Hindi

एक बुरे सौदे का सर्वोत्तम उपयोग ! अंग्रेजी एक अंतरराष्ट्रीय भाषा है और इस्कॉन की आधिकारिक भाषा भी इसलिए मैं इस कॉन्फ्रेंस में अंग्रेजी में बात करूंगा। आप अंग्रेजी, हिंदी और रूसी में भी इसके अनुवाद को पढ़ सकते हैं। मैं आज कुछ नए चेहरे देख रहा हूं। आज मेरे गुरु भाई श्रुतदेव प्रभुजी ,सेन डिएगो से हमारे साथ जुड़े है । हमारे साथ जप करने के लिए हम उनका धन्यवाद करते हैं । कुछ भक्त ऑस्ट्रेलिया से हमारे साथ है और बहुत से भक्त भारत से, लेकिन आप सभी मूल रूप से वैकुंठ से हैं। जैसे ही मैं किसी को जप करते देखता हूं, सोचो क्या होता होगा ? मैं खुश हो जाता हूँ । या जब आप दूसरों को जप और प्रार्थना करते हुए देखते हैं, उन्हें कृष्ण से जुड़ने की कोशिश करते हुए देखते हैं , उन्होंने सभी व्यवसायों को छोड़ दिया है और हरेर नाम ऐव केवलम कर रहे हैं। यह करने योग्य सर्वोत्तम वस्तु है और जब कोई यह देखता है या मैं यह देखता हूँ तो मैं बहुत प्रसन्न हो जाता हूँ | आप क्या सोचते हो? क्या कृष्ण भी बहुत खुश हो जाते हैं? क्या कृष्ण जानते हैं कि आप जप कर रहे हैं? इस सन्दर्भ में मेरा एक विचार है । मैं कोल्हापुर से अर्जुन-प्राण प्रभु से बात कर रहा था और स्क्रीन पर दूसरी ओर लॉस एंजिल्स से लीला माधुरी माताजी थी। यदि हम इस माध्यम या किसी और माध्यम से इस प्रकार आपस मैं एक दूसरे को देख सकते है , बात कर सकते है, तो फिर भगवान् हम सभी को देख और हमसे बात क्यूं नहीं कर सकते । भगवान भी सब के साथ एक साथ बात कर सकते है | जैसे अभी मैं एकसाथ आप सब से बात कर रहा हूँ , कृष्ण भी ऐसा कर सकते हैं । कृष्ण एक के बाद एक सब से बात कर सकते हैं । हमें यह याद रखना चाहिए तभी कृष्ण भावनाभावित विचार हमारे ह्रदय में आएंगे । जब मैं जप कर रहा था, तो कृष्ण मेरे जप पर ध्यान दे रहे थे। कृष्ण जानते हैं कि मैं जप कर रहा हूं। अगर हमें पता है कि, कृष्ण जानते हैं कि मैं जप कर रहा हूं, तो हम सचेत हो जाते हैं। 'मुझे पता है कि कृष्ण जानते हैं कि मैं जप कर रहा हूं'। यह सुन कर कैसा लग रहा है? यही कृष्ण है। इस जप के द्वारा हम अपने ह्रदय की बात उनसे कहते हैं। जप का समय सबसे अच्छा माना जाता है क्योंकि यह भगवान के साथ नियोजित भेंट का समय हैं । अर्जुनप्राण प्रभु ने लिखा है कि वह इन दिनों काफी चिंतित रहते हैं और सुबह 6:00 बजे उस पल के इंतजार में रहते है जब वह गुरु महाराज और अन्य भक्तों के साथ जप कर सकें । '' मैं इस प्रकार की उत्सुकता की सराहना करता हूं।" इस जप सम्मेलन में प्रतिदिन या कई दिन शामिल होने का जो सबसे अच्छा परिणाम होता है वह एक प्रकार का "लोल्यम" है | यह कहा गया है : मौल्यम कृष्ण भक्ति रस भाविता मतः , क्रियताम यदि कुतो अपी लभ्यते। तत्र लौल्यम अपि मुल्यम एकलं , जन्म कोटि सुकृतेर न लभ्यते।। (CCM ८.७०) तीव्र लालसा ही शुद्ध कृष्ण भक्ति के लिए दी जाने वाली कीमत है । आप जप करने और सुनने के लिए बहुत बहुत उत्सुक है, आप बहुत व्याकुलता से उस क्षण का इंतजार कर रहे है । यदि हम जप सम्मलेन से इस मानसिकता को विकसित कर रहे है, तो मुझे लगता है यह पूर्णता है | कुछ असुविधाएं या जिन परिस्थितियों से निकलकर हम दिन प्रतिदिन इस सम्मलेन का हिस्सा बनते है, इस प्रकार की टिप्पणियां इसे सफल बनाती है | हमें इस भौतिक संसार से अपने अस्तित्व को समेटना होगा | यह आपका पहला जन्म नहीं है | कई बार जन्म लेकर हमने इस तंत्र को फैलाया है | हमें तो यह भी नहीं पता की हमने किन किन जन्मो को भोगा है| हमने सब प्रजातियों को भोगा है और अंत में....... बहुनाम जन्मनां अन्ते , ज्ञानवान मम प्रपद्यते। वासुदेवः सर्वं इति , सः महात्मा सुदुर्लभ।।(भगवद गीता ७.