौटो। यह है वेदवानी, वेदों के उद्गार।

हरि हरि! “नीलांबर गौराय रोहिणियाय ते नमः “ व्यास देव द्वारा ये स्तुति चल रही है, नमस्कार चल रहे हैं उनके, बारंबार प्रणाम है। “नीलांबराय” कृष्ण है पीतांबर और बलराम है नीलांबर। कृष्ण है श्यामसुंदर, बलराम है गौरवर्ण। गौर मतलब स्वर्ण भी होता है, या शुभ्र/श्वेत वर्ण के बलराम हैं। “हलायुद्धाय प्रलंब्घग्न पाहिमाम पुरुषोत्तम“ हलायुद्ध: हल मतलब हल, जिसका एक उपयोग कृषि/ खेती के लिए होता है,दूसरा हमारे हृदय के प्रांगण में खेती/ कल्टीवेशन केलिए भी होता है। साथ ही साथ उस हल का कभी-कभी उपयोग करते हैं आयुध के रूप में,याने हथियार। जैसे बलराम हलधर भी है और मूसलधर भी है। कभी-कभी हल से खींच लेते हैं , और जब पास में आता है तो मूसल से मार देते हैं। “प्रलंब्घन” मतलब प्रलंबासुर का वध करने वाले। अधिकतर कृष्ण असुरों का संहार करते हैं वृंदावन में, ब्रजमंडल में या मथुरा में। लेकिन बलराम भी कुछ असुरों को स्वयं ही संभाले हैं। उसमें से एक है प्रलम्भासुर और गर्धभासुर । गर्धभ और प्रलम्भ यह दोनों वैसे एक ही कैटेगरी में आते हैं, एक ही श्रेणी में आते हैं।

यह डल-हेडेड, मंदबुद्धि के और कामुक (कामवासना से युक्त) पशु हैं। वे भारवाही भी कहलाते हैं,भार मतलब बोझ। ऐसे वो गधा तो था ही, गधा किसके लिए प्रसिद्ध है? बहुत बड़ा बोझ उठाने केलिए। तो जो लोग हार्ड- वर्किंग हैं, केवल एक शिफ्ट में नहीं,बल्कि डबल शिफ्ट या ट्रिपल शिफ्ट करते रहते हैं,फिर तनाव/ दबाव के बोझ से दे आर डिप्रेस्ड। ‘ नो नो आई हैव टू डू धिस’,किसी को जगाने के लिए ऐसा किया मैंने, “एक पंथ दो काज “। गधा सोचता है ,”आई हैव टू वर्क हार्ड अदरवाइज दाना पानी कैसे मिलेगा?” इतना सारा घास सर्वत्र है लेकिन गधा सोचता है, मुझे तो यह बोझ उठाना ही होगा टू मेंटेन फैमिली, धिस एंड दैट। “दिवा च अर्थे हया राजन कुटुंब भरणे “ यह गधे की मेंटालिटी है। गधा कहीं का होता! होता तो है मनुष्य लेकिन हम कहते, “गधा कहीं का!” उसके सारा सोच विचार कैसे हैं? गधे जैसे। बलराम आदि गुरु है, जब गधे का वध करने का समय आया तो उन्होंने इसकी लीडरशिप ली ,कृष्ण से आगे रहे बलराम। बलराम ने गर्धभासुर का वध किया तालवन में। ताल के वृक्ष पर फल का सीज़न था ,हवा बह रही थी ताल वृक्ष वन की ओर से, और वहां पहुंच रही थी जहां कृष्ण बलराम और सारे ग्वाल बाल एकत्रित थे। ग्वाल बालक जब सूंघने लगे उनको तो पता चला कि ये तो ताल के फल की सुगंध है।