१९) ... हमे यह मनुष्य जन्म मिला है । यह जन्म "दुर्लभ मानव जन्म " हैं । हमें यह प्रयास करना चाहिए की हम इस "बुरे सौदे" का सबसे अच्छा उपयोग कैसे कर सकते हैं । यह मानव रूप एक बुरा सौदा है। यह अच्छी बात नहीं है। यह अभी भी एक शरीर है - वृद्ध और बीमार हो रहा हैं । इसीलिए राजा कुलशेखर ने कहा की "मैं बूढ़े होने तक का इंतजार नहीं करना चाहता , मैं अभी कृष्णा भावना भावित होना चाहता हूँ , मैं इसे स्थगित नहीं करना चाहता। '' वह कृष्ण चेतना को और विलम्बित नहीं करना चाहते । वह कहते है, कृष्ण त्वदीय पाद पंकज पंजरान्तम , अद्यैव मे विस्तु मनसः राजहंसः। प्राण प्रयाण समये कफः , वात , पित्तः , कंठावरोधन विधौ स्मरणम कुतस्ते।। (मुकुन्द माला स्त्रोत : श्लोक ३३ ) हे भगवान कृष्ण, इस समय मेरे मन के शाही हंस को आपके कमल रूपी चरणों में प्रवेश करने दें। मृत्यु के समय आपको याद रखना मेरे लिए कैसे संभव होगा, जब मेरा गला बलगम, पित्त और वायु से घुट जाएगा? आद्य का अर्थ आज है और ईव का अर्थ आज ही है। मेरा मन आपके चरण कमल में प्रवेश करे और उसका अंत ना हो। राजा कुलशेखर आगे कहते हैं, जिसे प्रभुपाद ने भी कई बार कहा, वह कहते है, मेरा मन एक राजहंस के समान है और आपके चरण कमल की तरह हैं । मेरे मन रूपी हंस को आपके चरण कमल में शरण दें । कमल और पंखुड़ियों की एक घुमेरी है, मेरे हंस रूपी मन को वही रहने दें । विस्तु मनसः राजहंसः और यह आज और अभी होने दें । प्राण प्रयाण समये कफः , वात , पित्तः , कंठावरोधन विधौ स्मरणम कुतस्ते।। व्यूनोतकर्मः अत्तोतरह , कफ़्फ़ः समरुद्ध नादिकाः। कसा स्वास कृत्यासः , कण्ठे घुरा घुरयते। (श्रीमद भागवतम ३.३०.१६) उस रोग की स्थिति में, किसी की आँखों के भीतर से हवा के दबाव के कारण उभार आ जाता है, और ग्रंथियाँ बलगम से जम जाती हैं। साँस लेने में कठिनाई होती है, और साँस छोड़ने और साँस लेने पर वह घुर-घुर जैसी आवाज़ पैदा करता है और गले के भीतर एक खड़खड़ाहट रहती हैं | " कण्ठे घुर घुरयते" - जैसे-जैसे मैं बूढ़ा हो रहा हूँ , क्या होगा - "कंठ अवरोधन " मेरी आवाज, या गला अवरुद्ध हो जायेगा। "कंठे घुर घुरयते" - यहाँ घुर -घुर ध्वनि का वर्णन हैं । क्या आपने पुराने लोगों से सुना है? वह कहता है कि मैं बूढ़े होने का इंतजार नहीं करना चाहता । एक व्यक्ति था और वह कोई साधक या अनुयायी था और उसने यह साइनबोर्ड बनाया था - ’मैं कल से अपनी साधना करने जा रहा हूं’ उसने उसे अपने बिस्तर के सामने दीवार पर चिपका दिया था। इसलिए जैसे ही वह उठता, वह पढ़ता - "मैं कल से अपनी साधना को गंभीरता से लेने जा रहा हूं।" हर दिन वह पढ़ता - कल से। आज का अनुसरण करने की आवश्यकता नहीं है। यह मूर्खता है। केवल अज्ञानी मूर्ख ही कृष्णा भावना भावित होने को टालते रहते हैं । इसलिए जप करते रहें। मैं यह भी सोच रहा हूँ की जैसे जैसे हम आकाश में ऊँचे जाते रहते है तब हम ज्यादा स्पष्ट देख सकते है | जैसे एक विमान के उड़ान भरते ही आप सिर्फ विमानतल ( एयरपोर्ट ) देख सकते है, कुछ समय पश्चात अधिक ऊंचाई पर पहुंच कर आप पूरी नयी दिल्ली देख सकते हैं | जैसे जैसे आप और ऊँचे जाते है आप फरीदाबाद , मुरादाबाद जैसे आसपास के शहर भी देख सकते हैं | और ऊंचाई पर जाने पर आप कुछ और गांव , शहर , नदियाँ और पहाड़ देख सकते है | उस से भी ऊपर जाने पर आप सम्पूर्ण पृथ्वी को देख सकते है | और ऊंचाई पर जाने से आप दूसरे ग्रहों को देख सकते हैं | उससे ऊंचाई पर जाने पर आप सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और उसके बाद सम्पूर्ण ब्रह्मांडो को देख सकते है | और ऊंचाई पर जाने पर आप सारे ब्रह्मांडो और वैकुण्ठ लोक को देख सकते है | इससे और ऊंचाई पर जाने पर आप साकेत धाम देख सकते हैं | और ऊंचाई पर आप द्वारका , फिर मथुरा , वृन्दावन देख सकते है | वहां से वह सब देखते है | वह सबसे उच्च स्थान पर स्थित है | यह एक सुऱक्षा चौकी जैसा है , कई बार सुरक्षाचौकी धरातल पर ना होकर ऊंचाई पर बनाई जाती है | यह कृष्ण की व्यवस्था है | कृष्ण गोलोक में है , और इसके साथ ही उन्होंने स्वयं को हमारे हृदय में भी स्थापित किया है | सर्वस्य चाहम हृदि सन्निविस्टो , मत्तः स्मृतिर ज्ञानं अपोहनम च। वेदेसु सर्वेर अहम् च एव वेद्यो , वेदान्त कृद वेदविद इव चाहं।। (भगवद्गीता १५.१५) क्या उनके लिए हमें देखना, हमसे संवाद करना ,हमें सुनना मुश्किल है ? मेरे विचार में कृष्ण-भावनाभावित होना वही है जो हमने अभी कहा | यह ब्रह्मा का साक्षात्कार है | उन्होंने विश्वरूप देखा | उन्होंने देवीधाम, महेशधाम , हरिधाम , गौलोक धाम देखें | भगवान ने उन्हें दर्शन दिए | आजकल भी हजारों की संख्या में भक्त राधा माधव के दर्शन करने आते हैं | क्या राधामाधव एक साथ सबसे व्यवहार करते हैं ? सब भक्त प्रार्थना कर रहे है , प्रार्थना में अपने हृदय की बात कह रहे है | जैसे ही वे श्री विग्रह के सामने आते है , प्रणाम करते है | हाथ जोड़कर खड़े रहते है | वे भगवान का गुणगान करते है , प्रार्थनाये करते है | क्या यह सब भावनाये और प्रार्थनाये भगवान या श्री विग्रह के द्वारा सुनी जाती है ? सबकी भावनाएं सुनी और परखी जाती हैं | भगवान को एक के बाद एक यह नहीं परखना पड़ता वे यह सब एक साथ कर सकते है | इसलिए हरे कृष्ण का जप करना ही भगवान की व्यवस्था हैं | यह उनसे संवाद करने का एक माध्यम हैं | आप हरे कृष्ण कह रहे हैं, लेकिन वास्तव में आप इसके साथ बहुत सी अन्य “कृष्ण भावनाभावित बातें “ भी कह रहे हैं | इसलिए इसे करते रहे , नित्य इसका अभ्यास करें | यह मासिक या सामायिक नहीं है , यह दैनिक है | यदि हम ऐसा करते हैं, तो हमें उन प्रतिभागियों से कुछ प्रतिक्रियाएं मिलती हैं, जो रोज जप के लिए उत्सुक रहते हैं और मुझे इस सम्मेलन और जप वार्ता की प्रशंसा पुरे भारत में सुनने को मिलती हैं । आज नवद्वीप मंडल परिक्रमा का पहला दिन है। भक्त मायापुर छोड़कर विभिन्न द्वीपों पर पहुंच रहे हैं। चार - पांच अलग-अलग समूह हैं। आज मैं अंतर्राष्ट्रीय समूह के साथ हरिहर क्षेत्र जाऊंगा। मंदिर में जीबीसी की बैठकें भी जारी रहेंगी। इसलिए मैं अपनी वाणी को यहीं विश्राम देता हूँ | हरे कृष्ण !

English

BEST USE OF A BAD BARGAIN! English is the international language and ISKCON’s official language so I will speak in English on this conference. You can also read transcriptions in English, Hindi and Russian. I am seeing some new faces today. Today we have my god brother Shrutadev Prabhuji, all the way from San Diego. We thank him for chanting with us. We have a few devotees from Australia and many of you from India. But all of you are originally from Vaikuntha. As soon as I see someone chanting, guess what happens? I become happy. Or when you see others chanting and praying , trying to connect with Krsna, they have left aside all the businesses and are doing harer nama eva kevalam. That's the best thing you are supposed to be doing and when someone sees or I see that , I become very happy. What do you think? Krsna also becomes very, very happy. Does Krsna know that you are chanting? I had a thought. I was talking to Arjuna-pran Prabhu from Kolhapur and next on the screen was Lila Madhuri Mataji all the way from Los Angeles. If we could see and talk like this through this medium or whatever medium , then why can't God see and communicate with all of us. We can have him simultaneously talking together. As I am talking to you all simultaneously, Krsna could also do that. Krsna