उसको सूंघते ही उनके मन में ताल वृक्ष के फल चखने की इच्छा जगी तो उन्होंने कृष्ण बलराम को वहां चलने के लिए बोला। इस असुर के भय से वैसे वहां कोई नहीं जाता था, वे सभी दूर रहते थे,दुश्मन को दूर से नमस्कार करते और कहते,” वहाँ जाकर मरना है क्या?” लेकिन कृष्ण बलराम ने कहा,” चलो ठीक है, वहाँ चलते हैं”। सभी पहुंचे तो बलराम वहाँ के ताल वृक्ष को हिला रहे थे और उसी के साथ पके हुए फल सब गिरने लगे। उसकी आवाज भी सुनी होगी, किसने? गर्धभासुर ने,जिसका दूसरा नाम था धेनुकासुर। वह अकेला नहीं था,उसके साथ और भी सेना थी। जब ये लोग वहां पहुंचे तो बलराम को सब फल नीचे गिराते हुए देखा। ये असुर आगे की तरफ बढ़ा। गधे के पास कौन सा हथियार होता है? लात होती है, दुलत्ती। इस असुर ने बलराम के वक्षस्थल पर प्रहार किया, पीछे हटा और फिर पुनः जब आया और दुबारा लात मारने जा ही रहा था कि बलराम ने उसके दोनों पैर को पकड़ लिया। और क्या-क्या फिर? घुमा करके फेंक दिया उसी ताल वृक्ष पर। ऐसी लीला हमको सुननी चाहिए, भगवान जब अलग-अलग असुरों का वध करते हैं तो वह लीला हमको जरूर सुननी चाहिए। पता है क्यों? इसके लाभ है। उस असुर में जो अवगुण है, वैसे ही अवगुण यदि हम में भी है और फिर हमने यदि उस असुर के वध की लीला कथा को श्रवण किया है, तो क्या होगा?

हम में भी जो आसुरी प्रवृत्ति/ अवगुण है उस से हम भी मुक्त हो जाएंगे। प्रलंबासुर रूपी अहंकार पूजा/ लाभ/प्रतिष्ठा एक बहुत बड़ा गुण बताया जाता है। “मेरी पूजा हो, मेरा यह लाभ हो, मैं प्रतिष्ठित हूं” ऐसी मान्यता/ऐसे विचार वाला यह प्रलम्भासुर भी था। उस दिन एक ग्वाल बालक नहीं आया था किसी कारणवश, तो उसी ग्वाल बालक का रूप धारण करके यह असुर पहुंच गया और किसी ने नहीं पहचाना था। सभी सोचा है ये वो वही हमारा मित्र है। लेकिन वो असुर दिखता तो वैसा था, लेकिन था नहीं वैसा। परंतु कृष्ण पहचान गए और फिर उन्होंने योजना बनाई कि कंपटीशन/ खेल/प्रतियोगिता होगी दो दलों में। दलों का विभाजन हुआ: एक बलराम का दल ,दूसरा कृष्ण का दल। किस दल की जय हुई? उस दिन बलराम के दल की जय हुई और कृष्ण एंड कंपनी हार गए। कृष्ण के दल में ही प्रलम्भासुर था तो शर्त यह थी कि जो पराजित होंगे वह बन जाएंगे घोड़े और जो जीतेगा वह उनके कंधे पर बैठकर आगे बढ़ेगा। फिर श्रीकृष्ण ने सुबल को उठाया था और बलराम को प्रलंबासुर में अपने कंधे पर उठा लिया था। वे सब जा रहे थे ,कुछ ही दूरी तक जाना था और फिर वापस लौटना/ यू टर्न करना था। ऐसी कुछ परियोजना तो बनी थी, उसके अनुसार तो बाकी सब तो चलते रहे लेकिन ये असुर आगे बढ़ता रहा,आगे बढ़ता रहा क्योंकि वह दुष्ट था। धीरे-धीरे चलने वाला यह असुर दौड़ने लगा और दौड़ते दौड़ते उसने उड़ान भरी, जैसे विमान पटरी पर जाता है और फिर टेक ऑफ करके उड़ जाता है।

उसी के साथ वह लंबा भी हुआ इसलिए प्रलम्भ याने लॉन्ग डेमन। वैसे एक समय जब बवंडर आया था तो वो भी कृष्ण को उठाकर आकाश में ले गया था, कृष्ण वाज़ एंजॉयिंग, सारा सीन कृष्ण देख रहे थे, बर्डस आई व्यू/ऊपर आसमान से। लेकिन उस दिन बलराम को ऐसा अवसर नहीं मिला था, लेकिन आज अवसर मिल गया। नाओ बलराम वाज़ एंजॉयिंग। बलराम ने ढिशुम करके ,बॉक्सिंग करके उसको गिराया और वध किया। हरि बोल! उसी के साथ वैसे देवता हर वक्त आ जाते हैं,हम लोग नहीं जाते हैं, हम लोग तो बिजी रहते हैं अपने कामधंधो में। परंतु देवता आते हैं, पुष्पवृष्टि करते हैं, स्तुतिगान होते हैं, नगाड़े बजते हैं, गंधर्व गाते हैं, अप्सरायें नृत्य करती है।