could do one after another. It is good to remember this and then we can have Krishna conscious thoughts. While I am chanting, Krsna is taking note of my chanting. Krsna knows I am chanting. If we know that, ‘Krsna knows I am chanting’ that is how we become conscious. ‘I know that Krsna knows I am chanting’. How does it sound? That's Krsna. Through this chanting we speak our heart to Him. Chanting time is considered the best because it's an appointment with the Lord. Arjuna-pran has written that these days he has become quite anxious and keeps waiting for that moment around 6.00am when he will be able to chant with Guru Maharaja and so many other devotees.’ I appreciate that kind of eagerness. By joining this conference many times or every day which is the best the result is a kind of ‘laulayam’ . It is said - mulayam.kṛṣṇa-bhakti-rasa-bhāvitā matiḥ krīyatāṁ yadi kuto 'pi labhyate tatra laulyam api mūlyam ekalaṁ janma-koṭi-sukṛtair na labhyate ( CCM 8.70) Being greedy is the price you pay. You are very, very eager to chant and hear. You are very anxious and waiting for that moment. If we are developing that state of mind by attending this conference, I think that is perfection. Some inconveniences or whatever we go through to be part of this, day after day after day, I feel it's worth it when we hear comments like this. We have to wind up our stay in this material existence. This is not your first birth. So many times we have spread our Network, birth after birth. We don't even know what kind of births we have undergone. We are gone through everything, all the species and finally… bahunam janmanam ante jnanavan mam prapadyate vasudevah sarvam iti sa mahatma su-durlabhah ( BG. 7.19) … we have this human birth. This durlabh manav janam is a very rare human birth. We have to see how we can make best use of a bad bargain. This human form is a bad bargain. It's not a good deal. It's still a body - coughing, getting old and sick. That is why King Kulasekhara said,’ I don't want to wait till I get old, I will become Krishna conscious now! I don't want to postpone it.’ He does not want to postpone this becoming Krishna conscious business. He says, kṛṣṇa tvadīya-pada-paṅkaja-pañjarāntam adyaiva me viśatu mānasa-rāja-haṁsaḥ prāṇa-prayāṇa-samaye kapha-vāta-pittaiḥ kaṇṭhāvarodhana-vidhau smaraṇaṁ kutas te (Mukunda-mālā-stotra - Mantra 33) O Lord Kṛṣṇa, at this moment let the royal swan of my mind enter the tangled stems of the lotus of Your feet. How will it be possible for me to remember You at the time of death, when my throat will be choked up with mucus, bile, and air? Adya means today and eva means today only. Let my mind enter Your lotus Feet and that doesn't end. King Kulashekhara further says which Prabhupad also quote many times. He says, ‘My mind is like a rajhansa or swan and Your feet are like a lotus. Let the swan of my mind hang around Your lotus Feet. There is whirl of lotus and petals. Let my swan like mind remain there. viśatu mānasa-rāja-haṁsaḥ and let that happen today. Now prāṇa-prayāṇa-samaye kapha-vāta-pittaiḥ kaṇṭhāvarodhana-vidhau smaraṇaṁ kutas te vāyunotkramatottāraḥ kapha-saṁruddha-nāḍikaḥ kāsa-śvāsa-kṛtāyāsaḥ kaṇṭhe ghura-ghurāyate (SB 3. 30.16) In that diseased condition, one’s eyes bulge due to the pressure of air from within, and his glands become congested with mucus. He has difficulty breathing, and upon exhaling and inhaling he produces a sound like ghura-ghura, a rattling within the throat. Kanthe ghura ghurayate - as I get older and older what happens - kantha avarodhan my voice, or throat is going to be choked up. Kanthe ghur ghurayate. There is a description of a sound ghur ghur ghur. Have you heard from old people? So he says I don't want to wait till I become old. There was one person and he was some kind of sadhaka or follower and he had made this signboard - ‘I am going to do my sadhana from tomorrow’ He had stuck it on the wall in front his bed. So as soon as he got up, he would read - I am going to take my sadhana seriously from tomorrow. Every day he read - from tomorrow. No need to follow today. This is foolishness. Only ignorant fools postpone this business of becoming Krishna conscious. So keep chanting. I was also thinking as you go higher and higher up in the sky, then you can see more. As the aircraft takes off first you see the entire airport, then the entire New Delhi. As you go higher and you can even see adjoining cities like Faridabad and Muradabad. As you go still higher you see more villages and towns and rivers and mountains. And even higher you see the entire earth. They even take photographs of the Earth. As you go higher, you could see other planets also. Still higher you can see the entire universe and then entire universes. You go higher and you will see all the universes plus Vaikuntha planets. As you go higher further along with this you will even see Saket-dham. Still higher, then you will see Dwaraka, then Mathura and Vrindavan. From there He sees every thing. He stays in the topmost location.It is like a security post. Sometimes the security posts instead of being on ground are placed high up. So that is Krsna’s arrangement. Krsna is in Goloka. At the same time He has placed himself within our hearts sarvasya cāhaṁ hṛdi sanniviṣṭo mattaḥ smṛtir jñānam apohanaṁ ca vedaiś ca sarvair aham eva vedyo vedānta-kṛd veda-vid eva cāham(BG. 15.15) Is it difficult for Him to see or understand or communicate with us, hear us? I thought that being Krishna conscious is if you could relate to what we just said. This is Brahma's realisation. He saw Visvarupa. He saw Devi dham, Mahesh dham, Hari dham, Giolok dham at a glance. The Lord gave him darsana. Also nowadays thousands of devotees come for darsana before Radha-Madhava. Is Radha-Madhava dealing with them simultaneously? They are all, praying, speaking their hearts, in their prayers. As soon as they come they see the Deity, they bow down. Stand up with a folded hands. They glorify and praise and offer some prayers. whether those feelings and prayers are heard by the Lord, the Deities? Everybody's feelings are captured and screened. The Lord doesn't have to do screening one after another. All of them are done instantaneously. So chanting Japa, Hare Krishna is what the Lord has arranged. It is the medium to communicate with