“यम ब्रह्मा वरुणेंद्र रुद्र मरुत: श्रृंवंती दिव्य स्तवै“ देवता स्तुति गान करते रहते हैं। बलराम ने इस प्रलंबासुर का वध किया। “धेनुकारी मुष्टिकारी, कुटारी, शल्व,तोशल” ऐसे 4-5 थे पहलवान मल्लयुद्ध में। जिसमें से कुछ का वध तो कृष्ण किए,कुछ का बलराम ने किया। कृष्ण कंस का वध करते हैं। उसका वध होते ही,कंस के आठ भाई (कंक आदि) भागे दौड़े आए तो बलराम ने उन सबको लिटा दिया। तो कुछ को संभाला कृष्ण ने,कुछ को बलराम ने। इस तरह टीम एफर्ट्स कृष्ण बलराम का चलता रहता है।हरि हरि! “ब्रज मंडल मंडन:” ब्रजमंडल के मंडन या शोभा हैं बलराम। गर्ग संहिता में एक अध्याय है “बलराम सहस्त्रनाम” यहां भी हम कुछ नाम ही सुन रहे हैं। “सुर मुनींद्र फड़ेंद्र मुसले हलिने नमः“ जैसे विष्णु सहस्त्रनाम है महाभारत में, इस गर्ग संहिता में बलराम सहस्त्रनाम है। एकएक नाम मतलब एक-एक लीला का या बलराम के गुण का या बलराम के संबंध का ज्ञान। बलराम के जो भी संबंध है अन्य अनेक भक्तों के साथ वे सब सहस्त्रनाम में आ जाते हैं। इस अध्याय के अंत में ये भी लिखा है कि जो भी इनको सुनेंगे और जो भी पढ़ेंगे श्रद्धा से (मनन भी करना होता है केवल श्रवण से काम नहीं चलेगा) और श्रवण के बाद मनन करेंगे तो फिर क्या होगा? ऐसा भक्त/साधक/ श्रवण कर्ता भगवत धाम लौटेगा। इफ यू डोंट माइंड,आपको ऐतराज नहीं हो तो, भगवान आपको अपने धाम ले जा सकते हैं। आपको ऐतराज है क्या या आपकी इच्छा ही है? किस-किस की इच्छा है?

भगवान आपकी इच्छा की पूर्ति करें। और फिर अंतिम श्लोक है- नारद उवाच: “बलम परिक्क्रमय शतम् प्रणाम्य तै” तो व्यास देव अंततोगत्वा क्या करते हैं? बलराम जो अभी पालने में ही है, उनकी परिक्रमा करते हैं, बारंबार परिक्रमा करते हैं। फिर सैकड़ों बार प्रणाम करते हैं। और वे कैसे हैं? द्वैपायन एक तो यह भी नाम हुआ। व्यासदेव कैसे हैं? द्वैपायन हैं, एक द्वीप में जन्म हुआ था। एक आयलैंड के ऊपर जन्मे थे इसलिए उनका नाम द्वैपायन है। दूसरा नाम है पराशर आत्मज, क्योंकि पराशर मुनि के पुत्र रहे। और कैसे हैं व्यास देव? जिन्होंने अभी-अभी स्तुति भी की, परिक्रमा भी की और नमस्कार भी किया और कर ही रहे हैं अभी तक गए नहीं। तो वह कैसे हैं? विशाल बुद्धि। और वे बादरायण भी हैं, बद्री नारायण में रहते हैं और बद्री नारायण की आराधना भी करते होंगे ही। बद्रिकाश्रम में व्यास गुफा नामक एक प्रसिद्ध गुफा में वे रहते हैं। “सत्यवती सुतो” सत्यवती के पुत्र हैं। ऐसे श्रील व्यासदेव कहां गए? सरस्वती के तट पर गए,वहां सरस्वती बहती है। सरस्वती का दर्शन वहां जरूर है, आगे का पता तो नहीं चलता है सरस्वती का, लेकिन वहाँ पर तो दर्शन जरूर है। उसी सरस्वती के तट पर जी वह गुफा है, वे वहीं लौटे।
“गौर प्रेमानंद हरि हरि बोल”