Him, speak to Him. You are saying Hare Krishna but actually you are saying lots of other things along with it, Krishna conscious things. So keep doing it. Practice daily. It's not seasonal or occasional, it is daily. If we do that, then we get some responses from participants who are becoming more and more eager to chant everyday and I get to hear so much appreciation all over India for this conference and japa talks. Today is first day of Navadwip mandala Parikrama. Devotees are leaving Mayapur reaching different islands. There are four - five different groups. Today I will go with the International group to Harihar ksetra. GBC meetings will continue in the temple. So we stop here. Hare Krishna!

Russian

Джапа сессия 09.03.2019 Лучшее использование плохой сделки! Английский является международным языком и официальным языком ИСККОН, поэтому я буду говорить по-английски на этой конференции. Вы также можете прочитать транскрипции на английском, хинди и русском языках. Я вижу некоторые новые лица сегодня. Сегодня с нами мой брат, брат Шрутадев Прабху, из Сан-Диего. Мы благодарим его за воспевание с нами. У нас есть несколько преданных из Австралии и многие из вас из Индии. Но все вы родом с Вайкунтхи. Как только я вижу, что кто-то воспевает, как вы думаете что происходит? Я становлюсь счастливым. Или когда вы видите, воспевание или молитву других преданных, которые пытаются связаться с Кришной, они оставляют все другие занятия и повторяют, харер нама эва кевалам. Это правильно, это лучшее из того что вы можете делать, и когда кто-то видит или я вижу что вы делаете это, я становлюсь очень счастливым. Как вы думаете, Кришна становится счастливым? Да, Кришна также становится очень, очень счастливым. Знает ли Кришна, что вы воспеваете? Если бы я мог знать. Я только предполагаю. Я разговаривал с Арджуной-праном Прабху из Колхапура, а затем на экране была Лила Мадхури Матаджи из Лос-Анджелеса. Если мы можем видеть и говорить таким образом, через это устройство, или какое-нибудь другое устройство, если мы можем говорить из Индии с Калифорнией, то почему Бог не может видеть и общаться со всеми нами? Мы можем говорить с ним в то же время воспевая вместе. Поскольку я говорю со всеми вами одновременно, Кришна также может делать это. Кришна может делать одно за другим. Хорошо помнить об этом, тогда у нас будут мысли в сознании Кришны. Пока я повторяю, Кришна принимает к сведению мое воспевание. Кришна знает, что я воспеваю. Если мы знаем что, «Кришна знает, что я воспеваю», именно так мы становимся сознательными. «Я знаю, что Кришна знает, что я воспеваю». Как это звучит? Это Кришна. Благодаря этому воспеванию мы говорим с Ним из своего сердца. Время воспевания считается лучшим, потому что это встреча с Господом. Арджуна-пран написал, что в эти дни он очень взволнован и ждет того момента около 6:00 часов утра, когда он сможет воспевать с Гуру Махараджем и многими другими преданными. Я ценю такое рвение. Присоединяясь к этой конференции время от времени, а лучше конечно каждый день, какой будет результат?, это своего рода «лаулайам». Говорят - mulayam.kṛṣṇa-bhakti-rasa-bhāvitā matiḥ krīyatāṁ yadi kuto 'pi labhyate tatra laulyam api mūlyam ekalaṁ janma-koṭi-sukṛtair na labhyate (СКК 8.70) жадность - это цена, которую вы платите. Вы очень, очень хотите воспевать и слушать. Вы очень беспокоитесь и ждете этого момента. Если мы развиваем это состояние ума, посещая эту конференцию, я думаю, что это совершенство. Некоторые неудобства или что-то, через что мы проходим, чтобы стать частью этого, день за днем, я чувствую, что это того стоит, когда мы слышим подобные комментарии. Мы должны свернуть наше пребывание в этом материальном существовании. Вы не первый раз рождаетесь здесь. Так много раз мы расширяли нашу Сеть, рождение за рождением. Мы даже не знаем, какие виды рождений мы перенесли. Мы прошли через все, мы были всеми видами bahunam janmanam ante jnanavan mam prapadyate vasudevah sarvam iti sa mahatma su-durlabhah (БГ 7.19) ... у нас есть это человеческое рождение.durlabh manav janam - очень редкое человеческое рождение. Мы должны увидеть, как мы можем наилучшим образом использовать плохую сделку. Эта человеческая форма - плохая сделка. Это не очень хорошая сделка. Это все еще тело - кашляет, стареет и болеет. Вот почему царь Кулашекхара сказал: «Я не хочу ждать, пока я состарюсь, теперь я стану сознающим Кришну! Я не хочу откладывать это ». Он не хотел откладывать развития сознания Кришны. Он говорит, kṛṣṇa tvadīya-pada-paṅkaja-pañjarāntam adyaiva me viśatu mānasa-rāja-haṁsaḥ prāṇa-prayāṇa-samaye kapha-vāta-pittaiḥ kaṇṭhāvarodhana-vidhau smaraṇaṁ kutas te (Mukunda-mālā-stotra - Mantra 33) О, Господь Кришна, позволь царственному лебедю моего ума прямо сейчас запутаться в стеблях лотосов Твоих стоп. Иначе как я смогу помнить о Тебе в момент смерти, когда мое горло сдавят слизь, желчь и воздух? Адья значит сегодня, а ева значит только сегодня. Позволь моему разуму войти в Твои лотосные стопы, и это не конец. Царь Кулашекхара далее говорит, что Прабхупада также цитировал много раз. Он говорит: «Мой разум подобен rajhansa или лебедю, а Твои стопы подобны лотосу. Позволь лебедю моего ума быть поблизости Твоих Лотосных Стоп. Вихрь лотоса и лепестков. Пусть мой лебедь останется там. вишату манаса-раджа-хамсах и пусть это произойдет сегодня. Сейчас prāṇa-prayāṇa-samaye kapha-vāta-pittaiḥ kaṇṭhāvarodhana-vidhau smaraṇaṁ kutas te вайуноткраматоттарах капха-самруддха-надиках каса-шваса-кртайасах кантхе гхура-гхурайате (ШБ 3. 30.16) В предсмертной агонии, под давлением воздуха изнутри, глаза человека вылезают из орбит, а трахея наполняется слизью. Ему становится трудно дышать, и при каждом вздохе из его горла вырываются предсмертные хрипы: «Гхура-гхура». кантхе гхура-гхурайате - когда я становлюсь старше и старше, что происходит - kantha avarodhan мой голос, или горло захлебнется. Kanthe ghur ghurayate. Существует описание звука Гур Гур Гур. Вы слышали от пожилых людей? Поэтому он говорит, что я не хочу ждать, пока я состарюсь. Был один человек, и он был своего рода садхакой или последователем, и он сделал вывеску: «Я собираюсь займусь своей садханой и повторением завтра». Он приклеил ее на стену перед своей кроватью. Поэтому, как только он вставал, он читал - я собираюсь отнестись серьезно к своей садхане завтра. Каждый день читал - с завтрашнего дня. Нет необходимости следовать сегодня. Это глупость. Только невежественные глупцы откладывают на потом дело стать сознающим Кришну. Так что продолжайте воспевать. Я также думал, что когда вы поднимаетесь все выше и выше в небе, тогда вы можете видеть больше. Когда самолет взлетает, сначала вы видите весь аэропорт, а затем весь Нью-Дели. Когда вы поднимаетесь выше, вы можете увидеть даже соседние города, такие как Фаридабад и Мурадабад. Когда вы поднимаетесь еще выше, вы видите больше деревень, городов, рек и гор. И даже выше вы видите всю землю. Они даже фотографируют Землю. Когда вы поднимаетесь выше, вы можете видеть и другие планеты. Еще выше вы можете увидеть всю вселенную, а затем и целые вселенные. Вы поднимитесь выше и увидите все вселенные плюс планеты Вайкунтхи. Продвигаясь выше вместе с этим, вы даже увидите Шакет-дхаму( планеты Брахмы). Еще выше, тогда вы увидите Двараку, затем Матхуру и Вриндаван. Там Кришна во Вриндаване. Оттуда Он видит все. Он остается на самом верху. Оттуда он может видеть все. Это похоже на пост охраны. Иногда посты охраны вместо того, чтобы быть на земле, помещены на возвышении. Такое положение Кришны. Кришна на Голоке. В то же время Он поместил себя в наши сердца сарвасйа чахам хрди саннивишто маттах смртир джнанам апоханам ча ведаиш ча сарваир ахам эва ведйо веданта-крд веда-вид эва чахам (БГ 15.15) Я пребываю в сердце каждого, и от Меня исходят память, знание и забвение. Цель изучения всех Вед — постичь Меня. Я истинный составитель «Веданты» и знаток Вед. Трудно ли Ему видеть, понимать или общаться с нами, слышать нас? Я думаю, что быть сознающим Кришну - это если бы вы понимали, имели отношение к тому о чем мы только что говорили. Это реализация Брахмы. Он видел Вишварупу. Он сразу увидел Деви дхаму, Махеш дхаму, Хари дхаму, Голока дхаму. У него был даршан Господа. Также в наши дни тысячи преданных приходят на даршан перед Радха-Мадхавой. Радха-Мадхава имеет дело с ними одновременно? Они все молятся, говорят из своего сердца, в своих молитвах. Как только они приходят, они видят Божество, они кланяются. Встают со сложенными руками. Они прославляют и восхваляют и возносят молитвы. Слышат ли Божества, Господь эти чувства и молитвы? Все чувства захвачены и экранированы. Господь не должен делатьscreening один за другим. Все происходит мгновенно. Итак, Господь устроил для нас повторение джапы, повторение Харе Кришна. Это способ, общаться с Ним, говорить с Ним. Вы говорите Харе Кришна, Харе Кришна, но на самом деле вы говорите еще много других вещей вместе с этим, вещи в сознаним Кришну. Продолжай это делать. Практикуйте ежедневно. Это не сезонная и не случайная практика, это ежедневная практика. Если мы сделаем это, то получим некоторые комментарии от участников, которые все больше и больше стремятся воспевать каждый день, и я получаю огромную благодарность по всей Индии за эту конференцию и разговоры о джапе. Сегодня первый день Навадвипа Мандала Парикрамы. Преданные покидают Маяпур, добираясь до разных островов. Есть четыре - пять разных групп. Сегодня я поеду с Международной группой в Harihar ksetra. В храме продолжаются заседания GBC. Итак, мы остановимся здесь. Харе Кришна